थोड़ा सा बढ़ा कर, घाटे की कम फिकर

ईशान बख्शी |  Mar 18, 2018 08:30 PM IST

पिछले कुछ हफ्तों के दौरान राज्यों ने अपने बजट पेश किए हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 10 राज्यों के बजट का विश्लेषण किया, जिसमें कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। पहली बात तो यह कि राज्यों के कर राजस्व (राज्य सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में) में पिछले सात सालों (2011-12 से 2018-19) में नाममात्र की बढ़ोतरी हुई है। इन राज्यों के गैर-कर राजस्व संग्रह में भी मामूली इजाफा हुआ है। दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में केंद्रीय करों में राज्यों के हिस्से और केंद्र से मिलने वाले अनुदान में खासी तेजी आई है। ऐसा संभवत: 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों और केंद्र के कर राजस्व में बढ़ोतरी के बाद हुआ है। आयोग ने अपनी सिफारिशों में केंद्र से राज्यों को अधिक रकम के हस्तांतरण की हिमायत की थी। तीसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इनमें ज्यादातर राज्यों ने 2020-21 तक अपने राजकोषीय घाटे या अपने ऊपर कर्ज के स्तर में बड़ी कमी के अनुमान नहीं दिए हैं। यह केवल प्रारंभिक विश्लेषण है। सभी राज्यों के बजट पेश होने के बाद ही पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी। जिन 10 राज्यों के बजट का विश्लेषण किया गया है, उनमें छत्तीसगढ़, केरल, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और हरियाणा शामिल हैं। मोटे तौर पर देखें तो राज्यों की राजस्व प्राप्तियां 2011-12 के 13.6 प्रतिशत से बढ़कर  2018-19 में जीएसडीपी का 16 प्रतिशत रहने (बजट अनुमान) अनुमान है। 2017-18 के संशोधित अनुमान के अनुसार यह 15.7 प्रतिशत थीं। 

 
राजस्व के तहत आने वाले विभिन्न बिंदुओं पर गौैर करें तो इन राज्यों की राजस्व प्राप्तियां 2011-12 में जीएसडीपी के 7 प्रतिशत से मामूली बढ़कर 2018-19 में 7.1 प्रतिशत हो गईं। आंकड़ों से साफ है कि कर संग्रह में मामूली या नाममात्र का इजाफा हुआ। राजस्व संग्रह की धीमी चाल के पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं। रेटिंग एजेंसी इक्रा में मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर कहती हैं, 'राज्यों को कर राजस्व मोटे तौर पर खपत संबंधी गतिविधियों से मिलता है। हाल के वर्षों में राजमार्गों के किनारे शराब बिक्री पर प्रतिबंध, कुछ राज्यों में शराब पर प्रतिबंध और नोटबंदी जैसे उपायों से कर राजस्व प्रभावित हुआ है। इनके अलावा कुछ राज्यों ने ईंधन पर मूल्य वद्र्धित करों में कमी कर दी है। इन सभी कारणों से राज्यों के कर राजस्व संग्रह की चाल प्रभावित हुई है।' रियल एस्टेट क्षेत्र में मंदी से भी राज्यों को मिलने वाला स्टांप शुल्क संग्रह कम हुआ है। जम्मू कश्मीर, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के कर राजस्व में इसी अवधि के दौरान अधिक तेजी आई है। हालांकि दूसरे राज्यों जैसे मध्य प्रदेश और कर्नाटक के कर और जीएसडीपी अनुपात में कमी आई है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश का कर राजस्व वित्त वर्ष 2012 के 8.5 प्रतिशत से कम होकर वित्त वर्ष 2019 (बजट अनुमान) में जीएसडीपी का 6.6 प्रतिशत रह गया। गैर-कर राजस्व संग्रह का रुझान राज्य और केंद्र सरकार दोनों के लिए समान ही रहा है। राज्यों का गैर-कर राजस्व संग्रह वित्त वर्ष 2012 और 2018 में जीएसडीपी का 1.2 प्रतिशत (संशोधित अनुमान) रहा। 
 
वित्त वर्ष 2019 (संशोधित अनुमान) में यह मामूली बढ़कर 1.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसी तरह केंद्र का गैर-कर राजस्व भी इसी अवधि के दौरान जीडीपी का 1.4 प्रतिशत रहा। वित्त वर्ष 2019 में इसके जीडीपी का 1.3 प्रतिशत रहने की उम्मीद है।   केंद्रीय करों में राज्यों का हिस्सा जरूर बढ़ा है, जो वित्त वर्ष 2012 के 3.4 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2019 (बजट अनुमान) में 4.6 प्रतिशत हो गया। इसी तरह केंद्र से अनुदान वित्त वर्ष 2012 के 2 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2019 (बजट अनुमान) में 2.9 प्रतिशत हो गया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2012 से वित्त वर्ष 2019 (बजट अनुमान) तक राज्यों की राजस्व प्राप्तियों में 2.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी में 2.1 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से अधिक रकम के हस्तांरण का था। 14वें वित्त आयोग ने अपने अनुमान में कहा था कि केंद्र के पास संचित कर संग्रह में राज्यों को कुल हस्तांरण वित्त वर्ष 2015 के 61.88 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2016 में 62.75 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2019 में 63.66 प्रतिशत हो जाएगा। इसमें करों में राज्यों की हिस्सेदारी, वित्त आयोग अनुदान साथ ही दूसरे अनुदान भी शामिल हैं।
 
इसके अलावा केंद्र के राजस्व में इजाफे से भी राज्यों को अधिक रकम मिली होगी। 2017-18 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि विभिन्न सरकारी उपायों से व्यक्तिगत आय कर संग्रह में खासा इजाफा हुआ है। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है, 'सरकार के विभिन्न उपायों से आय कर संग्रह 2016-17 और 2017-18 के दौरान बढ़कर 650 अरब रुपये से 900 अरब रुपये रहा।' राजकोषीय मोर्चे पर घबराने की वजह जरूर है क्योंकि ज्यादातर राज्यों ने अपने राजकोषीय घाटे और कर्ज के स्तर पर में बड़ी कमी के अनुमान नहीं जताए हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा ने राजकोषीय घाटा 2018-19 (बजट अनुमान) के 2.8 प्रतिशत से बढ़कर 2020-21 तक 3 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया है। इसका कर्ज और जीएसडीपी अनुपात 2018-19 (बजट अनुमान) के 23.44 प्रतिशत से बढ़कर 2020-21 में 25 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है।
 
मध्य प्रदेश का राजकोषीय घाटा 2018-19 (बजट अनुमान) के 3.2 प्रतिशत से बढ़कर 2020-21 तक 3.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। राज्य के ऊपर कर्ज इसी अवधि के दौरान 26.3 प्रतिशत से बढ़कर 27.2 प्रतिशत रहने की बात कही गई है। बिहार, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी इसी तरह के रुझान हैं। केरल एक अपवाद है, जहां राजकोषीय घाटे और कर्ज एवं जीएसडीपी अनुपात में मामूली गिरावट की उम्मीद जताई गई है। 
कीवर्ड GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक