बैंक की 'मुफ्त सेवाओं' पर कर!

दिलाशा सेठ और सोमेश झा | नई दिल्ली May 10, 2018 10:58 PM IST

बैंकों द्वारा ग्राहकों को दी जा रही कथित 'मुफ्त सेवाओं' पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लग सकता है। हालांकि पुराने कर के दौर में इन सेवाओं के लिए कर्जदाताओं को भेजे गए नोटिस वापस लिए जा सकते हैं। अधिकारियों के मुताबिक बैंक मुफ्त सेवाएं नहीं दे रहे हैं, बल्कि 'न्यूनतम खाता बैलेंस' रखने को कहकर वे उपभोक्ताओं से शुल्क ले रहे हैं। 

एक प्रमुख अधिकारी ने कहा, 'कारोबार में कुछ भी मुफ्त नहीं है। अगर आप खाते में न्यूनतम राशि नहीं रखते हैं तो वे आप पर जुर्माना लगाते हैं। आप जो राशि रखते हैं, उसके ब्याज से वे सेवाएं देते हैं। यह मुफ्त नहीं है। वे आपको साल में 4 चेकबुक, एटीएम से मुफ्त नकद निकासी, व्यक्ति आधारित सेवा के अलावा इस तरह की अन्य सेवाएं देते हैं। इसका मतलब वे आपको जो सेवाएं देते हैं, उन पर शुल्क लिया जाता है।' 

अधिकारी ने कहा कि बैंकों ने इन 'मुफ्त सेवाओं' पर निश्चित रूप से जीएसटी लिया जाना चाहिए। अधिकारी ने कहा, 'इसकी जरूरत होगी। अगर यह नहीं होगा तो इसके लिए मांग की जाएगी। ये सभी सेवाएं कर लगाए जाने योग्य हैं।' 

यह मामला तब सामने आया है, जब वस्तु एïवं सेवा कर खुफिया महानिदेशालय (डीजीजीएसटीआई) कार्यालय ने कम से कम 20 निजी, बहुराष्ट्रीय और सरकारी बैंकों को कारण बताओ नोटिस भेजा है, जिसमें यह पूछा गया है कि उन्हें 'मुफ्त सेवाओं' पर सेवा कर, जुर्माना और ब्याज क्यों नहीं देना चाहिए, जो जीएसटी लागू होने के पहले जुलाई 2012 से जून 2017 के बीच उपभोक्ताओं को दी गई है। 

यह मामला आम निर्णय प्राधिकरण द्वारा लिया जा सकता है, लेकिन इसका परीक्षण नहीं होगा क्योंकि यह धोखाधड़ी या आमदनी छुपाने से जुड़ा मामला नहीं है। एक अधिकारी के मुताबिक यह नोटिस वापस लिया जा सकता है, जो पुराने कर काल के तहत भेजा गया है। 

एक अन्य अधिकारी ने कहा, 'चूंकि सभी बैंक एक तरह से प्रभावित हुए हैं, ऐसे में हम सभी मामले एक साथ लेंगे और आम निर्णय प्राधिकरण के पास जाएंगे।'

वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) ने उपभोक्ताओं को 'मुफ्त सेवा' मुहैया कराने पर बैंकों पर कर लगाए जाने का विरोध किया है। डीजीजीएसटीआई अन्य बैंकों को भी इस तरह का नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में है, वहीं डीएफएस ने राजस्व विभाग से कहा है कि इस कदम को आगे न बढ़ाया जाए।  राजस्व अधिकारी ने कहा कि ऐसा नहीं है कि बैंक जान बूझकर कर का भुगतान नहीं कर रहे थे, बल्कि यह इस मामले को समझने से जुड़ा प्रश्न है। वहीं एक और अधिकारी ने कहा कि यह कुछ अधिकारियों की समझ की कमी का मामला लगता है। उन्होंने कहा, 'बैंक अपने ग्राहकों को कुछ सेवाएं मुहैया कराने को बाध्य हैं। कमोबेश इस सेवा के मूल्य की गणना करना कठिन है क्योंकि यह सेवाएं ग्राहकों को मुफ्त मुहैया कराई जाती हैं।'

हर बैंक में ग्राहकों के लिए न्यूनतम बैलेंस रखने का ढांचा अलग अलग है, जो मुफ्त सेवाएं मुहैया कराए जाने के मुताबिक है। कर की मांग इस आधार पर की गई है कि ग्राहक अपने खाते में न्यूनतम बैलेंस बहाल रखते हैं और उसके एवज में बैंकों द्वारा एटीएम से निकासी, चेक बुक, खाते का ब्योरा, इंटरनेट बैंकिंग, डेबिट कार्ड और पिन बदलने की सुविधा मुफ्त मुहैया कराई जाती है। 

डेलॉयट इंडिया में पार्टनर एमएस मणि ने कहा, 'बैंकों द्वारा तय किया गया न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगाया जाने वाले शुल्क से साफ होता है कि बैंक मुफ्त सेवा मुहैया नहीं कराते हैं और इस तरह से उसका मूल्यांकन कर उस पर जीएसटी का भुगतान करने की जरूरत है। बैंकों को उम्मीद है कि उनका पक्ष सुना जाएगा।'

पिछले साल जीएसटी लागू किए जाने के समय यूनाइटेड बैंक, करूर वैश्य बैंक और सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉर्पोरेशन ने केंद्रीय उत्पाद एïवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) से स्पष्टीकरण की मांग की थी, जिसमें उपभोक्ताओं को मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही सेवाओं पर भी जीएसटी लागू हो सकता है। 

सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉर्पोरेशन ने कहा था, 'मुफ्त दी जा रही सेवाओं पर विस्तृत दिशानिर्देश या एफएक्यू (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल) की जरूरत है, जिससे व्याख्या से जुड़े इस मामले का समाधान हो सके।' सीबीईसी ने वादा किया था कि बैंकिंग क्षेत्र पर दिशानिर्देश नोट और एफएक्यू तैयार किया जाएगा। 

करूर वैश्य बैंक ने सीबीईसी से कहा था कि मुफ्त एटीएम निकासी, न्यूनतम बैलेंस न होने पर जुर्माने की माफी और इस तरह की अन्य बैंकिंग सेवाएं जीएसटी के दायरे से बाहर रखी जानी चाहिए क्योंकि इस तरह की सुविधाएं कम मूल्य की हैं। 

सीबीईसी ने बैंक से कहा कि इस तरह की सेवा की राशि निर्धारित की जानी चाहिए और अगर मूल्य के आधार पर अगर यह 50,000 रुपये से कम है तो जीएसटी के दायरे में नहीं माना जाएगा। 

इलाहाबाद बैंक ने जीएसटी पर अपने विस्तृत एफएक्यू में अपनी वेबसाइट पर कहा है कि ग्राहकों को दी जा रही मुफ्त या कम दरों की सेवाओं पर तभी कर लगेगा, जब लेन देन के मूल्य पर सेवा शुल्क लिया जाता है या इसकी वसूली ग्राहकों से होती है। 

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