'राजकोषीय नीतियों पर अलग ढंग से सोचने की जरूरत'

इंदिवजल धस्माना और अरूप रॉयचौधरी | नई दिल्ली Apr 08, 2018 09:33 PM IST

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की सालाना बैठक में वक्ताओं ने राजकोषीय घाटे में कमी लाने के अपने एकमात्र लक्ष्य के साथ अनुकूल राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों की जरूरत पर जोर दिया। इन वक्ताओं ने सरकार को सुझाव दिया कि जब बात इन नीतियों के निर्माण की हो तो कुछ अलग हटकर सोचने की जरूरत होगी। नीति आयोग ने राजकोषीय भंडार बनाने का सुझाव दिया जिससे कि जरूरत के वक्त इसका इस्तेमाल किया जा सके। हालांकि राजकोषीय नीतियों को लेकर नीति आयोग ने अपनी सख्ती में कमी की है, लेकिन अर्थशास्त्री और पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार दीपक नय्यर ने देश में मौजूदा समय में लागू राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों, दोनों की ही आलोचना की है। 
 
निजी क्षेत्र के प्रतिभागियों ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए। यूटीआई ऐसेट मैनेजमेंट के प्रबंध निदेशक लियो पुरी ने कहा कि सरकारों का पूंजीगत खर्च के कुशल नियोजन के संदर्भ में अच्छा रिकॉर्ड नहीं रहा है। नय्यर ने कहा कि राजकोषीय घाटे को जीडीपी के कुछ खास प्रतिशत तक कम करना इतना जरूरी हो गया है कि वित्त मंत्री भी इससे इनकार नहीं कर सकते।  उन्होंने कहा कि राजकोषीय नीतियां अर्थव्यवस्था में समग्र लक्ष्यों के अनुरूप होनी चाहिए। यदि अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में हो तो संकुचनकारी नीतियों की जरूरत होगी। इसके विपरीत यदि अर्थव्यवस्था मंदी में है तो विस्तारवादी नीतियों की जरूरत होगी। 
 
उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि यदि सरकारी उधारी का इस्तेमाल लाभकारी निवेश के लिए किया जा सके और प्रतिफल की दर कर्ज अदायगी की लागत की तुलना में अधिक हो तो बाजार से उधारी बढ़ाने में क्या नुकसान है? उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति का कार्य न सिर्फ मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है बल्कि संसाधनों के सक्षम इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी है। उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए, भारत में निवेश जीडीपी के अनुपात में 6 साल पहले की तुलना में मौजूदा समय में पीछे है।
 
नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने नय्यर के विचारों का समर्थन किया और कुल राजकोषीय घाटे के बजाय राजस्व घाटे को नियंत्रित करने के अपने बार बार दोहराए जा चुके सिद्घांत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पूर्व व्यय सचिव एन के सिंह के नेतृत्व वाली समिति ने राजस्व घाटे पर ध्यान देने से इनकार कर दिया, क्योंकि उसका कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य को भी राजस्व खर्च के दायरे में लाया जाना चाहिए। इसलिए समाधान राजस्व घाटे को छोड़ देना नहीं बल्कि पूंजी खर्च में स्वास्थ्य और शिक्षा को शामिल करना है। उन्होंने कहा कि इसे लेकर अलग नजरिया अपनाने और यह देखने की जरूरत होगी कि सरकार की राजकोषीय नीतियां अर्थव्यवस्था के लिए कितनी कारगर और जरूरी हैं।  इस अवसर पर उपस्थित कोटक महिंद्रा बैंक के प्रबंध निदेशक उदय कोटक ने कहा कि वित्तीय प्रौद्योगिकी के संदर्भ में भारत में आधार एक बड़ा बदलाव लाने में सक्षम है और जब इससे जुड़ी कानूनी समस्याएं दूर हो जाएंगी तो यह वित्तीय समावेशन में एक बड़ी परिसंपत्ति बना रहेगा। 
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