पुरानी है अधिग्रहण के लिए प्रतिद्वंद्वियों की लड़ाई

वीरेंद्र वर्मा और आशीष रुखइयार | मुंबई Feb 22, 2010 11:40 PM IST

मल्टीप्लेक्स ऑपरेटर आइनॉक्स लेशर ने हाल में जब प्रतिद्वंद्वी कंपनी फेम इंडिया में बड़ी हिस्सेदारी हासिल की तो इसे एक और अधिग्रहण मात्र समझा गया। पर ऐसा हुआ नहीं।

अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (एडीएजी) की कंपनी रिलायंस कैपिटल पार्टनर्स ने अगले दिन यह आरोप लगाकर हैरान कर दिया कि फेम इंडिया प्रवर्तकों ने उसकी ऊंची बोली की अनदेखी कर आइनॉक्स के पक्ष में फैसला दिया।

एडीएजी ने फेम इंडिया पर पारदर्शिता की कमी और शेयरधारकों के हितों के विरुद्ध काम करने जैसे आरोप लगा कंपनी में खुले बाजार से 11.5 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली। एडीएजी ने अब कहा है कि वह भी फेम के लिए ऑफर लाएगी।

इससे जाहिर हो गया कि यह मामला यहीं नहीं खत्म होने जा रहा बल्कि यह अभी खींचेगा। इससे पहले एडीएजी की कंपनी रिलायंस मीडियावर्क्स ने फेम इंडिया के प्रवर्तक श्रवण श्रॉफ से पूछा कि जब रिलायंस ने प्रति शेयर 80 रुपये का प्रस्ताव दिया तब भी क्यों उसने इससे कम कीमत पर अपने परिवार की 50.5 फीसदी हिस्सेदारी आइनॉक्स को बेच दी?

कोई नहीं जानता कि आखिर रिलायंस इसमें और हिस्सेदारी क्यों खरीदना चाहती है जबकि यहां आइनॉक्स की हिस्सेदारी पहले से ही 51 फीसदी है। बहरहाल फेम इस कॉरपोरेट लड़ाई में घिर चुकी है। आइनॉक्स का ओपेन ऑफर अप्रैल में आने वाला है, लेकिन लग रहा है इसे 51 रुपये का निर्धारित ऑफर प्राइस संशोधित करना पड़े।

रिलायंस ने आइनॉक्स के लिए यह सौदा निश्चित तौर पर महंगा बना दिया है। फेम का शेयर पिछले हफ्ते 75 रुपये को छू गया। एंबिट कॉरपोरेट फाइनैंस के सीईओ और एमडी संजय सखुजा ने कहा, 'हम इसे जवाबी ऑफर कह सकते हैं।' उनके मुताबिक, 'जब बोलीदाता समझता है कि संपत्ति का मूल्य कम कर आंका गया है तभी ऐसा होता है।'

ग्रेट ऑफशोर को लेकर इच्छुक दो बोलीदाताओं भारती शिपयार्ड और एबीजी शिपयार्ड में कीमत की प्रतिस्पर्द्धा देखी गई। एक अन्य उदाहरण उड़ीसा स्पंज आयरन ऐंड स्टील का है। इसके अधिग्रहण के लिए पिछले साल 3 कंपनियों भूषण स्टील, भूषण इनर्जी और मोन्नेट इस्पात ऐंड इनर्जी के बीच जोरदार प्रतिस्पद्र्धा हुई। कीमत को लेकर ऐसी प्रतिस्पद्र्धा पहली बार सन् 2000 में दिखी थी।

दिल्ली के अभिषेक डालमिया ने जेस्को कॉरपोरेशन (अब महिंद्रा लाइफस्पेस) के लिए बोली लगाई, पर महिंद्रा समूह की जवाबी बोली के बाद डालमिया को अपना इरादा छोड़ना पड़ा था।

आनंद राठी फाइनैंशियल सर्विसेज में इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के सीईओ रॉय रोड्रिग्स के मुताबिक, 'निश्चित स्तर पा लेने के बाद कंपनियां अन्य कंपनियों का रुख करती हैं। उन्हें अहसास होता है कि आकार मायने रखता है। यदि उन्होंने अधिग्रहण न किया तो अन्य ऐसा कर लेंगी।'

वे कहते हैं कि ऐसी प्रतिस्पर्द्धी बोलियां वे कंपनियां लगाती हैं जिनका मुख्य कारोबार स्थिर हो गया होता है, तब वह अपने सहयोगी कारोबार को मजबूत करने पर ध्यान देती हैं।

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