पहला महीना रहा चुनौतीपूर्ण

अर्णव दत्ता और राघवेंद्र कामत |  Jul 30, 2017 09:30 PM IST

आजादी के बाद के सबसे बड़े कर सुधार बताए जा रहे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू हुए करीब एक महीना होने वाला है लेकिन अब भी उद्योग जगत के लिए नई कर प्रणाली से संबंधित तस्वीर साफ नहीं हुई है। रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले उत्पाद (एफएमसीजी) बनाने वाली कंपनियों से लेकर खुदरा, रियल एस्टेट और निर्माण क्षेत्र की कंपनियों तक को नई व्यवस्था के मुताबिक खुद को ढालने में परेशानी हो रही है। दुकानदारों और आपूर्तिकर्ताओं को जीएसटी के अनुपालन में काफी दिक्कतें हो रही हैं। खास तौर पर विनिर्माताओं पर इसकी सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ी है। इसकी वजह यह है कि एफएमसीजी कंपनियों ने जीएसटी लागू होने के कुछ दिनों पहले से ही खरीद के ऑर्डर देने बंद कर दिए थे। अधिकतर कारोबारियों और छोटे आपूर्तिकताओं ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में कहा कि उन्हें नई कर प्रणाली के मुताबिक खुद का ढालने के लिए अभी वक्त चाहिए। अधिकतर कारोबारी निजी बातचीत में यह कबूल करते हैं कि उन्हें जीएसटी के मुताबिक कारोबार करने का कोई तरीका ही नहीं दिख रहा है। कंपनियों का दावा है कि वे जीएसटी प्रणाली के मुताबिक खुद को ढालने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हैं। कंपनियां जीएसटी पर सेमिनार आयोजित करने के अलावा हेल्पलाइन नंबर जारी कर रही हैं और रिटर्न जमा करने के लिए कर सलाहकारों की भी मदद ले रही हैं। यह प्रक्रिया सितंबर तक चलने की संभावना है क्योंकि इन मददगारों का बड़ा हिस्सा उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर है।

 
गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के कारोबार प्रमुख (भारत एवं दक्षेस) सुनील कटारिया कहते हैं कि व्यापक सुधार होने से बदलाव पूरा होने में वक्त लगेगा। कटारिया कहते हैं, 'हमारी आंतरिक प्रणाली तैयार है लेकिन हमारे वितरक अब भी बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। मेरा मानना है कि बदलाव पूरा होने में कम-से-कम 30 दिनों का वक्त लगेगा।' डाबर इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी सुनील दुग्गल की भी कुछ ऐसी ही राय है। वह कहते हैं, 'जीएसटी लंबी अवधि में कारोबार के लिए फायदेमंद होगा लेकिन सीमित अवधि में गतिरोध की स्थिति बनेगी। थोक बिक्री का बड़ा हिस्सा जीएसटी का अनुपालन करने लगेगा और अपना कारोबार भी उसी के हिसाब से करने लगेगा। हालांकि इस प्रक्रिया में लगने वाला समय अनुमान से अधिक होगा।' दूसरी तरफ संगठित खुदरा विक्रेताओं का मानना है कि 1 जुलाई को जीएसटी लागू होने के बाद एक महीना पूरा होने वाला है लेकिन उनमें से कई कारोबारियों के सामने सबसे बड़ा मुद्दा बिल ढांचे का नवीनीकरण है। अब भी काफी कारोबारी बिल ढांचे को जीएसटी के मुताबिक नहीं ढाल पाए हैं जिसकी वजह से खरीदार भी परेशान हो रहे हैं। 
 
संगठित खुदरा कंपनी डी-मार्ट के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी नेविल नरोन्हा कहते हैं, 'वैट और बिक्री कर की जगह जीएसटी तो आ गया है लेकिन कीमतों को लेकर संवेदनशील खरीदारों में बिल बढऩे का डर देखा जा रहा है। इस वजह से बिक्री पर भी असर पड़ रहा है। हालांकि पहले पखवाड़े की तुलना में हालात बेहतर हुए हैं।' देश में संगठित खुदरा क्षेत्र के सबसे बड़े समूह फ्यूचर ग्रुप के मुख्य कार्याधिकारी किशोर बियाणी भी इस बात को मानते हैं कि जीएसटी के चलते दाम बढऩे के डर ने बिक्री को प्रभावित किया है। इस वजह से लोगों को जागरूक करने के लिए फ्यूचर ग्रुप ने उपभोक्ता अभियान भी शुरू किया है।
 
खुदरा विक्रेताओं की शीर्ष संस्था आरएआई ने इस मसले पर पिछले हफ्ते वित्त मंत्री अरुण जेटली के समक्ष गुहार भी लगाई है। उनके आवेदन में कहा गया है कि विक्रेताओं को खुदरा कैश मेमो देने की मंजूरी दी जाए जिस पर बिके हुए सभी उत्पादों का विवरण और जीएसटी समेत समस्त मूल्य की जानकारी भी लिखी हो। आरएआई के मुख्य कार्यकारी कुमार राजगोपालन कहते हैं कि इस कैश मेमो पर दर्ज सभी उत्पादों का मूल्य जीएसटी के साथ दर्ज किया जाएगा। 
 
दूसरी तरफ प्रीमियम एवं लक्जरी प्रॉपर्टी के विकास से जुड़े रियल एस्टेट डेवलपरों को जीएसटी लागू होने के बाद मांग में कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह यह है कि बिकने वाली प्रॉपर्टी पर लगने वाला कर अब बढ़ गया है। मुंबई स्थित वाधवा ग्रुप के चेयरमैन विजय वाधवा कहते हैं, 'पहले से ही बाजार सुस्त होने की वजह से डेवलपर भी बढ़े हुए कर का बोझ खुद वहन कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। रियल एस्टेट पर 12 फीसदी की दर से जीएसटी लगना काफी भारी पड़ रहा है।' जीएसटी लागू होने के पहले घर खरीदने वाले लोगों को 4.5 फीसदी सेवा कर के अलावा राज्य में लागू वैट (1 से लेकर 4 फीसदी) भी देना पड़ता था। लेकिन जीएसटी के तहत 12 फीसदी कर रखने से मांग पर खासा असर देखा जा रहा है।
कीवर्ड GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,

  
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