खाते बढ़े पर डिजिटल भुगतान नहीं

मयंक जैन |  Apr 20, 2018 11:16 PM IST

भारत में बड़े पैमाने पर जनधन खाते खुलने और बॉयोमेट्रिक कार्ड 'आधार' को बैंक खाते खोलने की प्रक्रिया में समाहित किए जाने से वित्तीय समावेशन के लैंगिक अंतराल को पाटने में काफी मदद मिली है। विश्व बैंक ने गुरुवार को जारी अपनी रिपोर्ट 'ग्लोबल फिन्डेक्स' में भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में उठाए गए प्रयासों की सराहना की है। यह रिपोर्ट बचत, उधारी, लेनदेन और वित्तीय संपर्क के तरीकों के बारे में दुनिया भर से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट पिछले कुछ वर्षों में भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में किए गए प्रयासों की सराहना करती है। इसके मुताबिक वर्ष 2014 में भारत की केवल 53 फीसदी आबादी के पास ही बैंक खाते थे लेकिन 2017 तक यह संख्या बढ़कर 80 फीसदी हो गई। अब 83 फीसदी पुरुषों और 77 फीसदी महिलाओं के पास अपने बैंक खाते हैं। बैंक खातों की संख्या में यह बढ़ोतरी भारत की वित्तीय प्रणाली के लिए तगड़ा समर्थन तैयार करती है क्योंकि अनौपचारिक एवं असंगठित गतिविधियों से बचत एवं ऋण दोनों में ही गिरावट आती है। 

इस साल की रिपोर्ट डिजिटल भुगतान को काफी तवज्जो देती है। इसके मुताबिक बैंक खाता रखने वाले 36 फीसदी से अधिक भारतीयों ने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी डिजिटल लेनदेन जरूर किया है। इतना ही नहीं, डिजिटल भुगतान का तरीका अपनाने से सरकारी योजनाओं में काफी कुशलता आई है और सरकारी धन की बचत भी हो रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है, 'भारत में पेंशन भुगतान में फंड लीक होने की हालत घटकर 47 फीसदी पर आ गई है। नकद पेंशन देने के बजाय बॉयोमीट्रिक स्मार्ट कार्ड के जरिये भुगतान किए जाने से यह फायदा हुआ है।'

जहां तक बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार एवं पहुंच का सवाल है तो विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि अब दुनिया में कोई भी क्षेत्र दूरदराज का नहीं रह गया है। अगर मोबाइल फोन कहीं भी पहुंच सकते हैं तो बैंक खाते भी हर जगह मौजूद हो सकते हैं। मसलन, बैंकिंग सुविधा से वंचित कुल वैश्विक आबादी के दो-तिहाई लोग भी मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं लेकिन भारत में यह अनुपात 50 फीसदी का है।

वैसे भारतीय नागरिकों की बड़ी संख्या के पास बैंक खाते होने के बावजूद वे उसका खुलकर इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। मसलन, पांच में से केवल एक नागरिक ही वित्तीय संस्थान में अपनी बचत रखता है जबकि कुल आबादी के महज सात फीसदी लोग ही उधारी या कर्ज के लिए वित्तीय संस्थान का सहारा लेते हैं। यह बड़ी परेशानी की बात है क्योंकि वित्तीय संस्थानों से कर्ज लेने वाली आबादी में पिछले छह वर्षों में दो फीसदी की गिरावट ही आई है। प्लास्टिक कार्ड का इस्तेमाल करने वाले लोगों से संबंधित आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। जहां डेबिट कार्ड की पहुंच करीब एक तिहाई आबादी तक हो चुकी है वहीं क्रेडिट कार्ड के मामले में यह संख्या महज तीन फीसदी है।

रिपोर्ट कहती है, 'भारत के उलट केन्या में आधे से भी कम खाताधारकों के पास डेबिट कार्ड हैं लेकिन कार्ड रखने वालों में से एक-तिहाई लोग ही खरीदारी के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं।' हालांकि डिजिटल भुगतान में बड़े पैमाने पर तेजी आना अभी बाकी है। वैसे यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस और आधार के जरिये पैसा सीधे भेजने की शुरुआत होने से डिजिटल भुगतान में थोड़ी तेजी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक केवल दो फीसदी लोगों ने ही अपने फोन पर मोबाइल वॉलेट डाउनलोड किया हुआ है और केवल तीन फीसदी लोग ही अपने बिलों का भुगतान ऑनलाइन तरीके से करते हैं। इसी तरह पिछले एक साल में केवल 16 फीसदी लोगों को ही डिजिटल माध्यमों से भुगतान मिला है। विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है, 'बैंक खाते का एक अहम इस्तेमाल यह है कि डिजिटल भुगतान किया जा सकता है या लिया जा सकता है। कुछ लोग बचत के लिए इन खातों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन डिजिटल भुगतान में उनकी रुचि नहीं है।'
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