पेट्रोलियम पर जीएसटी को लेकर डर रहे राज्य

इंदिवजल धस्माना | नई दिल्ली Sep 21, 2017 10:24 PM IST

पेट्रोलियम पर जीएसटी की मुश्किलें

भले ही घाटे पर 5 साल तक मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन अपने कराधान के अधिकार को लेकर लचीलापन चाहते हैं राज्य
पेट्रोलियम पर केंद्र सरकार विशेष कर लगाती है, जबकि राज्य मूल्यानुसार कर लगाते हैं
कीमतें बढ़ने से राज्यों को होता है ज्यादा लाभ

राज्य सरकारें पेट्रोलियम पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किए जाने की इच्छुक नहीं है। नए अप्रत्यक्ष कर से होने वाले राजस्व नुकसान पर पहले 5 साल तक राज्यों को मुआवजे का प्रावधान किया गया है, लेकिन उन्हें डर है कि पेट्रोलियम पर जीएसटी लागू होने से वे लचीलापन गंवा देंगे, जबकि पेट्रोलियम पर कर राज्यों की आमदनी का प्रमुख स्रोत है।

पांच पेट्रोलियम उत्पाद- कच्चा तेल, पेट्रोल, डीजल, प्राकृतिक गैस और विमान ईंधन (एटीएफ) जीएसटी के दायरे से अभी बाहर हैं। जीसटी परिषद ने इन्हें नए कर के दायरे में लाने पर चर्चा नहीं की है, हालांकि परिषद इस पर 2 साल में फैसला कर सकती है।
पेट्रोलियम पर उत्पाद शुल्क मेंं कटौती न करने की वजह से केंद्र की आलोचना हो रही है वहीं राज्यों को पेट्रोलियम के दाम में बढ़ोतरी से ज्यादा लाभ हो रहा है। राज्यों की ओर से लगाया जाने वाला मूल्यवर्धित कर या बिक्री कर पेट्रोलियम के दाम के मुताबिक लगता है, जबकि केंद्र सरकार विशेष शुल्क लगाती है। कुछ राज्य जैसे महाराष्ट्र ने वैट और विशेष शुल्क दोनों लगाया है।

जेपी मॉर्गन की ओर से आयोजित निवेशक सम्मेलन को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, 'जहां तक जीएसटी के दायरे में और माल शामिल किए जाने का सवाल है, मुझे लगता है कि रियल एस्टेट को इसके दायरे में लाया जाना ज्यादा आसान है।' पेट्रोलियम के अलावा रियल एस्टेट, बिजली और शराब इसके दायरे से बाहर हैं।

केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) के चेयरमैन सुमित दत्त मजूमदार, केंद्र व राज्यों को जीएसटी के मसले पर मध्यस्थ रह चुके हैं, ने कहा कि राज्यों का तर्क था कि उन्हें भरोसा नहीं है कि पेट्रोलियम पर जीएसटी का संग्रह किस तरह से व्यवहार करेगा, इसलिए वे चाहते हैं कि नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था से इसे बाहर रखा जाए।

मजूमदार ने कहा कि राज्य सरकारें वैट राजस्व का 50-55 प्रतिशत पेट्रोलियम से पाती हैं और ऐसे में वे इस पर संप्रभुता खोना नहीं चाहतीं। डेलॉयट के एमएस मणि ने कहा, 'राज्यों के वैट में पेट्रोलियम की बड़ी हिस्सेदारी होती है और इसलिए वे इसे जीएसटी के तहत लाए जाने को लेकर अनिच्छुक हैं।'

लेकिन अगर जीएसटी के कारण राजस्व का नुकसान होता है तो राज्यों को पूर्ण मुआवजा देने का प्रावधान रखा गया है, इसके बारे में मणि ने कहा कि राज्यों को अलग अलग दरों को लेकर लचीलापन मिलती है और जीएसटी से देश भर में एक दर हो जाएगी, जिसका असर राज्यों के ऊपर पड़ेगा।

उन्होंने कहा, 'ऐतिहासिक रूप से पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट दरों में भारी अंतर रहा है और कुछ राज्य मूल्यानुसार दर के अलावा विशेष कर लगाते रहे हैं।' उदाहरण के लिए कर्नाटक में पेट्रोल पर 30 प्रतिशत और डीजल पर 19 प्रतिशत बिक्री कर लगता है, वहींं पश्चिम बंगाल मेंं पेट्रोल पर 25 प्रतिशत और डीजल पर 17 प्रतिशत कर है। महाराष्ट्र में वैट और विशेष शुल्क पेट्रोल पर 26 प्रतिशत और 11 रुपये प्रति लीटर और कुछ इलाकों में 25 प्रतिशत और 11 रुपये प्रति लीटर है। खेतान ऐंड कंपनी के अभिषेक रस्तोगी क कहना है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में शामिल किया जाना शुरुआत से ही विवाद का विषय रहा है।

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