बढ़ रहा है भारत-चीन का कारोबारी संबंध

शुभायन चक्रवर्ती | नई दिल्ली Apr 27, 2018 09:42 PM IST

भारत और चीन के बीच कारोबार व निवेश के संबंध पिछले साल तक जटिल रहे हैं। लेकिन अमेरिका द्वारा दोनों देशों के खिलाफ मोर्चा खोल देने के बाद भारत ने कुछ मसलोंं पर चीन के साथ संबंध बढ़ाने की कवायद शुरू की है।  भारत ने अपने उत्तर के पड़ोसी के साथ संबंध बढ़ रहे हैं। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग के साथ हुई बैठक के बाद वैश्विक कारोबार व निवेश के प्रवाह को नई राह देने की उम्मीद बढ़ी है।  चल रहे मौजूदा विवाद और बहुपक्षीय स्तर, खासकर विश्व व्यापार संगठन मेंं विरोधाभासी स्थिति की वजह से दोनों देश एक स्वर में बोलने लगे हैं। मोदी ने शुक्रवार को कहा, 'भारत और चीन ने वैश्विक आर्थिक वृद्धि के विकास के इंजन के रूप में काम किया है और यह पिछले 2,000 साल में 1,600 वर्षों से ज्यादा समय तक हुआ है।' उन्होंने कहा कि आर्थिक मोर्चों पर ज्यादा बातचीत अनिवार्यता बन गई है। 
 
दिलचस्प है कि सिक्कम में डोकलाम में एक महीने तक चली सैन्य तनातनी के महज एक साल बाद यह खुशमिजाजी नजर आ रही है। 2017 में भी चीन से होने वाले आयात को लेकर भी विरोध हुआ था और उपभोक्ता समूहों और राजनीतिक दलों ने इससे घरेलू कारोबार को होने वाले नुकसान व बढ़ते कारोबारी घाटे को लेकर चिंता जताई थी।  2016-17 मेंं कारोबारी घाटा बढ़कर 51.11 अरब डॉलर हो गया, जो उपलब्ध अंतिम आंकड़ा है। चीन, भारत के आयात का बड़ा स्रोत और तीसरा बड़ा निर्यात केंद्र बना हुआ है। दोनों देशों ने सितंबर 2014 में समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत 2019 तक द्विपक्षीय कारोबार संतुलन बनाया जाना था। कारोबार और निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए यह 5 साल के लिए मध्यावधि खाका है। 
 
इस समझौते में चीन सरकार द्वारा उचच्च क्षमता की निर्यात वस्तुओं से प्रतिबंध कम करने की भी बात हुई थी। इनमें से सिर्फ बासमती के मामले में छूट मिली और 14 फर्र्मों को 2016 में चीन में निर्यात की अनुमति मिली।  मार्च में दोनों देशों के उद्योग मंत्रियों ने नई दिल्ली में कारोबार को लेकर बातचीत की, जिसमें गैर बासमती चावल, सोया खली, अनार, भिंडी, केला और बोवाइन मीट सहित अन्य वस्तुओं सहित भारतीय दवाओंं की चीनी बाजार तक पहुंच बनाने को लेकर सहमति बनी। अब दोनोंं देशों ने इस तरह की बैठकें जारी रखने का का फैसला किया है। 
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