आईटी के साथ एफएमसीजी में भी विप्रो का जलवा

भैरवी अय्यर |  Feb 08, 2010 01:03 AM IST

सूचना तकनीक की दुनिया में विप्रो एक प्रतिष्ठित नाम है। कंपनी स्वतंत्र रूप से शोध एवं विकास सेवाएं उपलब्ध कराने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है।

इसके दुनिया भर में 54 विकास केंद्र हैं और कंपनी के लिए 95,000 से अधिक लोग काम करते हैं। विप्रो ही वह पहली कंपनी है जिसने सबसे पहले सिक्स सिगमा का इस्तेमाल किया था। यह कोई छोटी मोटी उपलब्धि नहीं है।

दरअसल कंपनी का सूचना और प्रौद्योगिकी कारोबार इतना बड़ा है कि हम में से कई लोग यह नहीं जानते होंगे कि विप्रो निरमा और डाबर के बाद तीसरी सबसे बड़ी भारतीय एफएमसीजी कंपनी है। कंपनी का यह कारोबार कितना बड़ा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2009-10 में कंपनी की इस इकाई को बिक्री से 2,500 करोड़ रुपये की कमाई होने का अनुमान है।

विप्रो की तो शुरुआत ही एफएमसीजी कारोबार के साथ हुई थी। कंपनी ने खाद्य तेल और साबुन के कारोबार में उतरने के लिए 1945 में वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट्स कंपनी बनाई थी। कंपनी के पोर्टफोलियो में सूचना प्रौद्योगिकी तो इसके काफी बाद 1991 में जुड़ा। अजीम प्रेमजी के इस कंपनी की कमान संभालने के 23 साल बाद विप्रो ने आईटी में कदम रखा।

कंपनी के एफएमसीजी पोर्टफोलियो में पर्सनल केयर और स्किन केयर उत्पाद शामिल हैं। कंपनी लाइटिंग उत्पाद और फर्नीचर का कारोबार भी करती है। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए कई अधिग्रहण भी किए हैं। संतूर, चंद्रिका, ग्लूकोविटा और यार्डली जैसे प्रमुख ब्रांडों पर विप्रो का ही अधिकार है। कंपनी का तकरीबन 9 फीसदी कारोबार आईटी से इतर इकाइयों से ही आता है।

एफएमसीजी ही क्यों?

सूचना प्रौद्योगिकी और एफएमसीजी बिल्कुल अलग-अलग तरीके के कारोबार हैं तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि कंपनी ने एफएमसीजी को ही क्यों चुना?

जबकि कोई जरूरी नहीं है कि अगर आप सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अच्छा कारोबार कर रहे हैं तो एफएमसीजी में भी आप अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे। एफएमसीजी क्षेत्र में कंपनियों की भरमार है और इस कारण से यहां कड़ी प्रतिस्पध्र्दा देखने को मिलती है।

आपका मुकाबला हिंदुस्तान यूनिलीवर, प्रॉक्टर ऐंड गैम्बल, नेस्ले और कोलगेट-पामोलिव जैसी दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियों से होता है। तो वहीं डाबर, मैरिको, गोदरेज और इमामी जैसी घरेलू कंपनियों से भी जबरदस्त टक्कर मिलती है। एफएमसीजी के कारोबार में मुनाफे का मार्जिन कम होता है।

अगर विप्रो के ही विभिन्न कारोबारों का उदाहरण लें तो आईटी क्षेत्र में कंपनी का ऑपरेटिंग मार्जिन 21 फीसदी है तो वहीं कंज्यूमर केयर और लाइटिंग के कारोबार में यह महज 12.5 फीसदी ही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी दो वजह हो सकती हैं।

पहली वजह तो यह कि मंदी के दौर में जब आईटी का कारोबार भी हिचकोले खाता नजर आता है उस समय एफएमसीजी एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। विप्रो समेत कई नामी गिरामी आईटी कंपनियां विदेश में कारोबार पर निर्भर करती हैं। जब मंदी का दौर आता है तो विदेशी क्लाइंट सबसे पहले अपने आईटी बजट पर ही लगाम लगाने की सोचते हैं।

यही वजह है कि पिछले दो तीन सालों में सभी बड़ी आईटी कंपनियों ने घरेलू बाजार की ओर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। वहीं एफएसीजी कारोबार में ऐसे हालात कभी नहीं पैदा होते। चाहे कितनी भी मंदी हो मगर उपभोक्ता साबुन, स्किन केयर उत्पाद और ऐसी दूसरी चीजें खरीदना नहीं छोड़ेगा। हां, वह महंगे ब्रांडों को छोड़कर सस्ते ब्रांडों की ओर जरूर जा सकता है।

साथ ही यह भी साफ है कि जैसे-जैसे भारतीयों के पास पैसा आने लगा है और लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठने लगे हैं वैसे वैसे एफएमसीजी उत्पादों की मांग बढ़ी है और आने वाले दिनों में इस कारोबार के और बढ़ने की उम्मीद है।

एफएमसीजी क्षेत्र को चुनने की एक और वजह यह है कि विप्रो इस तरीके से ब्रांड के जरिए संपत्ति बना सकती है। कंपनी ने ब्रांड पोर्टफोलियो तैयार करने के लिए काफी पैसा खर्च किया है। साल 2003 में विप्रो ने 5 करोड़ रुपये में ग्लूकोविटा और हिंदुस्तान यूनिलीवर को खरीदा था। अगले ही साल कंपनी ने 31 करोड़ रुपये में आयुर्वेद साबुन ब्रांड चंद्रिका को खरीदा।

फिर मई 2006 में कंपनी ने 102 करोड़ रुपये में नॉर्थ वेस्ट स्विचेस को खरीदा। इसके बाद 2007 में विप्रो ने एक बड़ा कारोबारी कदम उठाया। कंपनी ने 1,000 करोड़ रुपये में सिंगापुर की कंपनी उन्जा होल्डिंग्स का अधिग्रहण किया। वहीं इस साल की शुरुआत में कंपनी ने ब्रिटेन के लॉर्नामीड समूह से यार्डली को खरीद लिया। इसके लिए विप्रो को 210 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े।

केएमपीजी के विश्लेषक आनंद रामनाथन का मानना है कि विप्रो को आईटी क्षेत्र में दिग्गज ब्रांड होने का फायदा एफएमसीजी कारोबार में भी मिलेगा। शर्मा कहते हैं, 'सूचना प्रौद्योगिकी के बेहतर इस्तेमाल से दोनों कारोबारों में तालमेल बिठाया जा सकता है। विप्रो को आपूर्ति श्रृखंला प्रबंधन में इसका लाभ मिलता है और कंपनी को अपना मार्जिन और लागत बेहतर करने में मदद मिलती है।'

फिलहाल तो विप्रो एफएमसीजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्द्धी कंपनियों से काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है। विप्रो कंज्यूमर केयर ऐंड लाइटनिंग के अध्यक्ष विनीत अग्रवाल ने बताया, 'जहां एफएमसीजी उद्योग सालाना 16 से 17 फीसदी की दर से विकास कर रहा है वहीं हमारी विकास दर 30 फीसदी के आस पास है।' कंपनी का करीब 50 फीसदी राजस्व दो प्रमुख साबुन ब्रांड संतूर और चंद्रिका से प्राप्त होता है।

वैल्यू फॉर मनी

पिछले तीन सालों में संतूर ने सालाना 29 फीसदी की दर से विकास किया है। वहीं चंद्रिका ने 18 फीसदी की दर से विकास किया है। हिंदुस्तान यूनिलीवर के लाइफबॉय और लक्स के बाद संतूर तीसरा सबसे बड़ा साबुन ब्रांड है।

दक्षिणी भारतीय बाजारों में तो यह सबसे आगे है। इस उत्पाद की आधी से अधिक बिक्री ग्रामीण बाजारों में होती है। सच्चाई तो यह है कि विप्रो को ग्रामीण बाजारों की अहमियत काफी पहले ही समझ आ गई थी। 1990 के आस पास ही कंपनी ने 50 ग्राम के छोटे पैक बाजार में उतार दिए थे जिनकी कीमत 5 रुपये थी।

करीब 10 साल पहले डॉटकॉम का बुलबुला फूटने से जो वैश्विक मंदी आई थी उस दौरान साबुन के बाजार में भी तेज बदलावट देखने को मिली। पहली बार ऐसा देखा गया कि ग्राहक एफएमसीजी उत्पादों की खरीदारी में भी कमी बरतने लगे थे।

बेहतर पहुंच

ऐसा नहीं है कि विप्रो ने ऊंचे तबके के ग्राहकों की अनदेखी शुरू कर दी है। उसने प्रीमियम श्रेणी के ग्राहकों के लिए संतूर के दो वेरिएंट्स संतूर वाइट और संतूर ग्लीसरिन पेश किए जिनके 75 ग्राम के पैक की कीमत करीब 20 रुपये थी।

साथ ही कंपनी ने इसी ब्रांड के फेस वॉश और हैंड वॉश भी बाजार में लॉन्च किए। वहीं कंपनी अब यार्डली उत्पादों के जरिए प्रीमियम वर्ग के ग्राहकों पर अपनी पकड़ बनाना चाहती है जिसमें बॉडी स्प्रे, साबुन, टैल्कम पाउडर आदि उत्पाद शामिल हैं। संतूर के 100 ग्राम के पैक की कीमत जहां 18 रुपये के करीब है वहीं इतने ही ग्राम के पैक के लिए यार्डली की कीमत 40 रुपये है।

उन्जा के जरिए विप्रो ने चीन और इंडोनेशिया, वियतनाम और मलेशिया जैसे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के बाजार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। उन्जा पर्सनल केयर उत्पाद बनाने वाली दक्षिण पूर्वी एशिया की सबसे बड़ी कंपनी है। विप्रो ने उन्जा को खरीदने के लिए अपने राजस्व का डेढ ग़ुना खर्च किया था। पर यह मुनाफे वाला सौदा नजर आता है।

इस साल कंपनी का वॉल्यूम ग्रोथ 13 फीसदी दर्ज किया गया। केपीएमजी के रामनाथन कहते हैं कि इस अधिग्रहण की बदौलत विप्रो को ऊंचे वर्ग के ग्राहकों तक पहुंच बनाने में मदद मिली।

कीवर्ड wipro, dabur, fmcg, personal care, skin care,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक