पिछली तारीख से ग्रैच्युटी कानून नहीं

सोमेश झा | नई दिल्ली Jun 07, 2018 11:15 AM IST

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए 1 जून, 2016 से लागू
►  निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के लिए इस साल 29 मार्च से लागू
नियोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ की आशंका

मोदी सरकार ने नियोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पडऩे की आशंका के चलते ग्रैच्युटी कानून को पिछली तारीख से लागू नहीं करने का फैसला किया है। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए इसे 1 जून, 2016 से लागू किया गया था जबकि निजी और सार्वजनिक उपक्रमों के लिए इस साल 29 मार्च को इस बारे में अधिसूचना जारी की गई थी। निजी और सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े कर्मचारी संगठन उनके लिए भी इसे 1 जून, 2016 से लागू करने की मांग की थी।  

संसद ने मार्च में ग्रैच्युटी भुगतान (संशोधन) विधेयक, 2018 को मंजूरी दी थी। इसमें ग्रैच्युटी की सीमा 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गई थी। यह कानून 29 मार्च से लागू हो गया। लेकिन श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने एक बयान में कहा, 'पहले भी कई मौकों पर यह सूचना दी गई है कि ग्रैच्युटी भुगतान कानून, 1972 के तहत ग्रैच्युटी की सीमा में बढ़ोतरी केवल संभावित तिथि से लागू की गई है।

इसे पिछली तारीख से लागू करना प्रशासनिक रूप से मुश्किल होगा और संभव है कि बकाया देनदारियों का भुगतान करने के लिए नियोक्ताओं के पास पर्याप्त पैसा न हो।' सार्वजनिक उपक्रमों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की ग्रैच्युटी की सीमा केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर करने के लिए कानून में संशोधन किया गया था।

केंद्र ने जुलाई 2016 में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए अपने कर्मचारियों की ग्रैच्युटी सीमा बढ़ा दी थी। इसे एक जून 2016 से लागू किया गया था। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के मामले में सरकार ने ग्रैच्युटी की सीमा बढ़ाने की अधिसूचना 29 मार्च, 2018 को जारी की थी।  

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय को सोशल मीडिया और जन शिकायत पोर्टल के जरिये कर्मचारी संगठनों, लोगों और संस्थाओं की तरफ से बड़ी संख्या में ज्ञापन मिले थे जिनमें केंद्रीय कर्मचारियों की तरह निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए भी ग्रैच्युटी कानून 1 जून, 2016 से लागू करने का अनुरोध किया गया था। लेकिन मंत्रालय का कहना है कि नए ग्रैच्युटी कानून को पिछली तारीख से लागू करने से कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

बिज़नेस स्टैंडर्ड के विश्लेषण के मुताबिक 13 सरकारी बैंकों के 2017-18 के अंकेक्षित नतीजों के मुताबिक ग्रैच्युटी में बढ़ोतरी से उन पर 59 अरब रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा और सभी सरकारी बैंकों में यह राशि 100 अरब रुपये तक पहुंच सकती है।

 

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