दूरसंचार क्षेत्र को सरकार से मिली राहत

किरण राठी | नई दिल्ली Mar 07, 2018 10:36 PM IST

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्पेक्ट्रम की किस्तों में भुगतान की अवधि बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। इसके अलावा स्पेक्ट्रम रखने की सीमा को आसान बनाने का फैसला किया है। इस तरह से संकट से जूझ रहे दूर संचार उद्योग को नकदी बढ़ाने और उसमें एकीक रण को सुगम बनाने के लिए तात्कालिक राहत दी गई है। 

 

सरकार की ओर से उठाए गए इन बहुप्रतीक्षित कदमों से संचार कंपनियों पर वित्तीय दबाव कम होगा और इससे इस क्षेत्र से क मजोर कंपनियों को बाहर निकलने में मदद मिलेगी। सरकार का मानना है कि इन कदमों से दूरसंचार ऑपरेटरों की वित्तीय स्थिति मजबूत होने से भविष्य में होने वाली स्पेक्ट्रम की नीलामी में उनकी हिस्सेदारी बेहतर होगी।

कैबिनेट ने स्पेक्ट्रम के किस्तों में भुगतान की अवधि बढ़ाकर 16 साल करने को मंजूरी दी है, जबकि इस समय 10 किस्तों में देने की अनुमति है। इसके अलावा स्पेक्ट्रम की कुल सीमा मौजूदा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 प्रतिशत कर दी गई है और मौजूदा इंट्रा बैंड सीमा हटा ली गई है। इसके बदले सब-1 जीएच बैंडों (700 मेगाहर्ट्ज, 800 मेगाहर्ट्ज और 900 मेगाहर्ट्ज) श्रेणी में संयुक्त स्पेक्ट्रम होल्डिंग की सीमा 50 प्रतिशत है। एक जीएच बैंड से ऊपर व्यक्तिगत या संयुक्त स्पेक्ट्रम रखने पर कोई सीमा नहीं होगी। वल्र्ड रेडियोकम्युनिकेशन कॉन्फ्रेंस (डब्ल्यूआरसी) 2019 के अंतिम अधिनियम के बाद पुनरीक्षित स्पेक्ट्रम सीमा पर फिर से विचार किया जा सकता है। 

स्पेक्ट्रम इंस्टालमेंट की लंबी अवधि के बारे में एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि भुगतान बकाये का शुद्ध मौजूदा मूल्य (एनपीवी) 2012 से स्पेक्ट्रम की नीलामी के आवेदन आमंत्रित करने की नोटिस के मुताबिक संरक्षण मिलेगा। बयान में कहा गया है कि 2034-35 तक मिलने वाली कुल राशि 744.46 अरब रुपये से ज्यादा होगी। सरकार ने कहा है कि भुगतान के दायित्वों के पुनर्गठन के बाद संचार सेवा प्रदाताओं की नकदी बढ़ेगी और इससे उन्हें तत्काल राहत मिलेगी।

बयान में कहा गया है, 'स्पेक्ट्रम रखने की सीमा में बदलाव से संचार लाइसेंसों के एकीकरण में मदद मिलेगी और इससे भविष्य में होने वाली स्पेक्ट्रम की नीलामी में हिस्सेदारी को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।'

संचार क्षेत्र इस समय 4.5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज के नीचे दबा है। यह मुख्य रूप से स्पेक्ट्रम के भुगतान और अन्य उपभोग शुल्क व उपकर की वजह से है। सितंबर 2016 में रिलायंस जियो के बाजार में उतरने के बाद से इस उद्योग की समस्याएं और बढ़ गईं क्योंकि जियो ने करीब मुफ्त में सेवाएं देनी शुरू कर दी और प्रतिस्पर्धी अन्य ऑपरेटर भी दरें घटाने को बाध्य हो गए। बहरहाल इससे संचार कंपनियों का मुनाफा खत्म हो गया और उनके राजस्व में कमी होने लगी। 
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