बैंक सुधारेंगे उड़ीसा के छोटे उद्यमियों की हालत

बीएस संवाददाता | भुवनेश्वर Mar 16, 2009 11:15 PM IST

उड़ीसा की सूक्ष्म, लघु और मंझोली इकाइयों को मंदी के भंवर से निकालने के लिए राज्य के बैंकों ने एक  नई पहल शुरू की है।

बैंक अब अपनी ओर से  दिए जाने वाले कुल ऋण का 15 फीसदी सूक्ष्म, लघु और मझोली इकाइयों को देंगे।

राज्य की लघु उद्योग इकाइयों का मानना है कि बैंकों के इस कदम से बाजार में रुपया आ सकेगा जो मंदी की मार झेल रही औद्योगिक इकाइयों के लिए रामबाण साबित होगा। गौरतलब है कि राज्य की औद्योगिक इकाइयों ने सरकार के सामने अपनी कई मांगों की रुपरेखा रखी है।

इसमें राज्य की कमजोर औद्योगिक इकाइयों की पहचान करने हेतु एक टास्क फोर्स के गठन, पिछड़े जिलों में औद्योगिक इकाइयों को मिलने वाले ऋण पर ब्याज दरों में अंतर (डीआरआई)के लिए व्यवस्था करने, औद्योगिक इकाइयों की फाइनैंसिंग इकाइयों के लिए कलस्टर बनाना, उड़ीसा राज्य वित्त निगम (ओएसएफसी) को ऋण सुरक्षा योजना के अंतर्गत लाना और ओएसएफसी की ओटीएस (ओटीएस) योजना के तहत ऋणों का भुगतान कर चुके उद्यमियों को नए ऋण उपलब्ध कराना शमिल है।

ये मुद्दे कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (सीसीआईए) के अध्यक्ष शरत साहू ने 'एमएसएमई के लिए ऋण में बढ़ोतरी की आवश्यकता' विषय पर हो रही बहस पर राज्य स्तरीय बैंकों की विशेष मासिक बैठक (एसएलबीसी) के दौरान उठाए।

साहू ने कहा कि राज्य की औद्योगिक इकाइयां इस समय एक बुरे दौर से गुजर रही हैं। राज्य के बैंक इन इकाइयों के लिए ओटीएस राशि की व्यवस्था करके हालात को सुधार सक ते हैं। ऐसा करने से उद्यमियों को अतिरिक्त राशि प्राप्त हो जाएगी जिसका प्रयोग वे मंदी के दौरान उत्पादन बढ़ाने में कर सकेंगे और किश्तों के जरिये इस ऋण की अदायगी होने से बैंको को भी फायदा होगा।

साहू ने कहा कि राज्य की लघु उद्योग इकाइयों के हालात को जानने के लिए सरकार को एक टास्क फोर्स का गठन भी करना चाहिए। इस टास्क फोर्स में बैंक प्रतिनिधियों के साथ-साथ औद्योगिक इकाइयों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। यह टास्क फोर्स राज्य की बीमारु औद्योगिक इकाइयों को पहचानने का काम भी करेगा।

साहू ने कहा कि इस टास्क फोर्स को अपनी रिपोर्ट तीन महीने के भीतर ही जमा करानी होगी। उत्कल चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री (यूसीसीआई) के अध्यक्ष निरंजन मोहंती का कहना है कि लघु उद्योग इकाइयों को किए गये आयात का भुगतान करने के लिए अभी भारी-भरकम पूंजी की जरुरत है। इसके लिए जरुरी है कि गैर निष्पादित परिसंपत्तियों की मंजूरी के लिए आवश्यक शर्तो में सुधार किया जाए और सबसे पहले मंजूरी प्राप्ति की अवधि को 180 दिन से घटाकर 90 दिन किया जाए।

बैठक में उपस्थित रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक वी एस दास ने कहा कि बैंको की ओर से मिलने वाले कर्ज का 40 फीसदी प्राथमिक सेक्टरों को मिलने के कारण लघु और मझोले उद्योगों के लिए अलग से ऋण की व्यवस्था करना काफी कठिन काम है।

उन्होंने बताया कि कुल ऋण राशि का 18 फीसदी कृषि क्षेत्र के लिए, कमजोर वर्गो के लिए 10 फीसदी और डीआरआई के लिए 1 फीसदी पहले से ही तय है। ऐसे में अगर एमएसएमई क्षेत्र को 15 फीसदी ऋण मुहैया कराया जाता है तो निर्माण क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋण में काफी कमी आयेगी जो काफी संख्या में रोजगार उत्पन्न करता है।

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