शराब को जीएसटी में लाने की कवायद

दिलाशा सेठ | नई दिल्ली Mar 07, 2018 10:09 PM IST

ईएनए पर 18 प्रतिशत कर लगाने का प्रस्ताव

सरकार ईएनए को जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार कर रही है, जिसका 70 प्रतिशत इस्तेमाल होता है शराब बनाने में
शीरे के ईएनए से बनती है व्हिस्की, रम और बियर
शेष 20 प्रतिशत ईएनए का इस्तेमाल दवा व सौंदर्य प्रसाधन क्षेत्र में होता है
जीएसटी परिषद की बैठक शनिवार को

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद शनिवार को होने वाली बैठक में शराब को जीएसटी के दायरे में लाने की दिशा में पहला कदम उठा सकती है। अगर आम राय बनती है तो राज्यों की ओर से प्रतिरोध के बावजूद एल्कोहल युक्त पेय बनाने में इस्तेमाल होने वाले एक्सट्रा न्यूट्रल एल्कोहल या 'मानव के उपयोग वाले एल्कोहल' को जीएसटी के दायरे में लाया जा सकता है।

एक्सट्रा न्यूट्रल एल्कोहल (ईएनए) पर जीएसटी लगाने की केंद्र सरकार की यह दूसरी कवायद है, जिस पर इस समय राज्य सरकारें कर लगाती हैं। पीने वाले एल्कोहल को जीएसटी के बाहर रखा गया है, जबकि इसका कच्चा माल ईएनए अपरिभाषित क्षेत्र में है। औद्योगिक एल्कोहल जीएसटी के दायरे में आता है।  एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'परिषद जीएसटी के तहत ईएनए को लाने पर फिर से विचार करेगी। राज्यों ने पहले इसका विरोध किया था, लेकिन अब इस मसले पर हमारे पास कानूनी राय है, जिससे इसे जीएसटी के दायरे में लाने की हमारी कवायद को बल मिलता है।' 

परिषद की बैठक करीब डेढ़ महीने के अंतराल पर होने जा रही है। केंद्र सरकार ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से सलाह ली है, जिनका मानना है कि ईएनए पर जीएसटी लागू हो सकता है क्योंकि यह पीने वाली शराब नहीं है। इस पर 18 प्रतिशत कर लगाए जाने का प्रस्ताव है। 

बहरहाल विपक्ष शासित राज्यों का इस पर कड़ा रुख है। पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा ने तर्क दिया कि अगर ईएनए को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो इसे अल्कोहल पर कर लगाने के रूप में देखा जाएगा। राज्य सरकारें इस समय ईटीए पर मूल्यवर्धित कर और बिक्री कर लगाती हैं। एक अन्य अधिकारी ने कहा, 'परिषद इस मसले पर भी विचार करेगी कि क्या ईएनए पर जीएसटी लगाने के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत है या यह प्रशासनिक रूप से किया जा सकता है।' 

ईएनए गन्ने के मोलैसिस (शीरा) से निकलता है और इसके 80 प्रतिशत हिस्से का इस्तेमाल पीने योग्य शराब जैसे व्हिस्की, रम, वोदका, बियर बनाने में होता है। शेष ईएनए का इस्तेमाल दवा उद्योग में कफ सिरप बनाने और सौंदर्य प्रसाधन उद्योग में इत्र बनाने में होता है। दवा उद्योग खासकर ईएनए को जीएसटी के दायरे में लाए जाने की मांग कर रहा है, जिससे उसे इस पर इनपुट टैक्स क्रेडिट मिल सके। राज्यों का तर्क है कि अगर ईएनए जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो वे राज्य में शराब के उत्पादन की निगरानी कर पाने में सक्षम नहीं होंगे।

बहरहाल, ईएनए को जीएसटी के दायरे में लाए जाने से पीने योग्य शराब को भी इसमें शामिल किए जाने को बल मिलेगा। उद्योग जगत के एक विशेषज्ञ ने नाम न दिए जाने की शर्त पर कहा, 'ईएनए को शामिल किए जाने का मतलब यह हुआ कि यह जीएसटी के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन होगा। इससे कर का बोझ बढ़ेगा। आदर्श रूप में इनपुट और आउटपुट पर एक समान कर होना चाहिए।' 

डेलॉयट इंडिया के पार्टनर एमएस मणि ने कहा, 'जीएसटी लागू किए जाने के मकसद में से एक यह भी है कि आपूर्ति शृंखला में टैक्स क्रेडिट को टूटने से रोका जाए। ईएनए जैसे कुछ इनपुट के माले में यह लक्ष्य नहीं हासिल किया जा सकता। यह जरूरी है कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि किसी उद्योग पर इनपुट टैक्स क्रेडिट बोझ न बने, जिससे जीएसटी के बुनियादी सिद्धांतों को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।'
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