बनी हुई है जीएसटी की पहेली

इंदिवजल धस्माना | नई दिल्ली May 07, 2018 09:48 PM IST

सरकार चीनी पर उपकर लागू करने की कवायद में लगी है, जिसे महज एक साल पहले खत्म किया गया था। यह बदलाव नई कर व्यवस्था के तहत कारोबार को लाने के लिए की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी परिषद को उपकर लगाने का अधिकार है। यह नई कर व्यवस्था में राज्यों के घाटे की भरपाई से अलग होगा, जो सिर्फ प्राकृतिक क्षति या आपदा के समय लगाया जा सकता है।  पिछले साल जून महीने में सरकार ने चीनी उपकर अधिनियम 1982 से दूर रहने की घोषणा की थी। बाद में यह अधिनियम 13 अन्य उपकरों के साथ उस समय खत्म कर दिया गया, जब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किया गया था। अब असम के वित्त मंत्री हेमंत विश्व शर्मा की अध्यक्षता वाली समिति चीनी पर 3 रुपये प्रति किलो की दर से उपकर लगाने पर विचार कर रही है, जिसे लेकर जीएसटी परिषद में पिछले सप्ताह तेज मतभेद देखा गया। 
 
विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी पर कोई भी उपकर लागू किया जाना पिछले साल जून में सरकार द्वारा जारी बयान के विपरीत होगा। सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा था कि 2015-16, 2016-17 और 2017-18 के तीन बजटों में धीरे धीरे करके विभिन्न उपकरों को खत्म कर दिया गया है, जिससे कि जीएसटी लागू करने की राह आसान हो सके। इसमें कहा गया था, 'केंद्र सरकार ने चरणबद्ध तरीके से विभिन्न उपकर खत्म करने की दिशा में यह कदम उठाया है, जिससे विभिन्न वस्तु एवं सेवाएं जीएसटी के अलग अलग कर ढांचों में शामिल हो सकें।'  उसके बाद बयान में कहा गया था कि शेष 13 उपकर भी 1 जुलाई 2017 से खत्म हो जाएंगे। 
 
चीनी उपकर अधिनियम 1982 में 2016 में संशोधन कर उपकर की राशि 25 रुपये क्विंटल से बढ़ाकर 200 रुपये क्विंटल कर दी गई थी। इसे बढ़ाने के मकसद चीनी विकास कोष (एसडीएफ) का गठन था। इसका मकसद गन्ना उत्पादकों की मदद करना था।  इस समय चीनी के उत्पादन की लागत बढ़कर 35 रुपये किलो हो गई है और बाजार भाव 26 से 28 रुपये किलो है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, 'गन्ना किसान इस समय बहुत ज्यादा दबाव में हैं।'  खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर अभिषेक रस्तोगी ने कहा, 'इस तरह का कोई भी कदम राष्ट्रीय क्षति या आपदा से जुड़ा है। इसे लेकर सरकार को संवैधानिक बाधा का सामना करना पड़ेगा और अगर सरकार चीनी पर उपकर लगाने का फैसला करती है तो संविधान में संशोधन करना होगा।' उन्होंने कहा कि किसानों के संकट का समाधान जरूरी है, लेकिन वह उपकर के माध्यम से नहीं होना चाहिए।
 
ईवाई इंडिया के पार्टनर अभिषेक जैन ने कहा, 'परिषद को संविधान के तहत उपकर लगाने की शक्तियां हैं, लेकिन यह अच्छा तरीका नहीं होगा क्योंकि इससे एक और कानून सामने आएगा और अनुपालन का बोझ बढऩे के साथ इनपुट क्रेडिट का मसला उठेगा।' उन्होंने कहा कि इसके साथ ही अन्य कई जिंसों पर भी उपकर की बाढ़ आ सकती है, जिससे जीएसटी का एक कानून का मकसद प्रभावित होगा। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर एमएस मणि ने कहा कि विभिन्न करों व उपकर से छुटकारे के लिए जीएसटी की परिकल्पना की गई थी। उन्होंने कहा, 'चीनी उद्योग की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए उपकर लगाने से इसे बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में अन्य उद्योगों मेंं भी इसकी बाढ़ आ सकती है। इसके बाद रबर उपकर, जूट उपकर, चाय उपकर आदि की मांग उठ सकती है, जिसकी वजह से विभिन्न अप्रत्यक्ष कर शुल्क फिर से लागू हो जाएगा।' केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने कहा था कि वह चीनी पर उपकर लगाने को लेकर सहमत होंगे अगर इसी तरह का उपकर रबर पर भी लगाया जाए।
कीवर्ड sugar, GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक