भारत खत्म कर सकता है निर्यात सब्सिडी

शुभायन चक्रवर्ती | नई दिल्ली Apr 01, 2018 09:46 PM IST

अगर अमेरिका द्वारा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में दायर किए गए कारोबार विवाद में भारत हारता है तो उसे अगले 9 महीने के भीतर सभी निर्यात सब्सिडी रोकनी पड़ सकती है।  पिछले महीने अमेरिका के वाणिज्य प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटहाइजर के कार्यालय ने पूरी निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं को लेकर भारत को डब्ल्यूटीओ में चुनौती दी थी। अमेरिका ने आरोप लगाया है कि भारत अपने निर्यातकों को गलत तरीके से फायदा पहुंचा रहा है और इससे अमेरिका के विनिर्माताओं को नुकसान हो रहा है। भारत ने जहां इस चुनौती को तत्काल स्वीकार कर ली और बहुपक्षीय प्लेटफॉर्म पर लडऩे का फैसला किया। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के डब्ल्यूटीओ में हारने की संभावना है क्योंकि उसके पास कानूनी प्रक्रिया के लिे बहुत कम समय है। 
 
सेंटर फार डब्ल्यूटीओ स्टडीज के प्रमुख अभिजित दास ने कहा, 'प्रतिबंधित सब्सिडी विवाद के लिए निर्धारित समय सीमा सामान्यतया अन्य विवादों की तुलना में आधी होती है। 9 महीने से आगे मामला जाने का एक ही रास्ता है कि अगर इस मसले पर अपील की जाए। हमें नहीं मालूम कि विवाद को लेकर विवाद निपटान निकाय (डीएसबी) में मौजूदा गतिरोध किस स्वरूप में सामने आता है।'   यह मामला दायर किए जाने के बाद वाणिज्य मंत्रालय ने कहा था कि देश के पास अमेरिका को जवाब देने के लिए 60 दिन का समय है और डब्ल्यूटीओ के स्थापित नियमों के मुताबिक बातचीत के माध्यम से विवाद को सुलझाया जाएगा। बहरहाल अब ऐसा लग रहा है कि शुरुआती सलाह के साथ हर स्तर पर विवाद प्रक्रिया के लिए आधा समय बीत चुका है। 
 
दास ने कहा, 'परामर्थ 30 दिन के भीतर लिया जाना था। उसके बाद अगर परामर्श से विवाद नहींं सुलझता तो अमेरिका को यह स्वतंत्रता होती कि वह पैनल की मांग करे। अगर एक बार यह बन जाता है तो इसकी रिपोर्ट आने में 6 महीने का समय लगेगा। इसके बाद अगर भारत अपील करने का फैसला करता है तो अपीली निकाय के पास इस मामले को निपटाने के लिए करीब 60 दिन का समय होगा।'
 
क्या है मामला
 
चीन के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के बाद डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिकी प्रशासन ने पिछले 2 महीने के दौरान कई बाद 'पारस्परिक शुल्क' लगाने की धमकी दी। बहुपक्षीय मंच पर अमेरिका ने भारत को लेकर भी चिंता जताई और आरोप लगाया कि भारत अपने निर्यातकोंं को 6 बड़ी प्रमोशन योजनाओं के तहत 7 अरब डॉलर का लाभ मुहैया करा रहा है, जबकि डब्ल्यूटीओ के नियमोंं में ऐसा करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें मर्केंडाइज एक्सपोर्ट फ्रॉम इंडिया स्कीम और एक्सपोर्ट प्रमोशन कैपिटल गुड्स सस्कीम के अलावा अन्य योजनाएं शामिल हैं, जो 'स्क्रिप्स' के माध्यम से हजारों कारोबारियोंं को कारोबारी समर्थन मुहैया करा रही हैं, जिनका इस्तेमाल बुनियादी सीमा शुल्क का भुगतान करने में किया जा सकता है। 
 
बहरहाल नई दिल्ली का तर्क है कि अमेरिका के कानून द एग्रीमेंट आन सब्सिडीज ऐंड काउंटरवेलिंग मीजर्स (एएससीएम) में इन सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के लिए 8 साल का समय दिया गया है। एएससीएम उस समय बनाया गया था, जब डब्ल्यूटीओ की स्थापना हुई और इसका मकसद था कि देशों द्वारा मुहैया कराई जा रही निर्यात सब्सिडी को धीरे धीरे कम किया जाए और अंत में उसे खत्म कर दिया जाए जिससे कि वैश्विक कारोबार बराबरी का हो सके। बहरहाल विकासशील देशों के लिए इस नियम से छूट मिली, जिसके मुताबिक 1000 डॉलर प्रति व्यक्ति आमदनी तक पहुंचने तक विकासशील देश अस्थायी रूप से निर्यात सब्सिडी मुहैया करा सकते हैं। शुरुआत में भारत इस समूह में शामिल था, लेकिन पिछले साल डब्ल्यूटीओ सचिवालय ने अपनी रिपोर्ट के माध्यम से यह सूचित किया कि भारत ने यह सीमा 2015 मेंं ही पार कर ली है। 
 
अमेरिका ने यह मसला उठाते हुए कहा कि भारत यह जानते हुए भी कानून की अवहेलना कर रहा है और निर्यातकों को संवर्धन योजनाओं के माध्यम से लाभ पहुंचा रहा है। लेकिन भारत के पास अभी अभी आधार है।  वाणिज्य सचिव रीता तेवतिया ने हाल ही में कहा था, 'समझौते के अनुच्छेद 27 में विशेष व अलग व्यवहार की सुविधा है। समझौता प्रभाव में आने के समय विकासशील देश, जो निर्धारित सीमा से ऊपर थे, उन्हें अपनी सब्सिडी खत्म करने के लिए 8 साल का वक्त दिया गया था। हमने साफ साफ माना कि यह 8 साल की अवधि उपलब्ध है।' उन्होंने कहा, 'वार्ता कर रहे समूह के पास भारत ने कागजात प्रस्तुत कर दिए हैं, जो नियम 2011 से प्रभावी है।'
 
बहरहाल कारोबार विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत की स्थिति कमजोर है क्योंकि कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नीहं है कि ऐसे मामले में डब्ल्यूटीओ में किसी देश ने जीत हासिल की हो। जिनेवा के एक कारोबार विशेषज्ञ ने कहा, 'साथ ही भारत का मौजूदा तर्क पहले के तर्कों पर ही आधारित है, जिसे 2011 के बाद से किसी भी देश के मामले में अब तक स्वीकार नहीं किया गया है।'
 
न्यायधीशों की कमी 
 
बहरहाल अमेरिका ने भारत के लिए और समय मिलने की राह भी रोक रखी है। अमेरिका ने अपीली न्यायाधिकरण में न्यायधीशों की नियुक्ति को रोक रखा है, जो देशों के बीच पंचाट का काम करता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसल और वरिष्ठ कारोबार विशेषज्ञ विश्वजीत धर ने कहा, 'अमेरिका ने 7 सदस्यों वाले अपीली न्यायाधिकरण में एकतरफा रूप से न्यायाधीशों की नियुक्ति रोक रखी है। इस समय तीन सदस्य सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि चौथे सदस्य जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं।' जजों की कमी से प्रक्रिया सुस्त होगी और इससे तत्काल कारोबारी राहत मिलने की संभावना किसी विकासशील या छोटी अर्थवव्यवस्था वाले देश को नहीं है, जिसकी इस समय सख्त जरूरत है। 
 
इस साल के आखिर तक चौथे सदस्य सेवानिवृत्त हो जाएंगे। ऐसे में न्यायाधिकरण में सदस्योंं की संख्या घटकर 2 रह जाएगी और यह निकाय बेकार हो जाएगा क्योंकि किसी मामले की सुनवाई के लिए 3 मौजूदा सदस्यों का होना जरूरी होता है। अगर ऐसा नहीं भी होता है तो न्यायाधिकरण के पास तमाम मामले लंबित पड़े हैं। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, 'इस निकाय से वास्तव में भारत को मदद मिल सकती है, लेकिन हम इस मसले पर कुछ नहीं कर पा रहे हैं।' 
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