पेट्रोल से राज्यों को मोटी कमाई

अभिषेक वाघमारे |  May 28, 2018 02:23 PM IST

जब भी आप पेट्रोल पंप से एक लीटर पेट्रोल अपनी गाड़ी में भरवाते हैं तो आपको केंद्र के लगाए उत्पाद शुल्क के ऊपर उस राज्य में लागू मूल्य-वर्धित कर (वैट) भी चुकाना पड़ता है। इसका नतीजा यह होता है कि केंद्र की तरफ से अधिरोपित उत्पाद शुल्क के अलावा राज्य के पास भी 5.3 रुपये प्रति लीटर की दर से वैट जाता है।

हरेक राज्य में पेट्रोल पर चुकाए जाने वाले वैट शुल्क की मात्रा अलग-अलग हो सकती है लेकिन परिदृश्य में कोई बदलाव नहीं आता है। केंद्रीय कर के ऊपर राज्य कर लगाए जाने से भारत के खुदरा उपभोक्ताओं को पिछले दो वित्त वर्ष 2016-17 और 2017-18 में करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 17 राज्यों में पेट्रोल एवं डीजल पर लगने वाले वैट संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया तो उपभोक्ताओं को लगी इस चोट की गहराई का अहसास हुआ। यह आंकड़ा गत दो वर्षों में ईंधन पर लगे वैट से राज्यों को मिले राजस्व का एक तिहाई है। दोहरे कराधान से मिलने वाला यह राजस्व इतना अधिक है कि यह राज्यों की तरफ से चुकाए जाने वाले ब्याज के करीब पांचवें हिस्से के बराबर है।

राज्यों को यह भली-भांति मालूम है कि तेल पर लगने वाले करों को अगर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के तहत समाहित कर लिया जाता है तो उन्हें होने वाली यह भारी आमदनी भी खत्म हो जाएगी। हालांकि बिज़नेस स्टैंडर्ड ने राज्यों के जिन अधिकारियों से बात की, उनका यही मानना है कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से होने वाली राजस्व क्षति की भरपाई केंद्र सरकार करेगी। बिहार सरकार के एक अधिकारी कहते हैं, 'डीजल एवं पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाना राजस्व के लिहाज से राज्यों के लिए तटस्थ साबित होगा। उपभोक्ताओं के नजरिये से भी इसका कोई खास असर नहीं होगा। ईंधन को जीएसटी के दायरे में लाने से इसकी कीमतों में कमी आने की सोच सही नहीं है।'

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय रुझानों का हवाला देते हुए कहा कि ईंधन उत्पादों के क्षेत्र में जीएसटी पर संभवत: एक क्षतिपूर्ति उपकर लगाया जाएगा। एक उपभोक्ता को पेट्रोल-डीजल पर पहले से ही लग रहे कर पर कितना कर चुकाना पड़ रहा है, उसे समझने के लिए एक उदाहरण काफी है। तेल विपणन कंपनी डीलरों को एक लीटर पेट्रोल 37.89 रुपये के भाव पर बेचती है। डीलर उस पर अपना कमीशन जोड़ता है और केंद्र 19.48 रुपये प्रति लीटर की स्थिर दर से उत्पाद शुल्क लगाता है। इस समेकित भाव पर राज्य अलग से वैट (दिल्ली में 27 फीसदी) लगाते हैं। इस तरह पेट्रोल (और डीजल) दोहरे कराधान का शिकार बन जाता है।

केंद्र सरकार ने पिछले दो साल में ईंधन उत्पाद राजस्व के तौर पर करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये कमाए हैं जबकि राज्यों को मिलाकर 3.2 लाख करोड़ रुपये ईंधन शुल्क के तौर पर मिले हैं। राज्यों को इस ईंधन राजस्व में 1.2 लाख करोड़ रुपये कर-पर-कर लगाने से हासिल हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी के पहले एवं बाद वाले दौर में सभी उत्पादों के लिए यही परंपरा रही है।

मसलन, हेयर ऑयल जैसे उत्पाद के मूल्य में कारखाने से निकलने पर उत्पाद शुल्क भी समाहित रहता था। इस मूल्य पर फिर वैट या बिक्री कर लगाया जाता था। गैर-पेट्रोलियम उत्पादों को शुल्क के परंपरागत व्यवस्था के स्थान पर जीएसटी के दायरे में लाना कहीं अधिक सरल था। तेल कीमतों का सरकार के तेल राजस्व पर खास असर नहीं पड़ता है क्योंकि उनके उत्पाद शुल्क की दर स्थिर रहती है लेकिन ऊंची तेल कीमतें के कारण राज्यों का बिक्री कर राजस्व बढ़ रहा है।

यह भी एक वजह हो सकती है कि राज्य पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने के खिलाफ क्यों हैं? इसके अलावा राज्य केंद्र से क्षतिपूर्ति योजना लाए जाने की भी उम्मीद कर रहे हैं। सच तो यह है कि केंद्र का पेट्रोल एवं डीजल से प्राप्त राजस्व 2017-18 की दूसरी तिमाही में गिर गया था। इसकी वजह यह था कि उत्पाद शुल्क में अक्टूबर 2017 में दो रुपये प्रति लीटर की कटौती कर दी गई थी। वित्त वर्ष 2018-19 की शुरुआत से ही कच्चे तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और 1 अप्रैल की तुलना में 22 मई को कच्चा तेल 78.1 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था जो 23 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाता है।

चूंकि राज्य मूल्य-वद्र्धित कर लगाते हैं लिहाजा कच्चे तेल के बढ़े हुए दामों पर वैट लगने से राज्यों का राजस्व और बढ़ गया। पेट्रोल 1 जुलाई 2017 को 25.6 रुपये के आधार मूल्य पर था लेकिन राज्यों में जाने पर उत्पाद शुल्क एवं डीलर का कमीशन जोडऩे के बाद उसका भाव 49.6 रुपये हो गया। इस पर दिल्ली में 27 फीसदी वैट लगने के बाद राज्य सरकार को 13.4 रुपये प्रति लीटर का कर राजस्व मिला।

उसके करीब 11 महीने बाद 23 मई 2018 को ऊंची तेल कीमतों के चलते दिल्ली पहुंचते समय एक लीटर पेट्रोल का समेकित मूल्य 60.8 रुपये हो गया। उस पर दिल्ली में 16.4 रुपये वैट शुल्क के तौर पर राज्य सरकार को मिले जो जुलाई 2017 की तुलना में 20 फीसदी अधिक है। महाराष्ट्र के अधिकारियों ने कहा कि पेट्रोल एवं डीजल को अगर जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो वैट का खात्मा ही हो जाएगा। लेकिन केंद्र से क्षतिपूर्ति मिलने का पूरा भरोसा है।

एक अधिकारी ने कहा, 'जीएसटी कानून में यह प्रावधान किया गया है कि अगर किसी उत्पाद को जीएसटी में लाने से राज्यों को राजस्व क्षति होती है तो उसकी क्षतिपूर्ति केंद्र करेगा। इस लिहाज से पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने पर भी हमें केंद्र से पूरा मुआवजा मिलेगा।'

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