देसी दवा फर्मों ने घटाया एफसीसीबी का बोझ

पी बी जयकुमार और बी जी शिरसाठ | मुंबई Jan 14, 2010 12:40 AM IST

देश की दिग्गज फार्मा कंपनियों ने विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (एफसीसीबी) का भार 60 फीसदी कम कर दिया है। इससे इन कंपनियों को अपनी वित्तीय सेहत सुधारने और विस्तार के लिए रकम जुटाने में मदद मिली है।

बिजनेस स्टैंडर्ड रिसर्च ब्यूरो की ओर से इकट्ठा किए गए आंकड़ों के अनुसार 2005-08 के बीच फार्मा कंपनियों ने फंड अधिग्रहण और पूंजी विस्तार के लिए करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटाए थे। लेकिन अब इन कंपनियों के पास 3,831 करोड़ रुपये के एफसीसीबी ही रह गए हैं। 

विश्लेषकों का कहना है कि इसमें से अधिकतर एफसीसीबी पिछले एक साल में कम किए गए हैं। इसके लिए 2008 के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नियामकों में दी गई ढील है। रिजर्व बैंक ने कंपनियों को 31 दिसंबर 2009 तक पहले जारी किए गए बॉन्ड्स का बायबैक करने की रियायत दे दी थी।

दरअसल भारतीय उद्योग जगत को मंदी से उबारने की पहल के तहत ऐसा किया गया था। अधिकतर दवा कंपनियों के एफसीसीबी 2010-13 तक मैच्योर होने वाले थे। एचडीएफसी सिक्योरिटीज डेटा के अनुसार 2008-09 में 14 कंपनियों ने अपना एफसीसीबी भार 76,562 करोड़ रुपये से 48 फीसदी घटाकर 43,077 करोड़ रुपये कर दिया है। विश्लेषकों ने कहा कि भविष्य में दवा कंपनियों का कारोबार और शेयरों की कीमतों में और इजाफा होने के कारण अधिकतर कंपनियां विस्तार के लिए रकम जुटा सकती हैं।

प्राइसवॉटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) के सहायक निदेशक सुजॉय शेट्टी ने बताया, 'कुल मिलाकर सभी शेयरों की कीमतों में काफी इजाफा हुआ है और दवा कंपनियों का कारोबारी प्रदर्शन भी बेहतर हुआ है। अरबिंदो फार्मा जैसी कंपनियों की बात करे तो उनके एफसीसीबी परिवर्तन कराने की कीमत उनके शेयरों की मौजूदा कीमत से काफी कम है। इससे पता चलता है कि पिछले कुछ महीनों में हालात किस तरह बदले हैं।'

उद्योग की औसत विकास दर 12-15 फीसदी से अधिक की दर से विकास करने वाली रैनबैक्सी लैबोरेट्रीज, वॉकहार्ट, जुबिलिएंट ऑर्गेनोसिस, ल्युपिन और सन फार्मा जैसी कंपनियों ने 2005-08 के दौरान विदशों में कई परिसंपत्तियां खरीदी हैं। खासतौर पर अमेरिका और यूरोप में। उस समय रकम जुटाने के लिए एफसीसीबी सबसे आसान विकल्प थे, जिसमें तुरंत अपनी हिस्सेदारी कम करने की जरूरत नहीं पड़ती है।

1 जनवरी के बाद से एफसीसीबी के बायबैक की अनुमति नहीं है और मौजूदा एफसीसीबी का भुगतान करना होगा या फिर उसे इश्यू की शर्तों के अनुसार शेयर में बदलना होगा। एचडीएफसी सिक्योरिटीज के उपाध्यक्ष (संस्थागत शोध) रंजीत कपाड़िया ने बताया कि यूं तो इन एफसीसीबी को कम दाम पर खरीदा गया लेकिन इससे इन कंपनियों की वित्तीय हालत में बेहद सुधार आया है।

रैनबैक्सी लैबोरेट्रीज ने 2006 में करीब 2000 करोड़ रुपये जुटाए। इस रकम का इस्तेमाल कंपनी ने 2006 और 2007 में अधिग्रहण करने में इस्तेमाल किया। यह पहली भारतीय कंपनी है जिसने दो साल पहले पहली बार एफसीसीबी के परिवर्तन मूल्य को बदला था। उस समय कंपनी ने करीब 39 फीसदी डिस्काउंट दिया था।

अक्टूबर 2008 में रैनबैक्सी को अपनी नई प्रवर्तक कंपनी दाइची सांक्यो से करीब 3,585 करोड़ रुपये मिले थे। लगभग 3500 करोड़ रुपये की नकदी रखने वाली सन फार्मा ने अपने सभी एफसीसीबी दो साल पहले ही चुका दिए थे। सन फार्मा की ही तरह ल्युपिन पर भी एफसीसीबी का बोझ नहीं है। कंपनी ने करीब 450 करोड़ रुपये के एफसीसीबी पहले ही चुकता कर दिए हैं।

ल्युपिन दुनिया भर में सबसे अधिक तेजी से विकास करने वाली जेनेरिक दवा कंपनी है। जुबिलिएंट ऑर्गेनोसिस ने करीब 1400 करोड़ रुपये जुटाए थे और इस पर बाकी दवा कंपनियों के मुकाबले एफसीसीबी का सबसे अधिक भार था। लेकिन कंपनी ने अब इसे घटाकर 883 करोड़ रुपये ही कर दिया है। जुबिलिएंट के मुख्य वित्त अधिकारी आर शंकरैया ने बताया, 'हमारा पूंजी प्रवाह काफी अच्छा है और हमारे राजस्व में 25-27 फीसदी मुनाफा मार्जिन है।'

अरबिंदो फार्मा ने भी अपनी एफसीसीबी देनदारी 1,186 करोड़ रुपये से घटाकर 792 करोड़ रुपये कर दी है। ऑर्किड फार्मा ने भी करीब 274 करोड़ रुपये के एफसीसीबी बायबैक किए और अब कंपनी पर 990 करोड़ रुपये के एफसीसीबी बकाया हैं।

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