छोटे उपक्रम बनें बड़े : पानगडिय़ा

इंदिवजल धस्माना | नई दिल्ली Jul 10, 2017 09:45 PM IST

बेरोजगारी को देश के सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बताते हुए नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिय़ा ने आर्थिक वृद्धि की रफ्तार तेज करने के लिए श्रमिकों को कृषि से उद्योगों की ओर ले जाने तथा छोटे उपक्रमों को बड़ा बनने के लिए प्रोत्साहित करने की जोरदार वकालत की है। राज्यों के मुख्य सचिवों की एक बैठक में प्रस्तुति देते हुए पानगडिय़ा ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा जैसी सामाजिक प्राथमिकताओं मेंं व्यय आर्थिक वृद्धि में तेजी लाकर ही बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि छठी आर्थिक जनगणना के मुताबिक कुल 47 करोड़ कर्मचारियों में सिर्फ 2.08 करोड़ कर्मचारी ही ऐसे हैं तो 10 या इससे ज्यादा कर्मचारियों वाले उद्यम में लगे हैं। 
 
इस तरह से देखें तो 44.2 करोड़ कामगार या कुल कामगारों के 91.2 प्रतिशत कृषि या ऐसे उद्यमों में लगे हुए हैं, जिनमें 9 या इससे कम कर्मचारी काम करते हैं। अगर दूसरे पहलू से देखें तो कुल 5.85 करोड़ प्रतिष्ठानों मेंं से सिर्फ 1.37 प्रतिशत ही ऐसे हैं जिनमें 10 या इससे ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। उन्होंने कहा, 'उत्पादकता बढ़ाने के लिए नीतिगत वातावरण बनाने की जरूरत होती है, जिससे हमारे उद्योगों को तेजी से बढऩे में मदद मिलेगी। हमारे यहां उद्यमों की कमी नहीं है। कमी बड़े उद्यमों की है। हमें इसे ध्यान में रखते हुए नीति तय करना होगा। सूक्ष्य उद्योग छोटे, छोटे उद्यम मझोले और मझोले उद्योग बड़े उद्योग में तब्दील किए जाएं।' 
 
उन्होंने कहा, 'यदि हम कृषि क्षेत्र में प्रति श्रमिक उत्पादन को एक मानते हैं तो उद्योग में यह प्रति श्रमिक पांच और सेवा क्षेत्र में  3.8 है।' पानगडिय़ा ने कहा, 'दूसरे शब्दों में, हर क्षेत्र में उत्पादकता के मौजजूदा स्तर पर भी कृषि से उद्योग में एक प्रतिशत श्रमिकों के चले जाने से जीडीपी में 1.5 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।' उन्होंने कहा कि संभवत: बेरोजगारी भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा, 'हमारे उपक्रम बहुत ही छोटे हैं और वे ऐसे ही रहे हैं।' उन्होंने कहा कि उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है जिससे हमारे उपक्रमों को ऊंची छलांग लगाने में मदद मिले। 
 
उन्होंने कहा कि विकास तेज करना ही गरीबी उन्मूलन का एकमात्र विकल्प है। काम का पुनर्वितरण तभी होगा, जब वृद्धि तेज होगी। उन्होंने कहा, 'केरल की तुलना में बिहार में पुनर्वितरण की गुंजाइश कम है। लेकिन केरल की भी सीमाएं हैं। राजनीतिक रूप से देखें तो पुनर्वितरण तब ज्यादा व्यावहारिक हो सकेगा जब कुल आमदनी तेजी से बढ़े।' पानगडिय़ा ने कहा कि हर मंत्रालय को इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि क्या निश्चित रूप से किया जाना चाहिए और बेहतर कैसे किया जा सकता है। 
कीवर्ड niti aayog, नीति आयोग अरविंद पानगडिय़ा,

  
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