उर्वरक उत्पादन में निर्भरता अभी दूर का सपना

अभिषेक वाघमारे और संजीव मुखर्जी |  Dec 17, 2017 09:59 PM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 नवंबर के मन की बात कार्यक्रम में कहा था, 'हम यूरिया से धरती मां को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेकिन किसान तो धरती मां का पुत्र है वह अपनी मां को नुकसान कैसे पहुंचा सकता है? किसान एक संकल्प लें कि वे आजादी के 75 वर्ष पूरा होने अर्थात 2022 तक यूरिया का इस्तेमाल आधा कर देंगे।' फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफएआई) का अनुमान है कि देश में अगले एक दशक में रासायनिक उर्वरक का उपभोग 20 प्रतिशत से भी अधिक हो जाएगा। 2024-25 तक नाइट्रोजन (एन) की मात्रा 2 करोड़ टन हो जाएगी, तो वहीं फॉस्फोरस (पी) का उपभोग 93 लाख टन और पोटाश (के) का 42 लाख टन तक पहुंच जाएगा। (देखें चार्ट 2) (आंकड़े यूरिया के रूप में न होकर पौधों के लिए आवश्यक तत्त्वों (एन, पी, के) के रूप में हैं।)

 
भारत में प्रति वर्ष 3 करोड़ टन यूरिया का उपभोग होता है जबकि हरित क्रांति से पहले यह स्तर दस लाख प्रति वर्ष था। साथ ही, इसका आयात पिछले वर्षों के 90 लाख टन के मुकाबले वित्त वर्ष 2017 में घटकर 60 लाख टन रह गया और वित्त वर्ष 2018 में अक्टूबर माह तक यह 37 लाख टन था। यह आयात पर निर्भरता में कमी को दर्शाता है। हालांकि भारत में रासायनिक उर्वरक का उपभोग दक्षिण एशिया और इसके आसपास के देशों से काफी कम है, और इससे खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। भारत में किसान औसतन एक हेक्टेयर कृषि भूमि पर 158 किलो उर्वरक का प्रयोग करते हैं, जबकि चीन, बांग्लादेश और वियतनाम में यह क्रमश: 420 किलो, 278 किलो और 270 किलो है। (देखें, चार्ट 1)
 
प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मामलों पर भारतीय अनुसंधान परिषद में कृषि के लिए इन्फोसिस के प्रोफेसर अशोक गुलाटी कहते हैं, 'खाद्य मांग में जोर के कारण 2022 तक इस लक्ष्य को पाना मुश्किल है, जब तक कोई बड़ा चमत्कार नहीं हो जाता।' वह कहते हैं कि यदि यूरिया के उपभोग में 50 प्रतिशत की कमी करनी है तो अगले तीन वर्षों में इसका आयात शून्य हो जाना चाहिए। गुलाटी कहते हैं, 'मैं ऐसा होते हुए नहीं देख रहा। उर्वरक वितरण में तस्करी और दूसरे उद्योगों को वितरण आदि लूपहोल को बंद करने से थोड़ा लाभ मिल सकता है, लेकिन अगले 5 से 10 वर्ष में भारत का कुल यूरिया उपभोग बढ़ेगा।' 
 
न केवल सरकार, बल्कि अनेक उद्योग संगठनों को भी ऐसा लगता है कि नीम कोटिंग और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) जैसे सुधारों और घरेलू उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी से भारत यूरिया के मामले में शून्य आयात वाला देश बन जाएगा। उर्वरक विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 64 उर्वरक केंद्र हैं, जिनकी कुल क्षमता 3.3 करोड़ टन है।
 
मैटिक्स फर्टिलाइजर कंपनी ने अपना नवीनतम ग्रीनफील्ड फर्टिलाइजर प्लांट पानगढ़ (पश्चिम बंगाल) में स्थापित किया है, जो अभी अपनी कुल क्षमता के 40 प्रतिशत पर काम कर रहा है। फिर भी यह भारत के कुल वार्षिक उत्पादन में 13 लाख टन का योगदान करता है। चंबल फर्टिलाइजर जनवरी 2019 से अपने गदेपन (राजस्थान) संयंत्र के माध्यम से भारत के कुल उत्पादन में 13 लाख टन वार्षिक का योगदान करेगा। उडीसा, तेलंगाना, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कलि 5 बंद पड़े उर्वरक संयंत्रों को पुनर्जीवित किया जा रहा है और निजी निवेश के साथ असम में एक नए संयंत्र का निर्माण भी किया जा रहा है। इससे उत्पादन में 90 लाख टन से अधिक का योगदान होगा।
 
लेकिन उद्योगों का एक हिस्से को लगता है कि इस प्रक्रिया में समय लगेगा और केवल एक संयंत्र को ही वित्तीय सहायता मिल पाएगी। एक अधिकारी ने कहा, 'इसमें कितना समय लगेगा, यह एक बड़ा प्रश्न है, क्योंकि बहुत सी परियोजना अभी शुरुआती स्तर पर ही हैं।' नीम की परत चढ़ाना और डीबीटी की शुरुआती प्रगति भी आत्मनिर्भरता को अवास्तविक बनाती है। 
 
नीम परत वाले यूरिया के बारे में प्रधानमंत्री ने अनेक अवसरों पर बात की है। यह यूरिया फसल को नाइट्रोजन की आपूर्ति में सुधार करेगी और अधिक मात्रा में उर्वरक इस्तेमाल करने के दुष्प्रभाव को कम करेगी। इसमें देश की वार्षिक यूरिया खपत (3 करोड़ टन) का लगभग 10 प्रतिशत (30 लाख टन) तक कम करने की क्षमता है। नीम कोटिंग यूरिया की आवश्यकता को कम करेगी और इससे गैर-कृषि गतिविधियों तथा पड़ोसी देशों (नेपाल, बांग्लादेश आदि) की ओर होने वाले पलायन में कमी लाई जा सकेगी। उर्वरक विभाग में संयुक्त सचिव धर्मपाल ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'नीम कोटिंग, पैकेजिंग बैग का वजन 50 किलो से कम करके 45 किलो करना और क्षमता वृद्धि के साथ निष्क्रिय संयंत्रों को पुन: चालू करने से 2022 तक उर्वरक के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएंगे।'  
 
बेंगलूरु आधारित संस्थान द्वारा सामाजिक और आर्थिक बदलाव पर की गई रिपोर्ट ने बताया कि शुरुआती साक्ष्य में नीम लेपित यूरिया का प्रसार हो रहा है और यह मृदा उर्वरता क्षमता में कमी को दूर कर रहा है। अध्ययन में शामिल अधिकांश धान बुआई वाले किसानों ने मृदा स्वास्थ्य और अनाज की गुणवत्ता में सुधार की बात कही। वहीं, 80 प्रतिशत से अधिक अरहर बुआई वाले किसानों ने कोई भी बदलाव नहीं देखा। रिपोर्ट के अनुसार धान उत्पादन में 10 पप्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन अरहर उत्पादन 4 प्रतिशत कम हो गया। वहीं, सामान्य यूरिया के स्थान पर नीम लेपित यूरिया का प्रयोग करने से दूसरे उर्वरक के प्रयोग का खर्च धान में 15 प्रतिशत और अरहर में 50 प्रतिशत तक बढ़ गया। 
 
उद्योग से जुड़े अधिकारियों ने कहा, 'जब तक किसानों से अतिरिक्त यूरिया के प्रयोग पर अलग से शुल्क नहीं लिया जाएगा या फिर यूरिया का प्रयोग नहीं करने पर अतिरिक्त लाभ नहीं दिया जाएगा, तब तक उपभोग में कोई बडा बदलाव नहीं आएगा।' निजी क्षेत्र के एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि अभी नीम लेपित यूरिया की प्रभावशीलता को साबित करने के लिए कृषि संबंधी कोई निश्चित डाटा उपलब्ध नहीं है और परिणाम भी शुरुआती स्तर पर ही हैं। चेन्नई के मुरुगप्पा समूह के अध्यक्ष ए. वेल्लायन ने समाचार पत्र द हिंदू को एक साक्षातकार में कहा कि उर्वरक क्षेत्र में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) को अपनाने से वार्षिक 35 लाख टन उर्वरक की बचत हो सकती है। डीबीटी को लागू कर चुके 14 राज्यों में उर्वरक खुदरा विक्रेताओं की दुकानों पर लगभग 1,30,000 पीओएस मशीनें लगाई जा चुकी हैं। जबकि इसे देश भर मे लागू करने के लिए मार्च 2018 तक 2 लाख मशीनों की आवश्यकता होगी। एक प्रमुख उर्वरक उत्पादक कंपनी के विपणन प्रमुख ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'उर्वरक के मामले में दी जा रही डीबीटी को डीबीटी कहना सही नहीं है, क्योंकि इसमें सब्सिडी कंपनियों को दी जा रही है, न कि उपभोक्ताओं को।'
 
वह कहते हैं, 'यदि आधार सत्यापन विफल हो जाता है या मशीन की कार्यप्रणाली में बाधाएं आती हैं तो इस उद्देश्य के लिए बने एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर के साथ स्थिरता की समस्या है।' उर्वरक का वितरण क्रम इस प्रकार होता है, कंपनी से थोक विक्रेता, फिर खुदरा और सबसे बाद में उपभोक्ता। एक अध्ययन के अनुसार, डीबीटी के आने से खुदरा से उपभोक्ता के स्तर पर उर्वरक वितरण बोझिल हो गया है। यह अध्ययन सरकार के दिशानिर्देश पर एक सलाहकार फर्म माइक्रोसेव द्वारा आधार आधारित उर्वरक वितरण व्यवस्था (एइएफडीएस) पर किया गया था। यह अध्ययन 6 जिलों के 200 खुदरा दुकानों पर किया गया। इसमें पाया गया कि 88 प्रतिशत किसानों को आधार देने के बारे में पता ही नहीं था, जबकि खुदरा दुकानों पर पहली बार में केवल 35 प्रतिशत बायोमेट्रिक सत्यापन सफलतापूर्वक हो सका। 
 
जुताई के समय में किसानों की उर्वरक मांग बढ़ जाती है और डीबीटी आधारित एइएफडीएस व्यवस्था ऐसे समय में 300-500 किसानों के आंकड़ों को संभालने में सक्षम नहीं है। परिणामस्वरूप, खुदरा वितरकों को खरीददार के सत्यापन में को थोड़ा 'एडजस्ट' करना पड़ता है, जिससे लीकेज की समस्या फिर से बन जाती है। एक मामले में एक ऑटो चालक ने किसान के लिए अपने आधार का सत्यापन कराया। अनेक खुदरा विक्रेताओं ने मोबाइल उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (एमएफएमएस) के लिए पंजीकरण नहीं कराया है। धर्मपाल कहते हैं, 'उर्वरक के मामले में लाभार्थी एक बड़ा किसान या किराए पर खेती करने वाला किसान भी हो सकता है। इस स्तर पर फसल और जमीन के मालिकान के आधार पर लाभार्थी की पहचान करना काफी कठिन है।'
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