एफपीआई समेट रहे निवेश

समी मोडक और अनूप रॉय | मुंबई May 28, 2018 11:34 AM IST

मजबूत डॉलर और वैश्विक अनिश्चितताओं से निवेशक जोखिम लेने से काट रहे कन्नी

बाजार में बिगड़ते हालात के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अप्रैल से बॉन्ड और शेयरों से करीब 441 अरब रुपये मूल्य का निवेश खींच लिए हैं। अमेरिकी डॉलर में लगातार आ रही मजबूती और अमेरिका में 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर प्राप्ति के 3 प्रतिशत तक पहुंचने के बाद एफपीआई के लिए बिकवाली के हालात पैदा हुए हैं। इस बिकवाली से भारतीय वित्तीय बाजार की सेहत बिगड़ गई और 10 साल की परिपक्वता अवधि वाले सरकार बॉन्ड पर प्राप्तियां 8 प्रतिशत तक पहुंचने लगीं।

शेयरों में गिरावट के बीच रुपया भी डॉलर के मुकाबले पिछले 18 महीने के निचले स्तर 68 पर आ गया। वैसे तो एफपीआई ने अप्रैल में ही बिकवाली शुरू कर दी थी, लेकिन इस महीने उन्होंने निकासी तेज कर दी और शेयरों तथा बॉन्ड बाजार से क्रमश: 1.1 अरब डॉलर और 2.5 अरब डॉलर रकम निकाल ली।

पिछले एक साल से अब तक शेयरों में एफपीआई का निवेश ना के बराबर रह गया है, जबकि बॉन्ड बाजार से निकासी 5 अरब डॉलर के करीब पहुंच रही है। मौजूदा हालात पर डाल्टन कैपिटल एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक यू आर भट्ट ने कहा, 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोज पैदा हो रही अनिश्चितताओं और चिंता से निवेशक जोखिम लेने से पहरेज कर रहे हैं। वे अब अधिक सुरक्षित अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड में रकम लगा रहे हैं।' 6 बड़ी मुद्राओं की तुलना में डॉलर की चाल पर नजर रखने वाला डॉलर इंडेक्स अप्रैल से 6 करीब 6 प्रतिशत चढ़का कर 94.25 के स्तर पर पहुंच गया है।

एचएसबीसी में एशियन इकोनॉमिक्स रिसर्च के सह-प्रमुख फ्रेडरिक न्यूमैन ने कहा, 'डॉलर में कारोबार करने वाली सभी चीजें अचानक चर्चा में आ गई हैं। इससे तेजी से उभरते बाजार में निवेश करने से पहले लोग दस बार सोच रहे हैं।' फिलहाल देसी बाजार में विदेशी पूंजी की निकासी रुकने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। अर्थशास्त्रियों की नजर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व अगले महीने ब्याज दरें बढ़ा सकता है।

 
बॉन्ड निवेश पर नुकसान
प्राप्तियां बढऩे के साथ बॉन्ड की कीमतें कम होने के साथ एफपीओ के निवेश का मूल्यांकन कम होता जाता है। भारत में 10 साल की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड पर प्राप्तियां 8 प्रतिशत के करीब पहुंच रही हैं, जो कुछ महीने पहले तक 6.5 प्रतिशत हुआ करती थीं। 2018 में एफपीआई को उनके निवेश पर ब्याज दर और मुद्रा जोखिम दोनों से निपटना पड़ा है। इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च में सहायक निदेशक सौम्यजित नियोगी कहते हैं,'रुपये में मजबूती और भारत सहित वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें कम रहने से  2017 में बड़े एफपीआई ने निवेश बढ़ाया था। अब मामला पलट चुका है और ब्याज दरों में तेजी के साथ तेजी से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है। डॉलर में मजबूती और कच्चे तेल की चढ़ती कीमतें सबसे ज्यादा परेशानी खड़ी कर रही हैं।'

 

कीवर्ड FPI, investment, profit, एफपीआई, अमेरिकी डॉलर, सरकारी बॉन्ड, एचएसबीसी,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक