लघु बचत योजनाओं से सरकार की उधारी बढ़ी

कृष्णकांत | मुंबई Apr 06, 2018 09:52 PM IST

पिछले 5 साल के दौरान लघु बचत योजनाओं से सरकार की उधारी तेजी से बढ़ी है। इसके साथ ही बाजार उधारी की हिस्सेदारी 2017-18 में 17 साल के न्यूनतम स्तर पर रही।  भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक डाकघर जमा, राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (एनएससी) और किसान विकास पत्र (केवीपी) जैसी लघु बचत योजनाओं के धन से सरकार की उधारी केंद्र सरकार की कुल उधारी के पांचवेंं हिस्से से थोड़ी अधिक (20.9 प्रतिशत) हो गई है, जो एक साल पहले के 17.2 प्रतिशत वित्त वर्ष 2004 के 2.4 प्रतिशत की तुलना में ज्यादा है। यह पिछले 19 साल में लघु बचत से सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है। 
 
सरकार की कुल उधारी में बॉन्ड बाजार (बाजार उधारी) की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। इसकी हिस्सेदारी वित्त वर्ष 18 में घटकर 72.8 प्रतिशत हो गई जो वित्त वर्ष 14 में 94.2 प्रतिशत थी। विश्लेषकों का कहना है कि बॉन्ड प्रतिफल में अर्थव्यवस्था की मानक ब्याज दरों पर लगाम लगा रहा है। एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज के शोध प्रमुख धनंजय सिन्हा ने कहा, 'लघु बचत से उधारी बढ़ाकर सरकार बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की कम आपूर्ति दिखा रही है, जिससे प्रतिफल बढऩे पर रोक लग रही है। इससे बाजार धारणा में सुधार हो रहा है क्योंकि इक्विटी सहित ज्यादा प्रतिफल पूंजी बाजार के लिए बुरी खबर है।'
 
कुल मिलाकर पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने लघु बचत से 1001.6 अरब रुपये उधारी ली है, जो वित्त वर्ष 17 के 903.8 अरब रुपये और वित्त वर्ष 14 के 123.6 अरब रुपये की तुलना में ज्यादा है। इसी अवधि के दौरान बॉन्ड बाजार से सालाना उधारी 27 प्रतिशत होकर वित्त वर्ष 14 के 4,756 अरब रुपये से घटकर 3,482 अरब रुपये रह गई है। इस अवधि के दौरान सरकार की कुल उधारी 5,050 अरब रुपये से 5.3 प्रतिशत घटकर 4,782 अरब रुपये हो गई है।  इस अवधि के दौरान भविष्य निधि में से भी सरकार की उधारी में बढ़ोतरी हुई है और यह वित्त वर्ष 14 के 97.5 अरब रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 18 में 140 अरब रुपये हो गई है। 
 
एक विश्लेषक ने कहा, 'सरकार के बाजार से इतर साधनों को अपनाने से पता चल रहा है कि वह सक्रियता से अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों के प्रबंधन की कवायद कर रही है। इससे बॉन्ड बाजार की ताकत कम हुई है और यह व्यापक अर्थव्यवस्था का प्रमुख संकेतक है।' लघु बचत योजनाओं जैसे डाकघर जमा और केवीपी पर ब्याज दर सरकार हर तिमाही तय करती है। इसके विपरीत सरकारी बॉन्डों पर प्रतिफल (या ब्याज दर) रोज बदलती है, जो द्वितीयक बाजार में इनकी मांग और आपूर्ति पर निर्भर है।  पिछले 4 साल के दौरान 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल (या ब्याज दरें) लगातार कम हुआ है। यह दरें वित्त वर्ष 14 के 8.8 प्रतिशत से कम होकर 2016 की शुरुआत में 6.2 प्रतिशत के रिकॉर्ड कम स्तर पर आ गई हैं। पिछले 12 महीने में प्रतिफल में करीब 115 आधार अंक की बढ़ोतरी हुई है क्योंकि केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ा है और वैश्विक दरें भी बढ़ी हैं। विश्लेषकों का कहना है कि कम बॉन्ड प्रतिफल परोक्ष रूप से सरकार के लिए फायदेमंद होता है। सिन्हा ने कहा, 'कम प्रतिफल से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकोंं (पीएसबी) को अपने बॉन्ड पोर्टफोलियो में मुनाफा कमाने में मदद मिलती है। इससे सरकारी बैंकों को सरकार को ज्यादा लाभांश देने का मौका मिलता है, इसके अलावा सरकार को नया इक्विटी लगाने की जरूरत कम होती है।' 
 
बॉन्ड के मूल्य और बॉन्ड प्रतिफल में व्युत्क्रमानुपाती संबंध है। अगल बॉन्ड प्रतिफल कम होता है तो बॉन्ड का मूल्य ज्यादा होता है. सरकारी बैंंकों के पास सरकार के सबसे ज्यादा बॉन्ड होते हैं, जिनकी हिस्सेदारी इसके कुल बाजार की आधी है।  वहीं लघु बचत और भविष्य निधि से उधारी बाजार उधारी की तुलना में ज्यादा खर्चीली है। 
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