गिरती अर्थव्यवस्था और बढ़ता घाटा चिंता का विषय

इंदिवजल धस्माना | नई दिल्ली Sep 03, 2017 10:05 PM IST

नरेंद्र मोदी सरकार के 3 साल के कार्यकाल में आर्थिक वृद्धि दर न्यूनतम स्तर 5.7 प्रतिशत पर पहुंचने की वजह से सरकार ऊहापोह की स्थिति में पहुंच गई है। सरकार के सामने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने या अर्थव्यवस्था मेंं तेजी लाने के बीच संतुलन साधने की चुनौती है। राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष के पहले 4 महीनों में ही बजट अनुमान के 92 प्रतिशत पर पहुंच गया है। अप्रैल जुलाई 2016-17  के दौरान राजकोषीय घाटा बजट अनुमान का 74 प्रतिशत था, जो मुख्य रूप से पूंजीगत व्यय की वजह से हुआ। सालाना आधार पर अप्रैल जुलाई के बीच पूंजीगत व्यय 33 प्रतिशत बढ़ा है। उसके बाद भी आर्थिक वृद्धि दर धराशायी हो गई। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में 3.2 प्रतिशत के कम राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा था, जो इसके पहले के साल में 3.5 प्रतिशत था। 

 
पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कहते हैं कि सरकार को अर्थव्यवस्था को गति देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने कहा, 'सकल घरेलू उत्पाद में 5.7 प्रतिशत की वृद्धि दर चिंतित करने वाली है। हम ऐसी स्थिति में हैं, जहां सरकार को प्रति चक्रीय उपाय करने होंगे।' उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें इस स्थिति में नहीं हैं कि यह कदम उठाया जा सके। उन्होंने कहा, 'एकमात्र उम्मीद केंद्र सरकार की ओर से किए जाने वाले व्यय से है।' जहां केंद्र सराकर के वित्त में हाल के वर्षों में समेकन नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में विपरीत स्थिति है। 
 
भारतीय स्टेट बैंक समूह में मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष ने कहा कि आप दोनों उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकते कि वृद्धि पर बल दिया जाए और राजकोषीय घाटे को भी लक्षित स्तर पर रखा जा सके। उन्होंने सुझाव दिया, 'आपको आर्थिक गतिविधियां बढ़ानी होंगी, भले ही इससे राजकोषीय घाटा बढ़कर 3.5 प्रतिशत पर पहुंच जाए।'  उन्होंने कहा कि दिवाला एवं दिवालिया संहिता के माध्यम से मामलों का समाधान चालू वित्त वर्ष की चौथी तिमाही तक ही हो पाना संभव है। जब तक ऐसा नहीं होता है, नया निवेश नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि सरकार जीएसटी से मिली ज्यादा प्राप्तियों को आर्थिक विस्तार के लिए बुनियादी ढांचे पर खर्ज कर सकती है। केंद्र व राज्य सरकारों ने जुलाई में जीएसटी से 92,283 करोड़ रुपये कमाए हैं, जबकि 91,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया था। 
 
बहररहाल, उल्लेखनीय है कि पिछले साल की समान अवधि की तुलना में चालू वित्त वर्ष के पहले 4 महीनों में पूंजीगत व्यय एक तिहाई बढ़ा है, वहीं सरकार ने बजट अनुमान की तुलना में इस श्रेणी में कुछ कम खर्च किया है। अभी सरकार को बजट अनुमान का 70 प्रतिशत खर्च करना है, जिसका मतलब हुआ कि अभी 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा अभी शेष 8 महीनों में खर्च करना है, जिससे राजकोषीय घाटे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। प्राप्तियों में कोई गिरावट न होने की स्थिति में राजस्व व्यय लक्ष्य से आगे नहीं जाएगा। 
 
इक्रा में मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर का कहना है कि अगर प्रत्यक्ष कर में हाल की तेजी बरकरार रहती है और जीएसटी की वजह से अप्रत्यक्ष कर में तेजी आती है तो पूंजीगत व्यय बढ़ सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में, जिनका असर आर्थिक वृद्धि दर पर बहुत ज्यादा होता है। इसमें सस्ते मकान, परिवहन और शहरी बुनियादी ढांचा शामिल हैं। अगर ऐसे क्षेत्रों में व्यय बढ़ाया जाता है तो इससे प्रमुख उद्योग जैसे सीमेंट और स्टील बहाल होंगे और रोजगार में तेजी आएगी। उन्होंने कहा कि इससे सकारात्मक माहौल बनेगा। 
 
हालांकि इंडिया रेटिंग में मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत का कहना है कि सरकार की ओर से पूंजीगत व्यय बढ़ाने की एक सीमा है। उन्होंने कहा कि सरकारी पूंजीगत व्यय देश के कुल पूंजीगत व्यय का महज 11 या 12 प्रतिशत ही होता है। उनका कहना है कि सरकार को परियोजनाओं की राह मेंं आने वाली बाधाओं को दूर करना होगा। क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी ने कहा, 'मुझे लगता है कि फिलहाल सरकार के पास राजकोषीय छूट नहीं है, जिससे वह आर्थिक वृद्धि को गति दे सके।' उन्होंने कहा कि कोई ऐसी जादुई छड़ी नहीं है, जिससे सरकार स्थिति सुधार दे। बहरहाल उनका मानना है कि आने वाली तिमाहियों में आर्थिक वृद्धि दर गति पकड़ेगी क्योंकि बेस इफेक्ट कम होने, बेहतर मॉनसून और वेतन में बढ़ोतरी का असर पड़ेगा। 
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