निर्यात में तेजी के जश्न में सावधानी बरतने की सलाह

शुभायन चक्रवर्ती | नई दिल्ली Oct 16, 2017 10:16 PM IST

सितंबर में निर्यात 25 प्रतिशत से ज्यादा बढऩे के बाद अर्थशास्त्री व निर्यातक कारोबारी वृद्धि दर बरकरार रहने व इसका जश्न मनाने को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। नकदी का संकट होने के बावजूद सालाना आधार पर सितंबर महीने में निर्यात में 6 महीने की तुलना में सर्वाधिक 25.7 प्रतिशत वृद्धि दर दर्ज की गई। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बावजूद 13 महीने से लगातार चल रही बढ़ोतरी बरकरार रही। बहरहाल विशेषज्ञों का कहना है कि सितंबर महीने में तेजी अप्रत्याशित रही और इससे उद्योग में आपूर्ति में आ रहे मसलों का पता नहीं चलता। 
 
उन्होंने कहा कि अक्टूबर महीने में जीएसटी मानक आसान किए जाने का असर नवंबर या दिसंबर तक पता चलेगा। इसमें सरकार की ओर से ड्यूटी ड्राबैक योजना जारी रखना और जीएसटी दस्तावेज दाखिला आसान करना शामिल है। फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष गणेश कुमार गुप्ता ने कहा, 'सितंबर में उद्योग की उच्च वृद्धि दर से मैं खुश हूं। यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि निर्यातकों ने 30 सितंबर तक के स्टॉक को निकालने की कोशिश की, जब पुरानी ड्यूटी ड्राबैक योजना रोक दी गई थी।'
 
इसके अलावा श्रम आधारित क्षेत्रों जैसे हस्तशिल्प, कालीन और गैर परिधान वाले कपड़े के निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं हुई है। गुप्ता ने कहा कि अक्टूबर 2016 में हुई 9.59 प्रतिशत वृद्धि की तुलना में इसमें 1 से 2 प्रतिशत ज्यादा वृद्धि हो सकती है। वहींं दूसरी ओर इंजीनियरिंग सामान और रिफाइनरी उत्पादों के निर्यात मेंं बढ़ोतरी हुई है, जो जिंसों के अंतरराष्ट्रीय दाम में तेजी की वजह से है। जीएसटी के तीसरे महीने में निर्यात वृद्धि दर मुख्य रूप से कच्चे तेल के वैश्विक दाम में तेजी की वजह से है। इसकी वजह से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में 40 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई। वहींं ज्यादा विदेशी मुद्रा कमाने वाले इंजीनियरिंग क्षेत्र के निर्यात में 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 
 
केयर रेटिंग्स में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'इससे भारत के निर्यात क्षेत्र की टिकाऊ रिकवरी का पता नहींं चलता क्योंकि कीमतें किसी समय बदल सकती हैं।' रुपये के दाम में लगातार बढ़ोतरी का भी निर्यात पर असर पड़ सकता है और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इससे अक्टूबर व नवंबर महीने में भारत की प्रतिस्पर्धा घट सकती है। सितंबर में जहां रुपये की कमजोरी जारी रही क्योंकि विदेशी निवेशक पूंजी खींचते रहे, वहीं अक्टूबर मेंं इसके विपरीत स्थिति रहने की संभावना है। सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 64.74 पर रहा। सबनवीस ने कहा कि भारतीय रुपये की तुलना में प्रतिस्पर्धी विकासशील देशोंं जैसे वियतनाम और इंडोनेशिया की मुद्राओं में तेज गिरावट आई है। 
 
बहरहाल सितंबर महीने में गैर तेल, गैर स्वर्ण का आयात 19.76 प्रतिशत बढ़ा है, जो अगस्त के 20 प्रतिशत से ऊपर की तुलना में मामूली कम है। इससे यह संकेत मिलता है कि औद्योगिक क्षेत्र में लगातार दूसरे महीने सितंबर में तेजी रह सकती है। इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत का कहना है कि पिछले दो साल से वैश्विक जीडीपी वृद्धि दर लगातार कारोबारी वृद्धि दर से ज्यादा रही है। संरक्षणवाद के अलावा जिंसों के दाम में भारी गिरावट इसकी प्रमुख वजह है। लेकिन अब कीमतेंं बढ़ रही हैं और अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति सुधर रही है, जिससे अगले 2 महीनों में निर्यात में तेजी आ सकती है। 
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