पटरी से उतर सकती है क्षेत्रीय सहयोग वार्ता

शुभायन चक्रवर्ती | नई दिल्ली Sep 10, 2017 09:25 PM IST

भारत की ओर से मिल रही कारोबारी छूट को जारी रखने के लिए वार्ताकार देशों की ओर बहुत ज्यादा दबाव के कारण वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु की पहली अंतरराष्ट्रीय बातचीत पटरी से उतर सकती है। प्रभु इस समय क्षेत्रीय समग्र आर्थिक हिस्सेदारी (आरसीईपी) की मंत्रिस्तरीय बैठक में भाग लेने के लिए फिलीपींस में हैं।
इस मामले से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र ने बताया कि इस समय मनीला मेंं प्रभु उन मसलों को फिर से उठा सकते हैं, जिन्हें पिछले कुछ दौर की वार्ताओं मेंं उठाया जाता रहा है। भारत ने सेवा और निवेश सहित कुछ क्षेत्रों को छूट की अनुमति देने में दिलचस्पी दिखाई है। उन्होंने कहा कि अमीर देश वस्तुओं के कारोबार में मिलने वाले छूटोंं की तरह ही छूट जारी रखे जाने के इच्छुक हैं।
कारोबारी भाषा में 'रैचट' के नाम से प्रचलित अवधारणा में प्रावधान है कि भविष्य में भारत में घरेलू स्तर पर होने वाली पहल आरसीईपी समझौते के तहत स्वत: आ जाएगी, नीतिगत फैसले में आरसीईपी समझौते खुद ब खुद बाध्यकारी होंगे।
एक सूत्र ने  कहा कि भारत एमएफएन (मोस्ट फेवर्ड नेशन) के फार्वर्ड क्लॉज पर भी सहमत है।  भविष्य में होने वाले निवेश या सेवाओं पर छूट दिए जाने के लिए द्विपक्षीय समझता स्वत: ही आरसीईपी सदस्यों पर स्वत: ही लागू हो जाएगा, जिसमें समयावधि का कोई अंतर नहीं होगा। 
कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों में दोनों अवधारणाओं को लेकर विवाद रहा है, जिनका कहना है कि इससे भारत की वार्ता करने की संभावना पर अंकुश लगता है, जब घरेलू नीति के लिए संभावनाओं में कटौती की बात आती है। दिलचस्प है कि इन दो प्रावधानों को लेकर असहमति की वजह से भारत के सामने प्रस्तावित कारोबार एवं सेवा समझौता में शामिल होने में कठिनाई आएगी, जिस पर इस समय अमेरिका व यूरोपीय संघ के साथ अन्य देश चर्चा कर रहे हैं।
आरईसीपी मेंं एसोसिएशन आफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस (आसियान) के 10 देश और 6 अन्य देशों ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का प्रस्ताव है।
यह बातचीत औपचारिक रूप से 2012 के आखिर में शुरू की गई थी, जिससे एशियाई देशों की दिक्कतें बढ़ गई थीं, जो चाहते हैं कि आरसीईपी में 2017 के पहले अर्थपूर्ण प्रगति हो, जब इस ब्लॉक के 50 साल पूरे होंगे।
इससे संबंधित एक नोट मेंं मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) पर वार्ता के निष्कर्ष और चीन के हॉन्गकॉन्ड स्पेशन एडमिनिस्ट्रेटिव क्षेत्र की वार्ता के निष्कर्षों की घोषणा की गई है।
इसके पहले आरसीईपी की बैठक हैदराबाद में हुई थी। उस दौरान सिविल सोसाइटी समूहों ने प्रस्तावित समझौते के विभिन्न पहलुओं को लेकर चिंता जताई थी। थर्ड वल्र्ड नेटवर्क एनजीओ की रंजना सेनगुप्ता ने कहा, 'कृषि पर शुल्क में कटौती का मतलब यह होगा कि ऑस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड जैसे देशों की बाजार की पहुंच से दूर होना है, जो डेयरी, मांस और समुद्री खाद्य के बड़े उत्पादक हैं। इसके साथ ही उत्पादों की गुणवत्ता के उच्च मानकोंं से भी भारतीय निर्यातकों की संभावना खत्म हो जाएगी।  इसके अलावा पेशेंट केयर ग्रुपोंं ने भी प्रस्तावित बौद्धिक संपदा मानकोंं को लेकर चिंता जताई है, जिसकी वजह से सस्ती भारतीय जेनेरिक दवाओं का उत्पादन महंगा हो जाएगा, जिसे जीवन रक्षक दवा माना जाता है और पूरी दुनिया में जीवन रक्षक के रूप में इनका इस्तेमाल होता है।

कीवर्ड Commeerce minister, Suresh prabhu, RCEP,

  
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