जेपी के जमीन हस्तांतरण पर पेच

बीएस संवाददाता | मुंबई/नई दिल्ली May 21, 2018 11:16 AM IST

 एनसीएलटी ने जेपी एसोसिएट्स को जेपी इन्फ्रा को जमीन हस्तांतरित करने का दिया निर्देश
एनसीएलटी के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती है जेपी
जेपी एसोसिएट्स ने बैंकों के पास 2016 में ही गिरवी रखा था भूखंड
 
बैंकों ने कहा, इस सौदे में कुछ भी गलत नहीं, मौजूद हैं प्रमाण

जेपी इन्फ्राटेक के भूखंड को प्रवर्तक कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स द्वारा बैंकों के पास गिरवी रखे जाने के मामले को लेकर बैंक विवादों के घेरे में हैं। हालांकि जेपी एसोसिएट्स ने कहा कि इसमें कोई गलती नहीं है और इसे साबित करने के लिए उसके पास दस्तावेज मौजूद हैं।

राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट (एनसीएलटी) के इलाहाबाद पीठ ने कंपनी को यह जमीन अपनी सहयोगी इकाई जेपी इन्फ्राटेक को लौटाने का निर्देश दिया था। एनसीएलटी ने इस जमीन के हस्तांतरण को फर्जी और कम मूल्य पर किया गया करार दिया था।

जेपी इन्फ्राटेक नोएडा इलाके में अपनी रियल एस्टेट परियोजनाओं को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही है और मकान खरीदारों ने जल्दी से मकान आवंटित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। अदालत ने समूह की कंपनियों का समापन कर परियोजना पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने की खातिर समाधान पेशेवर नियुक्त किया है।

समाधान पेशेवर ने एनसीएलटी में आरोप लगाया कि जेपी इन्फ्राटेक की 858 एकड़ जमीन प्रवर्तक कंपनी ने आईसीआईसीआई बैंक, भारतीय स्टेट बैंक और आईडीबीआई बैंक के पास गिरवी रख दिया है, जिसका मूल्य करीब 50 से 60 अरब रुपये है। प्रवर्तक कंपनी का प्रयास इसे गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) के रूप में शामिल नहीं करने का था लेकिन भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) सहित कंसोर्टियम के अन्य ऋणदाताओं ने ऋणदाताओं को अपने खाते में जोड़ा था।

दोनों कंपनियों का कुल कर्ज करीब 400 अरब रुपये है। पिछले साल सितंबर में उच्चतम न्यायालय ने जेपी एसोसिएट्स को जेपी इन्फ्रा के मकान खरीदारों के हितों की रक्षा के लिए 20 अरब रुपये जमा कराने का आदेश दिया था। कंपनी अब तक 7.5 अरब रुपये ही जमा करा पाई है। हाल ही में अदालतत ने जून तक अतिरिक्त 10 अरब रुपये जमा कराने के लिए कहा है।

उच्चतम न्यायालय ने जेपी इन्फ्रा के परिसमापन प्रक्रिया पर भी रोक लगा दी है जबकि दिवालिया प्रक्रिया पूरी करने की अनिवार्य अवधि 270 दिन पूरी हो गई है। इन्सॉल्वेंशी पेशेवर अनुज जैन कंपनी के प्रबंधन में बने हुए हैं और वह लक्षद्वीप इन्वेस्टमेंट ऐंड फाइनैंस, अदाणी समूह और क्यूब हाईवेज से नई बोली आमंत्रित कर सकते हैं। ऋणदाता अब उच्चतम न्यायालय के मूल आदेश में स्पष्टता चाहते हैं।

आदेश में कहा गया है कि सांविधिक प्रक्रिया अगले आदेया तक जारी रहेगी। इसका मतलब है कि कंपनी अब भी समाधान पेशेवर के जिम्मे होगी। हालांकि नई बोली स्पष्टता मिलने के बाद ही मंगाई जाएगी। सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंकर ने कहा, 'जेपी इन्फाटेक और जेपी एसोसिएट्स दो अलग-अलग कंपनी है। ऐसे में कर्ज अलग है और प्रत्येक मामले में अलग निर्णय लिया गया है।'

हालांकि जमीन मामले से जुड़े तीनों ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। आईसीआईसीआई बैंक और एलआईसी को इस बारे में ईमेल भेजा गया लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया। हालांकि बैंक के कुछ अधिकारियों ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर व्यक्तिगत हैसियत से बताया कि इस पूरे सौदे में कुछ भी गलत नहीं है। भूखंड को 2016 की शुरुआत में गिरवी रखा गया था जब प्रवर्तक कंपनी ने अपना मुख्यालय भी गिरवी रख दिया था।

बैंकरों का कहना है कि अगर भूखंड का मूल्य 50 से 60 अरब रुपये है तो पूरे भूखंड को कम समय में बेचना संभव नहीं होगा। बैंक के एक अधिकारी ने कहा, 'अगर आप इतने बड़े भूखंड को आनन-फानन में बेचते हैं तो आपको 60 फीसदी कम मूल्य मिलेगा। कोई भी ऐसा निवेशक नहीं मिलेगा जो एकबारगी इतना भूखंड खरीद सके। अगर आप बेहतर मूल्य चाहते हैं तो इसमें वर्षों लग सकता है और उसे टुकड़ों में बेचना होगा।

बैंक केवल यह देखता है कि वह कितना वसूल सकता है, यही वजह है कि हमारा मूल्यांकन दूसरों से अलग होता है।' बैंकों का कहना है कि उनके पास इसके साक्ष्य हैं उक्त भूखंड प्रवर्तक के हैं और जरूरत पडऩे पर इस बारे में अदालत में साक्ष्य दिखाए जा सकते हैं। आईसीआईसीआई बैंक प्रवर्तक कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स की प्रमुख ऋणदाता है, वहीं आईडीबीआई बैंक जेपी इन्फ्राटेक के ऋणदाताओं के कंसोर्टियम की अगुआई कर रहा है।

जेपी समूह में भारतीय स्टेट बैंक का करीब 70 अरब रुपये का कर्ज फंसा है, वहीं आईसीआईसीआई बैंक का करीब 60 अरब रुपये लगा है। आईडीबीआई का समूह में करीब 70 अरब रुपये का ऋण अटका हुआ है।

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