तय होगी मुखौटा फर्मों की परिभाषा

श्रीमी चौधरी | मुंबई Jan 01, 2018 10:45 PM IST

पीएमओ ने किया विशेष कार्यबल का गठन

कार्रवाई के लिए मान्य दिशानिर्देश देगा कार्यबल
जायज कंपनियों को बाकियों से अलग करना है मकसद

सरकार इस महीने के अंत तक शेल यानी मुखौटा कंपनी की परिभाषा स्पष्ट कर देगी। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक विशेष कार्य बल का गठन किया है जो शेल कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मान्य विशेष दिशानिर्देश  तैयार करेगा। अधिकारियों के मुताबिक शेल कंपनियों की परिभाषा को कंपनी कानून, प्रतिभूति नियमों और आय कर कानून में शामिल किया जाएगा। केंद्र सरकार प्रवर्तन एजेंसियों और नियामकीय संस्थाओं से मिली सिफारिशों पर काम कर रही है।

इस मामले की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने कहा, 'हमें इस संबंध में कई सुझाव मिले हैं क्योंकि इस विषय को किसी भी कानून में परिभाषित नहीं किया गया है।' अधिकारी के मुताबिक विशेष कार्य बल ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, प्रवर्तन निदेशालय और कंपनी मामलों के मंत्रालय सहित सभी संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों को शेल कंपनियों के कामकाज के बारे में जानकारी देने को कहा है।

अधिकारी ने कहा, 'सरकार का मानना है कि कई शेल कंपनियां वैध उद्देश्यों के लिए अस्तित्व में हैं और वह चाहती है कि ऐसी कंपनियों को उन कंपनियों से अलग किया जाए जिनका गठन कर चोरी, जनता के पैसों को ठिकाने लगाने, संदिग्ध लेनदेन, शेयरों की कीमत में हेरफेर या फिर धन शोधन के लिए किया जाता है।' कार्य बल ने पाया कि कई ऐसे मामले हैं जहां छद्म कंपनियों या चवन्नी शेयरों को शेल कंपनी मान लिया गया था। स्पष्टता की कमी के कारण कार्रवाई लायक कई मामले में जांच रोक देनी पड़ी है।

फिनसेक लॉ एडवाइजर्स के संस्थापक संदीप पारेख ने कहा, 'अपनाई गई अवधारणा के मुताबिक शेल कंपनियां निष्क्रिय होती हैं। उनकी कोई परिचालन आय नहीं होती है। उनका गठन शेयर और निवेश धारण करने के लिए होता है और इसलिए मूल्यांकन के मामले में वे स्थिर होती हैं। अलबत्ता इसकी परिभाषा स्पष्ट करने की जरूरत है ताकि शेल कंपनी के रूप में उनका वर्गीकरण जायज ठहराया जा सके।'

जे सागर एसोसिएट्स के पार्टनर ललित कुमार ने कहा, 'ऐसी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्पष्टï परिभाषा की जरूरत है और इसे कानून का समर्थन होना चाहिए। अगर कानून में इसे परिभाषित कर भी लिया जाए तो भी इसकी परिभाषा तथ्यों और परिस्थितियों के मुताबिक समावेशी होनी चाहिए।'

ऐसा कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि कंपनी मामलों के मंत्रालय द्वारा 55 हजार कंपनियों को डिफॉल्टर और उनके निदेशकों को अयोग्य घोषित करने के बावजूद सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रही है। इनमें से कुछ कंपनियां शेल कंपनियों के दायरे में नहीं आती हैं। इतना ही नहीं दो साल या उससे अधिक समय से निष्क्रिय रहने के कारण 224,000 कंपनियों का पंजीकरण रद्द किया जा चुका है।
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