उठापटक और कारोबारी बाधाओं का रहा साल

इंदिवजल धस्माना |  Mar 30, 2018 09:51 PM IST

आप इसे खलल कहें या ढांचागत सुधार लेकिन नोटबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर डाला है। बहरहाल, वर्ष 2017-18 की शुरुआत के साथ जहां इसका नकारात्मक असर कम होने लगा, वहीं एक अन्य सुधार या कहें 'खलल' ने अर्थव्यवस्था और कारोबारी जगत को हिलाकर रख दिया। यह था 1 जुलाई, 2017 से लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)।  इन दोनों सुधारों का असर जीडीपी वृद्घि दर पर नजर आया और वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में यह 5.7 फीसदी के साथ तीन साल के निचले स्तर पर आ गई। ऐसा नोटबंदी के प्रभाव और जीएसटी के पहले आई दिक्कतों की वजह से हुआ। 

 
उसके बाद सुधार हुआ और दूसरी तिमाही में यह 6.5 फीसदी और तीसरी तिमाही में 7.2 फीसदी हो गई। अब कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था वर्ष 2017-18 में समग्र रूप से 6.6 फीसदी की दर से विकसित होगी। यह पहले जताए गए 6.5 फीसदी के अनुमान से अधिक है।  विश्व बैंक और अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष दोनों ने वर्ष 2017-18 में देश की अर्थव्यवस्था के 6.7 फीसदी की दर से विकसित होने का अनुमान जताया था। ऐसे में माना जा सकता है कि वृद्घि दर 6.6 फीसदी के आसपास रह सकती है। हालांकि यह चौथी तिमाही के जीडीपी के आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
 
बहरहाल, प्रमुख बात यह है कि आर्थिक वृद्घि में यह खलल नोटबंदी और जीएसटी के क्रियान्वयन की वजह से आया। नोटबंदी का असर कम हो गया है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जीएसटी का कुछ असर अभी भी बाकी है। मसलन निर्यातक रिफंड के लिए परेशान हो रहे हैं। अक्टूबर को छोड़ दिया जाए तो वर्ष 2017-18 में किसी भी महीने व्यापारिक वस्तुओं का निर्यात कम नहीं हुआ। नवंबर 2017 में 30.55 फीसदी की जबरदस्त वृद्घि के बाद से रिफंड के कारण निर्यात वृद्घि तेजी से घटी है और फरवरी में यह केवल 4.4 फीसदी रही। डेलॉयट इंडिया के साझेदार और प्रमुख अर्थशास्त्री अनीस चक्रवर्ती के मुताबिक, 'कई मायनों में वर्ष 2017-18 देश की अर्थव्यवस्था को परिभाषित करने वाला वर्ष रहा। भारत ने अपनी अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को कहीं अधिक व्यापक जीएसटी से बदल दिया जबकि नवंबर 2016 की नोटबंदी का प्रभाव अभी उस पर बना हुआ था।' वह कहते हैं कि दूसरी तिमाही से जीडीपी वृद्घि में जो सुधार देखने को मिला उससे यही संकेत मिलता है कि जीएसटी और नोटबंदी का शुरुआती नकारात्मक असर समाप्त हो रहा है। 
 
संप्रग बनाम राजग का अंतर 
 
बहरहाल, संप्रग ने देश की आर्थिक वृद्घि को जिस स्थिति में छोड़ा था उससे अगर राजग के प्रदर्शन की तुलना की जाए तो ऐसा लगता है कि वर्ष 2017-18 में जीडीपी का विस्तार आधिकारिक तौर पर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के 2013-14 के  6.4 फीसदी से केवल 0.2 फीसदी ही ज्यादा है। गौरतलब है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल के उस दौर को नीतिगत पंगुता का दौर कहकर मखौल उड़ाया जाता था।  प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष विवेक देवरॉय को लगता है कि संप्रग सरकार की बेहतर वृद्घि दर राजकोषीय अपव्यय का नतीजा थी। देवरॉय कहते हैं कि सवाल वृद्घि दर का नहीं बल्कि वृद्घि के राजकोषीय परिणाम का है। संप्रग की वृद्घि से जुड़ा सवाल वृद्घि के आंकड़ों से नहीं बल्कि वृद्घि कैसे हासिल हुई उससे संबंधित है। 
 
जहां तक राजकोषीय घाटे की बात है तो राजग ने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को तीन बार स्थगित किया। वर्ष 2017-18 में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के 3.2 फीसदी से संशोधित करके 3.5 फीसदी किया गया। अगर व्यय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो संशोधित लक्ष्य को हासिल करना भी मुश्किल हो जाएगा। अप्रैल से फरवरी 2018 की 11 माह की अवधि में राजकोषीय घाटे का आंकड़ा पूरे साल के संशोधित अनुमान से 20.3 फीसदी ज्यादा था।  राजग सरकार को मुद्रास्फीति के मोर्चे पर जरूर उल्लेखनीय कामयाबी मिली। यह मौद्रिक नीति समिति की वजह से भी हो सकता है। इस समिति को उपभोक्ता मूल्य आधारित महंगाई को 2 से 6 फीसदी के दायरे में रखने का निर्देश दिया गया है। अगर कभी भी लगातार तीन तिमाहियों तक औसत मुद्रास्फीति इस दायरे से बाहर जाती है तो आरबीआई को इसकी वजह सरकार को बतानी होगी। 
 
जून के अलावा मुद्रास्फीति 2017-18 में कभी इस दायरे से बाहर नहीं गई। उस वक्त मुद्रास्फीति महज 1.46 फीसदी थी। इससे कम मुद्रास्फीति की चिंता उत्पन्न हो गई थी। इसके ठीक विपरीत फरवरी तक मुद्रास्फीति लगातार चौथे महीने 4 फीसदी के ऊपर रही। हालांकि नवंबर के 5.21 फीसदी के स्तर के बाद से वह लगातार कम हो रही है और फरवरी में 4.44 फीसदी रही। 
 
ढेर सारा जोखिम 
 
आगे बढ़ें तो अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम तेल कीमतों और दुनिया में बढ़ते संरक्षणवाद से है। इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई। बहरहाल, जीएसटी समायोजन समेत घरेलू कारक भी प्रभाव डालेंगे।  चक्रवर्ती कहते हैं, 'बड़े बाहरी जोखिम में तेल कीमतों से लगने वाले झटके, कर दरों में प्रतिस्पर्धा और बढ़ते व्यापारिक जैसी बातें शामिल हैं। बहरहाल भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी काफी हद तक घरेलू कारकों से संचालित है इसलिए प्रमुख जोखिम की प्रकृति घरेलू होगी। जीएसटी के क्रियान्वयन से उपजी विसंगति इसका उदाहरण है।'
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