दवा के दाम तय करने के दिल्ली सरकार के प्रस्ताव से अस्पताल चिंतित

रॉयटर्स | नई दिल्ली Jun 01, 2018 11:10 PM IST

राजधानी दिल्ली के निजी अस्पतालों में चिकित्सा लागत की सीमा तय करने से राजधानी में रहने वाले लाखों लोगोंं को मदद मिलेगी, लेकिन योजना ने अरबों रुपये के चिकित्सा क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। यह क्षेत्र पहले से ही मूल्य नियंत्रण की नीतियों से जूझ रहा है। 

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है, जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कंपनियों द्वारा अवैध मुनाफाखोरी के खिलाफ कड़ा कदम उठाते हुए मेडिकल उपकरणों जैसे घुटना प्रत्यारोपण और हृदय रोग में काम आने वाले उपकरणोंं की कीमतोंं की सीमा तय कर दी है। 


मोदी सरकार ने अस्पतालों में इलाज की लागत को तार्किक बनाने पर भी जोर दिया है। सरकार ने पाया है कि मेडिकल उपकरणों के दाम तय किए जाने के बाद अस्पतालों ने अन्य शुल्क बढ़ा दिए हैं। 

रॉयटर्स ने शुक्रवार को दिल्ली सरकार द्वारा जारी परामर्श पढ़ा है, जिसमें सरकार ने निजी अस्पतालों को निर्देश दिए हैं कि वे मरीजों से दवाओं और डिस्पोजबल्स पर खरीद मूल्य पर 50 प्रतिशत से ज्यादा मुनाफा नहीं ले सकते। इसमें यह भी प्रस्ताव है कि अगर भर्ती के 6 घंटे के भीतर मरीज की मौत हो जाती है तो अस्पतालों को 50 प्रतिशत बिल माफ करना होगा। 

स्थानीय सरकार ने कहा है कि मरीजों से ज्यादा बिल लेने की शिकायतों के बाद यह परामर्श जारी किया गया है। स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन ने कहा कि आम लोगों से परामर्श प्रक्रिया 30 दिन में पूरी होने के बाद यह अनिवार्य हो जाएगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने इस कदम की तारीफ करते हुुए कहा है कि यह मरीजों के लिए वरदान है और इससे लोग इलाज कराने में सक्षम हो सकेंगे। 

अगर ये नियम लागू किए गए तो अपोलो हॉस्पिटल्स इंटरप्राइज लिमिटेड और फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड जैसे बड़े अस्पतालों के लिए झटका होगा, जो दिल्ली सहित देश भर में मौजूद हैं। इस सिलसिले में पूछे जाने पर अपोलो और फोर्टिस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन निजी अस्पतालों में काम करने वाले शीर्ष सूत्रों ने कहा कि इससे मुनाफा घटेगा और अस्पतालों को खरीद मूल्य घोषित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। सूत्रों ने कहा, 'यह लागू किए जाने योग्य नहीं है।' उन्होंने कहा कि उद्योग इस बात से चिंतित है कि अन्य राज्य भी इस तरह के कदम उठा सकते हैं। 

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र के 70 प्रतिशत हिस्से पर निजी क्षेत्र का कब्जा है। सरकारी अस्पताल में बहुत ज्यादा भीड़ और कुप्रबंधन होता है, जिसकी वजह से तमाम लोग निजी अस्पतालों का सहारा लेते हैं। 

पीडब्ल्यूसी इंडिया में हेल्थकेयर के प्रमुख राणा मेहता ने कहा कि यह परामर्श मरीजों के लिए लाभदायक है लेकिन इससे कारोबार प्रभावित होगा। मेहता ने कहा कि नियमन से इस क्षेत्र की व्यावहारिकता पटरी से नहीं उतरनी चाहिए, क्योंकि इससे दीर्घावधि के हिसाब से स्वास्थ्य क्षेत्र की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ेगा। 
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