एसएफआईओ में कार्मिकों का टोटा

वीणा मणि | नई दिल्ली Jun 05, 2018 10:46 AM IST

देश में धोखाधड़ी के गंभीर आरोपों की जांच करने वाली संस्था को कर्मचारियों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है जिस कारण उसका कामकाज प्रभावित हो रहा है। गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय में आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं।  हाल में केंद्र ने धोखाधड़ी के 19 मामले एसएफआईओ को सौंपे हैं लेकिन सूत्रों का कहना है कि इन मामलों की जांच समय पर पूरी करना मुश्किल होगा क्योंकि एजेंसी के पास कर्मचारियों की भारी कमी है।  

आंकड़ों के मुताबिक एसएफआईओ में करीब 50 फीसदी पद खाली पड़े हैं। एजेंसी में विभिन्न श्रेणी के मंजूर पदों की संख्या 133 है लेकिन इनमें से 69 खाली पड़े हैं। इसी तरह 75 पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने हैं लेकिन इसमें भी 50 पद खाली पड़े हैं। एसएफआईओ कई महत्त्वपूर्ण मामलों की जांच कर रहा है जिसमें आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी द्वारा पंजाब नैशनल बैंक में किया गया फर्जीवाड़ा शामिल है।

एजेंसी ने आईसीआईसीआई बैंक की मुख्य कार्याधिकारी चंदा कोछड़ और ऐक्सिस बैंक की प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी शिखा शर्मा को भी पूछताछ के लिए बुलाया था। साथ ही वह रुचि सोया, स्टर्लिंग बायोटेक और कनिष्क गोल्ड द्वारा की गई कथित वित्तीय अनियमितताओं की भी जांच कर रही है। एजेंसी को गिरफ्तार करने का भी अधिकार देकर ज्यादा सशक्त बनाया गया है।

 

कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय को एसएफआईओ में रिक्त पदों को भरने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और उसने 10 पदों को भरने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से संपर्क साधा है। साथ ही मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से जांच भत्ते के रूप में अतिरिक्त फंड मांगा था। इससे मंत्रालय को विभिन्न मामलों की जांच के लिए दूसरे मंत्रालयों से अधिकारियों को बुलाने में मदद मिलती है। अलबत्ता सातवें वेतन आयोग ने इस प्रावधान को खत्म कर दिया।

आयोग का तर्क था कि प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारियों को पहले से ही प्रतिनियुक्ति भत्ता मिलता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 से 31 जनवरी 2018 के  दौरान 4 साल में 447 कंपनियों से जुड़े 73 मामलों को एसएफआईओ को सौंपा गया था। इनमें से 31 मामलों को निपटाया जा चुका है। हर मामले को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाने का औसत समय 62 महीने है। यह समय पिछले वर्षों के मुकाबले सर्वाधिक है।

उदाहरण के लिए 2014-15 में यह 51 महीने, 2015-16 में 36 महीने और 2016-17 में 36 महीने था। 42 फीसदी मामलों में दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि एसएफआईओ में कर्मचारियों की कमी का कारण यह है कि उम्मीदवारों के पास किसी कंपनी की धोखाधड़ी की जांच के लिए तकनीकी विशेषज्ञता नहीं है। उन्होंने कहा कि एजेंसी में विशेषज्ञों की भर्ती के लिए प्रयास किए गए थे।

ट्राईलीगल में पार्टनर आशीष भान कहते हैं कि पिछले 4 वर्षों में वित्तीय अपराधों के बढऩे से एसएफआईओ की अहमियत बढ़ गई है। इससे एजेंसी पर दबाव बढ़ गया है और सरकार के पास पूर्णकालिक पेशेवरों की भर्ती के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 

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