'रोजगार के लिए सिर्फ वृद्धि दर पर्याप्त नहीं'

अभिषेक वाघमारे | नई दिल्ली Apr 16, 2018 09:55 PM IST

अगर भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के मुकाबले रोजगार में वृद्धि की मौजूदा दर ही बनी रहती है तो देश की तेजी से बढ़ती श्रम शक्ति को रोजगार सुनिश्चित करने के लिए हमें लगभग 18 प्रतिशत की दर से आर्थिक वृद्धि करनी पड़ेगी। ये आंकड़ा विश्व बैंक ने अपनी द्विवार्षिक रिपोर्ट में दिया है। लेकिन उसने यह भी कहा है कि इतनी ऊंची वृद्धि दर हासिल करना संभव नहीं होगा और नौकरी की तेजी से बढ़ती चुनौती को केवल वृद्धि दर के जरिये खत्म नहीं किया जा सकता।  रिपोर्ट में कहा गया है, 'यह (वृद्धि) दर बहुत ज्यादा है। ऐसे में तेज वृद्धि दर ही पर्याप्त नहीं होगी। अगर दक्षिण एशियाई देश रोजगार दर बढ़ाने को लेकर गंभीर हैं तो वृद्धि दर के हर प्रतिशत पर और ज्यादा नौकरियों के सृजन की जरूरत होगी।' रविवार को विश्व बैंंक ने दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर केंद्रित अपनी रिपोर्ट 'रोजगार रहित वृद्धि' पेश की। इसके पहले दक्षिण एशिया पर केंद्रित अपनी रिपोर्ट में विश्व बैंक ने वैश्वीकरण, निवेश में वृद्धि की सुस्ती और लुप्त होते अनुकूल रुख पर रिपोर्ट दी थी। 
 
चालू साल में वैश्विक वृद्धि दर सकारात्मक रहने के अनुमान के बीच रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वैश्विक मांग बढ़ेगी और इस तरह से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के निर्यात में आगामी वर्षों में 2020 तक तेजी रहेगी। इसमें यह भी कहा गया है कि 2017 में भारत के निर्यात में 6 प्रतिशत की वृद्धि दर विश्व बैंंक के जनवरी के अद्यतन अनुमान से कम रही।  नीति नियंताओं और अर्थशास्त्रियों के मुताबिक भारत मेंं रोजगार दर में बढ़ोतरी में निर्यात में बढ़ोतरी की प्रमुख भूमिका है। भारत की जीडीपी वृद्धि दर 2015-16 में 7.9 प्रतिशत, 2016-17 (पुनरीक्षित अनुमान) में 7.1 प्रतिशत और 2017-18 (अग्रिम अनुमान) में 6.6 प्रतिशत रही। 
 
दक्षिण एशिया पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए विश्व बैंंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि प्रति अंक जीडीपी वृद्धि पर भारत को 7,50,000 नौकरियों के सृजन की जरूरत है। पाकिस्तान में 1 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि पर 2,0,000 नौकरियों और बांग्लादेश मेंं 1,10,000 नौकरियों के सृजन की जरूरत है। नैशनल इंस्टीट्यूट आफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर और अर्थशास्त्री इला पटनायक के मुताबिक, 'भारत की अर्थव्यवस्था में ढांचागत बदलाव हो रहा है और हमारी भविष्य की योजना पर तकनीक के बदलाव का असर रोजाना पड़ रहा है, ऐसे में रिपोर्ट भारत की वृद्धि की वास्तविक तस्वीर नहीं पेश कर रही है।'
 
बेरोजगारी पर बहस से अलग रिपोर्ट में कहा गया है कि 2005 से 2015 के बीच भारत में महिला रोजगार दर मेंं 5 प्रतिशत सालाना की गिरावट आई है, जबकि पुरुषों के रोजगार में मामूली कमी आई है।  श्रम बल हिस्सेदारी की दर से आशय काम करने की उम्र (15 से 59 साल) में नौकरियों की तलाश करने वाली संख्या है। 2015-16 में पुरुषों के श्रम बल की हिस्सेदारी 75.5 प्रतिशत थी, जबकि महिलाओं की हिस्सेदारी महज 27.4 प्रतिशत थी।  विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वे के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि महिला श्रम बल की हिस्सेदारी कम हुई है, जबकि जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक यह स्थिर बनी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंकड़ों में इस असमानता की वजह से रोजगार का अनुमान लगाना कठिन है। ऐसा सिर्फ भारत में नहीं बल्कि अन्य दक्षिण एशियाई देशों में भी यही स्थिति है। 
 
रिपोर्ट में कहा गया है, 'तेज आर्थिक वृद्धि दर से या तो नौकरियों का सृजन होता है या स्वरोजगार से इतर नौकरियों का पुन:आवंटन होता है', लेकिन यह सहसंबंध भारत के लिए बहुत कमजोर है।  हालांकि भारत की वृद्धि दर 2005 के पहले की तुलना में तेज रही है, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि नौकरियों में वृद्धि दर 2005 से 2015 के बीच कम हुई है। वृद्धि के मोर्चे पर रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक वृद्धि दर में सुधार दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाओं के लिए 2017 में सबसे बड़ी राहत रही, लेकिन यह 2018 और 2020 में प्रभावित होने वाली है। इसमेंं यह भी पाया गया कि कुछ क्षेत्रोंं में निर्यात में वृद्धि दर उम्मीद से कम रहने की संभावना है। विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 18 में भारत की वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। 
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