राजकोषीय संघवाद, राज्य न रहे निर्भर

ज्योति मुकुल | नई दिल्ली Jan 29, 2018 09:56 PM IST

संसद में सोमवार को पेश आर्थिक समीक्षा में रवींद्रनाथ टैगोर को उद्धृत करते हुए कहा गया कि आत्मनिर्भर गांव लोकतंत्र पर गहरी छाप छोड़ सकते हैं। इसी के साथ राजस्व के मामले में राज्यों की पराश्रयिता का जिक्र करते हुए कहा गया है कि खुद राजस्व जुटाने के बजाय राज्य राजस्व अंतरण पर अधिक निर्भर रहते हैं। पिछले नीतिगत दस्तावेजों में सहकारी संघवाद का जिक्र होता रहा है और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के पीछे भी यही मकसद रहा है। लेकिन वर्ष 2017-18 की आर्थिक समीक्षा में राजकोषीय संघवाद का जिक्र किया गया है। इस अवधारणा के मुताबिक वित्त आयोगों की अनुशंसाओं के अनुरूप राज्यों को मिला राजस्व संसाधनों को साझा करने का नतीजा है न कि हस्तांतरण का। इस सोच के मुताबिक केंद्र राज्यों की तरफ से केवल करों का संग्रह कर रहा है और फिर उनका बंटवार कर दिया जाता है। लेकिन आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि इस स्थिति की समीक्षा  वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए। 
 
करदाताओं की नजर में आयकर और सीमा शुल्क के साथ केंद्र सरकार के जुड़ाव की धारणा को बदल पाना खासा मुश्किल है। केंद्र एवं राज्यों के बीच विभाजित किए जाने वाले कर राजस्व में इन दोनों करों का अहम योगदान होता है। अगर केंद्र केवल संग्रह करने वाली एजेंसी है तो फिर राजस्व संग्रह का बंटवारा राज्यों के कर आधार पर होना चाहिए। राज्यों का अच्छा-खासा पुनर्वितरण अवयव भी नहीं होना चाहिए। इसके अलावा जीएसटी प्रणाली का लागू होना भी उस परंपरा के ठीक उलट है क्योंकि फैसलों और कर प्रशासन में केंद्र-राज्य दोनों की भागीदारी होने से यह कहीं अधिक 'साझा' है।
 
राज्यों और तृतीयक स्तर के केंद्रीय संस्थानों का राजकोषीय मॉडल विदेशी सहायता और प्राकृतिक संसाधन या पुनर्वितरण संसाधनों के अंतरण के अन्य रूपों जैसे बाहरी संंसाधनों पर आधारित हो सकता है। इस मॉडल में उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने की कमजोर प्रणाली होती है और अपने दम पर संसाधन जुटाने की क्षमता भी कम होती है। समीक्षा में जिक्र है, 'आर्थिक एवं राजनीतिक ताकत का विकेंद्रीकरण तेज होने के संदर्भ में इस संतुलन को बाधित करना राजकोषीय संघवाद से जूझ रहे मुद्दों में बेहद अहम होगा। नीति निर्माता शायद अब इस सवाल से और नहीं बच सकते हैं। क्या द्वितीयक एवं तृतीयक वित्तीय संस्थानों को संसाधनों का क्षैतिज एवं ऊध्र्वाधर विभाजन करते समय प्रत्यक्ष करों पर उनकी बढ़ती निर्भरता के मामले में उनके प्रदर्शन की विश्वसनीयता से भी जोड़ा जाना चाहिए?'केंद्र एवं राज्य सरकारें ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय स्थानीय निकायों की तुलना में प्रति व्यक्ति व्यय 15-20 गुना अधिक है। वहीं शहरी निकायों की तुलना में केंद्र और राज्यों का औसत व्यय तिगुना है। वर्ष 2010-11 के बाद ग्रामीण स्थानीय निकायों के प्रति व्यक्ति व्यय में करीब चार गुना बढ़ोतरी होने के बाद भी इतना बड़ा अंतर कायम है।
 
वैसे शहरी क्षेत्रों के स्थानीय निकाय अपने दम पर राजस्व जुटाने के मामले में कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। वे अपने कुल राजस्व का करीब 44 फीसदी हिस्सा अपने स्रोतों से जुटाते हैं। इसके उलट ग्रामीण स्थानीय निकाय काफी हद तक (करीब 95 फीसदी) राजस्व अंतरण पर ही निर्भर रहते हैं।  राज्य और स्थानीय निकाय अपने दम पर संसाधन जुटाने के बजाय काफी हद तक राजस्व संसाधनों के अंतरण पर ही निर्भर होते हैं। 
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