खाद्य सुरक्षा का मसला भारत के लिए अहम

संजीव मुखर्जी | नई दिल्ली Dec 17, 2017 09:47 PM IST

विश्व व्यापार संगठन की अर्जेंटीना में बहुचर्चित बातचीत असफल हो गई और इसमें हिस्सा ले रहे देश खाद्य एवं कृषि सब्सिडी को लेकर आम राय नहीं बना सके। इसे लेकर भारत की ओर से चिंता जताई गई थी और कुछ खबरों के मुताबिक भारत ने इस मसले का स्थायी समाधान होने से पहले अपना रुख नरम करने से साफ मना कर दिया।  आखिर खाद्य सुरक्षा और स्टॉकहोल्डिंग मसले क्या हैं, जिन पर भारत का रुख सख्त है?
 
भारत के साथ कुछ अन्य देश दबाव बना रहे हैं कि सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग और कृषि सब्सिडी के मसले का स्थायी समाधान निकाला जाए। यहां दो तरह की सब्सिडी दी जाती है। एक भारत की कुल सब्सिडी है जो सार्वजनिक वितरण कार्यक्रम के तहत दी जाती है। यह अब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के दायरे मेंं है। दूसरी आम सब्सिडी है जो भारत कृषि क्षेत्र को देता है, जिसमेंं बीज और खाद सब्सिडी शामिल है। वैश्विक कारोबारी मानकों के मुताबिक डब्ल्यूटीओ ने अनिवार्य किया है कि डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश का खाद्य सब्सिडी बिल 1986-88 के संदर्भ मूल्य के आधार पर उत्पादन के कुल मूल्य की तुलना में 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। भारत ने 2013 में एनएफएसए लागू किया, जिसने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की जगह ली है। अब इस अधिनियम के दायरे में देश की करीब 86 प्रतिशत आबादी आती है और गेहूं, चावल और मोटे अनाज पर  सब्सिडी दी जाती है। 2017-18 के बजट अनुमानों के मुताबिक इस मद में कुल सब्सिडी करीब 1,45,339 करोड़ रुपये है, जो 2016-17 के पुनरीक्षित अनुमान की तुलना मेंं करीब 10,200 करोड़ रुपये ज्यादा है। 
 
इसके लिए खाद्यान्न की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर होती है। सरकार अनाज का न्यूनतम समर्थन मूल्य हर साल तय करती है और नियमित रूप से इसमें बढ़ोतरी करती है। भारत का मानना है कि इन दो सब्सिडी की गणना 1986-88 के संदर्भ मूल्य के अनुरूप नहीं है। इस तरह से अगर उत्पाद का घरेलू मूल्य अंतरराष्ट्रीय मूल्य से कम होता है तो उसे सब्सिडी के रूप में देखा जाता है। ऐसा तब होता है जब खरीद सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर होती है। इसी तरह से इनपुट को देखें तो खाद, बीज, बिजली आदि के दाम अंतरराष्ट्रीय दाम की तुलना में कम हैं।
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