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10 साल में तिगुनी हुई चांदी की खपत

राजेश भयानी | मुंबई Jun 13, 2018 09:58 PM IST

पिछले एक दशक के दौरान भारत में चांदी की खपत बढ़कर तीन गुना हो गई है। हाल ही में चांदी पर सिल्वर इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है। वल्र्ड सिल्वर सर्वे 2018 के अनुसार, भारत में 2008 के दौरान आभूषण विनिर्माण के लिए 601 टन चांदी का इस्तेमाल किया गया था, जबकि 2017 में आभूषण विनिर्माण में 2,058 टन चांदी का प्रयोग किया गया। इसी प्रकार, एक दशक के दौरान चांदी के बर्तनों में इसका प्रयोग 481 टन से बढ़कर 1,212 टन हो गया।  परिणामस्वरूप, विश्व बाजार में आभूषणों और बर्तनों में चांदी की भारतीय मांग की हिस्सेदारी भी 2017 में बढ़कर 39.2 प्रतिशत हो गई, जबकि 2008 में यह वृद्धि दर 14.7 प्रतिशत थी। इस दशक के दौरान भारत ने करीब 45,000 टन चांदी का आयात किया। दूसरी ओर, आभूषणों और निवेश के लिए सोने की मांग का रुझान बिल्कुल अलग है। भारत में इन दोनों ही श्रेणियों की मांग में गिरावट आई है।
 
मांग में अधिकांश वृद्धि पिछले पांच सालों के दौरान हुई है। आयात के आंकड़ों के अनुसार, 2008 से 2012 तक चांदी का औसत वार्षिक आयात 3,080 था, जबकि 2013 से 2017 तक वार्षिक आयात 5,800 टन से ज्यादा था। इस अवधि के दौरान उद्योग में चांदी के इस्तेमाल में खासा इजाफा हुआ। रिफाइनरी, आभूषण और व्यापार के एक बड़े भागीदार - आम्रपाली ग्रुप के निदेशक चिराग ठक्कर का कहना है कि चांदी के पुराने गहनों के रिफाइनर होने के कारण पिछले पांच सालों में उन्होंने रिफाइनिंग के उद्देश्य से (आभूषण और चांदी के बर्तन बनाने के लिए) प्राप्त होने वाले पुराने गहनों की शुद्धता है। उनमें पहले 85 प्रतिशत चांदी हुआ करती थी, जो अब कम होकर 50-55 प्रतिशत रह गई है। विशुद्ध चांदी में अन्य धातुओं की बढ़ती मिलावट के कारण ऐसा हो सकता है। इस प्रकार, यह अंतर पूरा करने के लिए नई चांदी की अतिरिक्त मांग ने चांदी की खपत भी बढ़ा दी है।
 
फोरसाइट बुलियन इंडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक विराज डिडवानिया ने कहा कि जब किसानों के पास नकदी होती है, तो खरीदारी के लिए चांदी उनकी पसंदीदा परिसंपत्ति रहती है और जरूर पडऩे पर इसे बेच दिया जाता है। जहां तक आभूषण की बात है, तो चांदी की ग्रामीण मांग का एक बड़ा हिस्सा पायल बनवाने के लिए होता है, जबकि चांदी के बर्तनों में पूजा के सामान और मूर्तियों की बड़ी हिस्सेदारी होती है। सोना एक बार खरीदे जाने के बाद आमतौर पर बेचा नहीं जाता है, लेकिन जब किसानों के पास नकदी होती है, तो वे चांदी खरीदते हैं और अगले सीजन में बीजों तथा उर्वरकों की खरीदारी के लिए उसे बेचते हुए भी देखे जाते हैं।
 
आगरा-मथुरा, राजकोट, सेलम और कोल्हापुर चांदी के बर्तनों तथा आभूषणों के विनिर्माण केंद्र हैं। मथुरा के एक व्यापारी के अनुसार, कस्बों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लड़कियों की पायल की मांग का स्थान आजकल मोबाइल फोन की मांग ने ले लिया है। भारत बड़े स्तर पर चांदी का आयात करता है, जो 2017 में 5,677 टन पर पहुंच गया है। अलबत्ता, 2015 में यह आयात 7,249 टन था, जो सर्वकालिक उच्च स्तर है। भारत के पास चांदी की आपूर्ति के अन्य स्रोत भी हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, '2017 के दौरान घरेलू रूप से किए गए खनन और आयातित कन्संट्रेट से रिफाइंड की गई धातु और कच्चे सोने तथा चांदी से आपूर्ति हुई। हमारा अनुमान है कि इन सबका योगदान मिलकर तकरीबन 717 टन रहा।' निवेशक चांदी खरीदना और इसे अपने पास रखना पसंद करते हैं। बहुत-से निवेशकों ने 2011 में चांदी की खरीदारी की थी, जब चांदी सबसे ऊंचे स्तर 75,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई थी। विराज के अनुसार, उन निवेशकों ने अब भी घाटे से बचने के लिए चांदी को अपने पास रखा हुआ है।
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