जीएसटी कर व्यवस्था का एसएमई पर बुरा असर

विनय उमरजी |  Jul 30, 2017 09:29 PM IST

सूरत के हीरा तराशकार अर्जनभाई अंबालिया फिर से नोटबंदी जैसे हालात से गुजर रहे हैं। एक जुलाई से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद मुश्किल से ही उनके पास कोई ऑर्डर आ रहे हैं। अंबालिया ने कहा, 'हमने हमेशा की तरह मई-जून में ही कारोबार चालू किया था। उसी समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट आ रही थी, लेकिन 1 जुलाई के बाद तो मासिक कारोबार करीब 70 फीसदी घट गया है।' 46 साल के अंबालिया कच्चे हीरों के आयातकों और जीएसटी को न अपनाने वाले जॉब वर्कर के बीच फंस गए हैं। हीरा उद्योग के ज्यादातर असंगठित जॉबवर्कर (ठेके पर काम करने वाले) जीएसटी से नहीं जुड़ऩा चाहते हैं, जिसमें हीरों के 50 फीसदी मूल्य संवर्धन पर 2.5 फीसदी शुल्क लगाया गया है।  कच्चे हीरों के आयातक अंबालिया जैसे तराशकारों को हीरों की आपूर्ति पर 0.25 फीसदी जीएसटी चुकाते हैं। लेकिन अंबालिया जैसे तराशकारों को ठेके पर कराए गए काम के लिए 2.5 फीसदी से 5 फीसदी शुल्क चुकाना पड़ता है, जो हीरों के मूल्य संवर्धन पर निर्भर करता है। उसके बाद जब अंबालिया तराशे हुए हीरों की निर्यातकों को आपूर्ति करते हैं तो इस पर फिर 3 फीसदी जीएसटी लगता है। अंबालिया कहते हैं, 'मैं जीएसटी के तहत लंबे समय से पंजीकृत हूं, लेकिन जॉब वर्करों के जीएसटी को न अपनाने से उन्हें नुकसान हो रहा है।'

 
वडोदरा की प्रकाश केमिकल्स इंटरनैशनल प्राइवेट लिमिटेड का जैविक और अजैविक रसायनों का निर्यात कारोबार मई और जून की तुलना में 50 फीसदी कम हो गया है। इस लघु एवं मझोली इकाई (एसएमई) के प्रबंध निदेशक मनीष शाह के समक्ष दिक्कत यह बढ़ गई है कि नई कर प्रणाली में 18 से 20 फीसदी अतिरिक्त कार्यशील पूंजी रुक गई है। भले ही यह कपड़ा हो, हीरा हो या रसायन, सभी क्षेत्रों के एसएमई का कारोबार जुलाई में 'धीमा' या 'स्थिर' रहा है। हालांकि एसएमई को सरकार के इस आश्वासन से थोड़ी राहत मिली है कि पहले महीने जीएसटी रिटर्न भरने में होने वाली गलतियों के प्रति नरम रुख अपनाया जाएगा। लेकिन ऐसे समय जीएसटी के बुनियादी पहलुओं को लेकर भ्रम की स्थिति चिंताजनक है, जब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में गिरावट आ रही है। 
 
अगर रसायन जैसे उद्योगों के निर्यातकों को रिफंड मिलने तक अतिरिक्त कार्यशील पूंजी रुकने की स्थितियों से जूझना पड़ रहा है तो रिवर्स चार्ज प्रणाली और अनुपयोगी ड्यूटी क्रेडिट सूरत जैसे कपड़ा क्लस्टर में एसएमई के सामने मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। बड़ी कपड़ा मिलें कच्चा माल खरीदती हैं और तैयार माल बेच देती हैं। लेकिन पूरी मूल्य शृंखला में मौजूद स्पिनिंग, साइजिंग ऐंड ट्विस्टिंग, बुनाई, डाई एवं प्रसंस्करण और परिधान विनिर्माता जैसी छोटी कंपनियों के सामने कई दिक्कतें हैं। उदाहरण के लिए सिंथेटिक साड़ी खुदरा विक्रेता तक पहुंचने तक 15 से 18 चरणों से गुजरती है, इसलिए प्रत्येक चरण में जीएसटी का पालन करने की जरूरत होगी। 
 
पंडेसारा वीवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आशीष गुजराती ने कहा, 'हमारे जैसी विक्रेंद्रित उद्यमी के लिए इतने रिटर्न भरना बुरे सपना जैसा है। सरकार ने यह आश्वासन दिया है कि 20 लाख रुपये से कम कारोबार वाले जॉब वर्कर को पंजीकरण करने की जरूरत नहीं है, लेकिन इसके बावजूद मास्टर बुनकरों को आरसीएम के तहत कर का बोझ वहन करना होगा।' पंडेसारा वीवर्स एसोसिएशन  के सदस्य मास्टर बुनकर हैं, जो सूरत के औद्योगिक क्षेत्र में 2 लाख से अधिक पावरलूम का संचालन करते हैं। 
 
एक आम सिंथेटिक साड़ी या परिधान के कपड़ा विभिन्न चरणों से गुजरता है और प्रत्येक चरण में जीएसटी की अलग-अलग दरें हैं और प्रत्येक स्तर पर कर अनुपालना जरूरी है। इनपुट के रूप में सिंथेटिक धागे पर 18 फीसदी जीएसटी है, साइजिंग एवं ट्विस्टिंग जॉब वर्क पर 18 फीसदी अलग जीएसटी है। इसके बाद कपड़ा बुनाई, प्रसंस्करण और बुने हुए कपड़े को कपड़ा कारोबारी को आपूर्ति तक हर जगह 5 फीसदी जीएसटी है। हालांकि इनपुट टैक्स क्रेडिट के प्रावधान है, जिसमें जीएसटी के तहत सरकार रिफंड करती है। लेकिन इसके बावजूद बुनकर अतिरिक्त संचित क्रेडिट को लेकर मास्टर बुनकर शिकायत कर रहे हैं, जो रिफंड के तहत नहीं आएगा। 
 
गुजराती ने कहा, 'सिंथेटिक धागे से लेकर कारोबारी को बुने हुए कपड़े की आपूर्ति तक मास्टर बुनकर पर 1.2 रुपये प्रति किलोग्राम का अतिरिक्त ड्यूटी क्रेडिट जुड़ जाता है। यह इस इनपुट टैक्स क्रेडिट को घटाने के बाद है, जो सरकार द्वारा रिफंड किया जाएगा। यह पहला महीना है, इसलिए हमें यह नहीं पता कि ऐसे रिफंड कब दिए जाएंगे। हम जैसे उद्यमियों के लिए इसका यह भी मतलब है कि इसमें अतिरिक्त कार्यशील पूंजी फंस जाएगी।'
 
अतिरिक्त कार्यशील पूंजी के मसले से रसायन उद्योग भी जूझ रहा है, जहां प्रकाश केमिकल्स और ह्युबच कलर्स जैसी कंपनियां इस महीने पहले ही 20 फीसदी ज्यादा उधारी ले चुकी हैं। शाह कहते हैं, 'यह हम पर दोहरी मार है। निर्यात पहले ही कमजोर बना हुआ है। इसके अलावा पहले हमारे जैसी निर्यात करने वाली इकाइयां कर से मुक्त थीं। लेकिन जीएसटी प्रणाली में हमें पहले 18 फीसदी शुल्क चुकाना होगा और उसके बाद रिफंड लेना होगा, जिसमें 60 दिन का समय लगेगा। यह पूरी तरह अस्पष्टता है और यह हमें ऐसे समय प्रभावित कर रही है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजारों के हालात ठीक नहीं हैं।' शाह को कर का भुगतान करने के लिए जुलाई में कार्यशील पूंजी के रूप में 120 करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ा है जबकि पिछले महीनों में 100 करोड़ रुपये का ही कर्ज लेना पड़ रहा था। 
 
नई प्रणाली के तहत व्यापारी निर्यातकों को किसी महीने में निर्यात पर चुकाए गए 18 फीसदी कर के लिए उससे अगले महीने की 20 तारीख तक रिटर्न भरना होगा। रिटर्न भरने के बाद 90 फीसदी राशि रिटर्न भरने के 7 दिन के भीतर रिफंड हो जाएगी। शेष राशि मिलने में 60 दिन का समय लगेगा। शाह ने कहा, 'सरकार का कहना है कि शेष 10 फीसदी रिफंड में 60 दिन का समय लगेगा क्योंकि जीएसटी अधिकारियों को जांच-पड़ताल करनी होगी। छोटे व्यापारी निर्यातकों को ऐसे रिफंड हासिल करने में दिक्कतें आने की आशंका है।' 
कीवर्ड GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक