'मौजूदा सरकार में सबसे ज्यादा आर्थिक सुधार हुए हैं'

संजीव मुखर्जी और इंदिवजल धस्माना |  May 27, 2018 11:29 PM IST

मोदी सरकार के चार वर्ष पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने संजीव मुखर्जी और इंदिवजल धस्माना के साथ अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर बात की। संपादित अंश:

सुधारों और उपलब्धियों के मामले में आप नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल का आकलन कैसे करते हैं?
मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल पर बात करते हुए विरासत में मिली अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखना होगा। अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता थी, निर्णय प्रक्रिया ठप होने के कारण नीतिगत पंगुता के हालात थे, जीडीपी वृद्घि दर कम हो रही थी, मुद्रास्फीति उफान पर थी, चालू खाते का घाटा नियंत्रण से बाहर था और बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा था। खुदरा महंगाई दर अब घटकर 4.5 फीसदी हो गई है, जीडीपी वृद्घि दर बढ़कर 7.5 फीसदी हो गई है, विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड ऊंचाई पर है, नए रोजगार तैयार हुए हैं। पिछली किसी भी सरकार की तुलना में इन चार सालों में सबसे बड़े और अधिक सुधार हुए हैं। हम भरोसे के साथ कह सकते हैं कि अगले चार साल में हमारी सालाना वृद्घि दर 8.5-9 फीसदी रहेगी।

वह कौन सा अधूरा एजेंडा है जिसे अब आगे बढ़ाया जा सकता है?
सरकारी बैंकों के पूरे कारोबारी प्रशासन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। बैंकों द्वारा जोखिम का आकलन करने की क्षमता चिंता का विषय है। बैंकों की सांविधिक तरलता दर 29 फीसदी है यानी वे पैसे को निवेश में डालने में नाकाम हैं। दूसरा अधूरा एजेंडा कृषि से जुड़ा है। अच्छी बात है कि हमने कृषि वृद्धि की जगह किसानों की आय पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। तीसरा है पानी, क्योंकि केवल यही सरकार है जिसने पानी पर ध्यान दिया है। यह तो शुरुआत है। 19 नदी जोड़ परियोजनाएं शुरू होनी हैं। सौभाग्य योजना के अधीन 18,000 गांवों और 4 करोड़ परिवारों को बिजली से जोड़ा गया है लेकिन उन गांवों की तादाद अभी भी काफी कम है जिनको 24 घंटे बिजली मिलती है। बच्चों के पोषण का सवाल भी प्राथमिकता में है। अभी भी देश के 38 फीसदी बच्चों को सही पोषण नहीं मिल रहा है।
क्या सरकार तेल का अर्थशास्त्र संभालने में चूक गई है?
सरकार ने सार्वजनिक व्यय बढ़ाने का हरसंभव संसाधन का इस्तेमाल किया है। उसने इन्हें राजस्व व्यय में गंवाया नहीं है। जब अर्थव्यवस्था संकट में थी और निवेश एकदम कम हो गए थे तो ऐसा करना आवश्यक था क्योंकि दोहरी बैलेंस शीट की समस्या हमारे सामने थी। सरकार ने बुनियादी क्षेत्र, सस्ते आवास, ग्रामीण सड़कों आदि के क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय नहीं बढ़ाया होता तो आप सोच सकते हैं अर्थव्यवस्था की हालत क्या होती। 

परंतु, वैश्विक तेल कीमतों में यह क्षमता है कि वे वृहद आर्थिक मानकों को प्रभावित करें।
तेल कीमतों में बढ़ोतरी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। यह समस्या मांग से नहीं बल्कि आपूर्ति से जुड़ी है। वियना गठजोड़, ओपेक और रूस अपने अपने गठजोड़ के साथ हैं। यह तमाम वजहों से उनके लिए सही साबित हो रहा है। सबसे चकित करने वाली बात यह है कि शेल गैस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। माना जाता है कि जब तेल कीमतें 60-65 डॉलर प्रति बैरल हो जाती हैं तो शेल गैस प्रतिक्रिया देती है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उम्मीद है अगले कुछ महीनों में ऐसा होगा। मुझे लगता है आने वाले दिनों में कीमतों में नरमी आएगी। परंतु हमें वृहद आर्थिक संतुलन को 70-75 डॉलर प्रति बैरल के नए मानक पर देखना होगा। ऐसे में नई जैव-ईंधन नीति अच्छा कदम है। सन्ï 1989-92 के दौरान पेट्रोल की कीमत डीजल का 245 फीसदी थी अब यह 114 फीसदी रह गई है। 

सरकार की नीतिगत प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या वह उत्पाद शुल्क कम करेगी या पेट्रोलियम को जीएसटी के दायरे में लाएगी?
मुझे लगता है आने वाले कुछ सप्ताह में नीतिगत प्रतिक्रिया नजर आएगी। इसे जीएसटी के दायरे में लाने से कंपनियों को बाहरी लागत में मदद मिलेगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हमारे कारोबार प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाएंगे। केवल पेट्रोलियम नहीं बिजली को भी जीएसटी में शामिल किया जाना चाहिए। संभव है राज्य जल्दी इसके लिए मान जाएं। राज्यों में पेट्रोलियम कर 27 फीसदी तक है वह भी यथामूल्य। कीमत बढऩे के साथ उनकी हिस्सेदारी भी बढ़ती जा रही है। वे 27 फीसदी के बजाय इसे 25 या 24 फीसदी कर सकते हैं। महाराष्टï्र और गुजरात जैसे राज्यों को ऐसा करना चाहिए क्योंकि यह उनकी विनिर्माण लागत का हिस्सा है। केंद्र भी उत्पाद शुल्क में कटौती पर विचार कर सकता है बशर्ते गुंजाइश हो। यह आरबीआई के लिए भी संकेत होगा कि हम जवाबदेह राजकोषीय कदम उठाने को तैयार हैं ताकि मुद्रास्फीति और न बढ़े। 
आपने संकेत की बात की है लेकिन आरबीआई जून में ब्याज दर बढ़ा सकता है। आपकी क्या सलाह है। यथास्थिति या दरों में कटौती या कुछ और?
मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। मैं आरबीआई और एमपीसी की स्वायत्तता का सम्मान करता हूं। सरकार के नजरिये से कहूं तो इसमें जितनी देरी होगी उतना अच्छा होगा। 

आपने कहा कि तेल राजस्व गंवाया नहीं गया। परंतु सरकार की एक आलोचना यह भी है कि बजट दस्तावेज में कोई बढ़ोतरी नजर नहीं आती। आपका क्या कहना है? 
यह गलत है। बीते चार साल में हुआ पूंजीगत व्यय पहले से अधिक है। आप खुद देख सकते हैं। इससे राजमार्ग निर्माण में तेजी आई, सागरमाला, भारतमाला आदि परियोजनाएं उदाहरण हैं। पूंजीगत व्यय में इस इजाफे ने हमें बचाया है। अगर निजी व्यय के अभाव में सरकार ने पूंजीगत व्यय नहीं बढ़ाया होता तो हालात बुरे होते। 

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने हाल ही में ट्वीट कर कहा कि सरकार को पेट्रोल कीमतों में प्रति लीटर करीब 25 रुपये की कमी करनी चाहिए लेकिन वह बस 1-2 रुपये की कमी करेगी। 
अगर आप सरकार में नहीं हैं तो ऐसे सुझाव देना आसान होता है। याद रहे कि चिदंबरम के कार्यकाल में भी और उनके पूर्ववर्ती वित्त मंत्री के कार्यकाल में भी अंडर रिकवरी बेहद खराब थी। 

आपने रोजगार की बात की क्या आपको लगता है कि वादे के मुताबिक सालाना एक करोड़ रोजगार तैयार हो रहे हैं?
घोष ऐंड घोष के पर्चे के मुताबिक संगठित क्षेत्र में 70 लाख रोजगार तैयार हुए हैं जो कि खराब प्रदर्शन नहीं है। 

परंतु इसमें अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाना भी शामिल है। 
मुझे पता है लेकिन ताजातरीन आंकड़े बताते हैं कि यह केवल औपचारिकीकरण नहीं है बल्कि इजाफा हुआ है। संगठित क्षेत्र के 70 लाख रोजगार और असंगठित क्षेत्र के रोजगार, मुद्रा योजना के तहत शुरू हुए काम के अलावा ऐसे भी क्षेत्र हैं जिनकी गिनती नहीं होती। रोजगार निर्माण में हमारा प्रदर्शन अच्छा है। हां, रोजगार की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है क्योंकि युवा आज पहले से अधिक आकांक्षा वाले हैं। रोजगार हीन वृद्घि की बहस बंद होनी चाहिए क्योंकि वह श्रम ब्यूरो के आठ क्षेत्रों और 11,000 की तादाद वाले प्रादर्श पर आधारित है। 

आप आयुष्मान भारत योजना कब शुरू करने वाले हैं?
हम उसे जल्द शुरू करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। अच्छा होगा अगर प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लाल किले से इसकी घोषणा कर सकें। परंतु यह काफी जटिल है और अभी काफी मेहनत और राज्यों के साथ काफी तालमेल किया जाना है। 

क्या किसी राज्य ने योजना का विकल्प चुना है।
नहीं ऐसा नहीं हुआ है। यही समझ बनी है कि राज्यों की किसी भी योजना को आयुष्मान भारत में समाहित कर लिया जाएगा। ऐसे में वे उन्हें पहले की तरह चलाते रहेंगे। नीति आयोग में हमने एक राष्टï्रीय स्वास्थ्य एजेंसी भी बनाई जिसका नेतृत्व एक सीईओ को सौंपा गया है। 
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