मॉरिशस और सिंगापुर से भारत में निवेश घटा

पवन बुरुगुला | मुंबई May 13, 2018 09:34 PM IST

कर कानून सख्त होने से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को कर अनुकूल सिंगापुर व मॉरिशस से कारोबार करने वालों को अपनी रणनीति का मूल्यांकन करना पड़ा है।  इन दो न्याय क्षेत्रों की एफपीआई के तहत कुल संपत्ति की संयुक्त हिस्सेदारी रिकॉर्ड निम्न स्तर पर पहुंच गई है। 2012 के बाद से उपलब्ध नैशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी की वेबसाइट के आंकड़ोंं से यह जानकारी मिलती है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका व ब्रिटेन से निवेश बढ़ा है।  मॉरिशस और सिंगापुर अभी भी भारत में एफपीआई निवेश के 5 प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। बहरहाल इनकी एफपीआई संपत्ति में संयुक्त हिस्सेदारी एक साल पहले के 29 प्रतिशत की तुलना में घटकर 25 प्रतिशत रह गई है। इनकी हिस्सेदारी 2015 से लगातार घट रही है। 
 
इस क्षेत्र के प्रेक्षकों का कहना है कि मॉरिशस और सिंगापुर से प्रïवाह सुस्त हुआ है। कुछ बड़े एफटीआई ने फ्रांस और नीदरलैंड जैसे केंद्रों को नए निवेश के लिए चुना। विशेषज्ञोंं का कहना है कि भारत की कर व्यवस्था में कुछ बदलाव की वजह से ऐसा हुआ है।  भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने धनशोधन के डर को देखते हुए पार्टिसिपेटरी नोट्स (पी-नोट) के लिए कड़े प्रावधान किए है। इसके अलावा 2016 में दोहरे कराधान से बचाव समझौते (डीटीएए) को लेकर फिर से बातचीत से निवेश के इन दो मार्गों पर असर पड़ा है। 
 
डीटीएए 1 अप्रैल 2017 से प्रभावी हुआ। इससे इन देशों से होने वाले निवेश पर जीरो कैपिटल गेन एडवांटेज खत्म हो गया, हालांकि अभी भी मार्च 2019 के अंत तक 50 प्रतिशत छूट लागू है। विशेषज्ञों का कहना है कि कर की पूर्ण दरें प्रभावी होने के बाद से इन स्थलों से निवेश और घट सकता है।  आईसी युनिवर्सल लीगल के पार्टनर तेजेश चितलंगी ने कहा, मारिशस और सिंगापुर से ताजा निवेश में मंदी अपेक्षा के मुताबिक ही है क्योंकि भारत सरकार ने डीटीएए की खामियां खत्म कर दी है। सरकार की मंशा एकदम साफ है कि वह निवेशकों को खामियों का लाभ उठाने की अनुमति नहीं देगी। 
 
मॉरिशस और सिंगापुर का आकर्षण कम होने की एक वजह कर भुगतान के लिए जनरल एंटी अवायडेंस रूल्स (गार) है। यह कर अपवंचना के लिए कारोबारी तालमेल को लक्षित करके बनाया गया है। कुछ एफपीआई मॉरिशस की सहायक इकाइयों का इस्तेमाल कर भारत में निवेश कर रही थीं जिससे कर और अनुपालन के बोझ से बचा जा सके।  गार के माध्यम से भारत के कर अधिकारियों को ऐसे कारोबारी समझौतों पर जुर्माना लगाने के लिए बहुत शक्तियां दी गई हैं। अगर कोई कंपनी किसी विशेष कानून का पालन नहीं कर पाती है तो इन प्रावधानों को लागू किया जा सकता है। इसमें यह अनिवार्य बनाया गया है कि जहां निवेश आ रहा है उस न्यायाधिकार क्षेत्र में कारोबारी सेट अप हो। इसके अलावा गार में कर के मकसद से कंपनियों को निवेश का न्यायाधिकार क्षेत्र बदलने को रोकता है। 
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