शोधकर्ताओं का दावा कैंसर से बचाएगा चावल

संजीव मुखर्जी |  May 16, 2018 12:32 PM IST

क्या चावल से कैंसर जैसी जटिल बीमारी का इलाज किया जा सकता है? इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) रायपुर और भाभा परमाणु शोध संयंत्र (बार्क) मुंबई के शोधार्थी संयुक्त रूप से एक ऐसी परियोजना पर काम कर रहे हैं। अगर ये सही हैं तो मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के आदिवासी किसानों द्वारा उगाई जाने वाली चावल की तीन किस्मों में ऐसे तत्त्व मौजूद हैं जो फेफड़े और ब्रेस्ट कैंसर का इलाज कर सकते हैं।  

हालांकि उनकी प्रारंभिक जांच विवादों में घिरी है और कैंसर को लेकर जागरूकता फैलाने वाले चिकित्सकों और कार्यकर्ताओं ने इस पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि इस तरह के दावे भरोसा करने लायक नही हैं और इन्हें चिकित्सा विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं किया गया है। चावल की लीचा, गौथन और महाराजी किस्में राज्य में काफी मात्रा में उगाई जाती थीं और वर्तमान में कुछ स्थानीय लोगों के खेतों तक सीमित हैं।

इनमें लीचा का उत्पादन छत्तीसगढ़ के धमतरी, कोंडागांव और कांकेर जिलों में किया जाता है और यह त्वचा रोगों के इलाज के लिए काफी प्रसिद्ध है। महासमुंद और धमतरी जिले में गौथन तथा महाराजी किस्मों की पैदावार की जाती है और स्थानीय लोग इसका उपयोग दवाइयां बनाने में करते हैं। हालांकि कभी भी वाणिज्यिक स्तर पर इनका उपयोग नहीं हुआ है क्योंकि अधिकांश किसानों ने इनकी पैदावार कम कर दी है।

हालांकि पिछले दो वर्ष से इन किस्मों पर काम कर रहे आईजीकेवी के विद्यार्थियों ने बार्क के साथ शोध को आगे बढ़ाने के लिए इन तीन किस्मों का सैंपल लिया है। बार्क में इन तीन किस्मों पर मेथेनॉल एक्सट्रैक्ट से प्रारंभिक परीक्षण किया जा चुका है। ब्रेस्ट कैंसर कोशिकाओं और फेफड़े के कैंसर की कोशिकाओं पर उनके कैंसर-रोधी प्रभाव का परीक्षण किया गया तो कोशिकाओं का विखंडन रुक गया। इनमें से ब्रेस्ट कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए लीचा सबसे कारगर रही।

आईजीकेवी और बार्क के संयुक्त कार्यक्रम के संयोजक दीपक शर्मा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'प्रारंभिक परिणाम बताते हैं कि चावल की इन किस्मों में कैंसर रोधी विशेषताएं हैं। अगर बेहतर शोध, सहायता और बाजार को लेकर प्रयास किए जाएं तो लाखों कैंसर मरीजों के लिए वरदान साबित होगी।' उन्होंने कहा कि कीमो या रेडिएशन थेरेपी से संक्रमित कोशिकाओं के साथ ही गैर-संक्रमित कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं जबकि राइस एक्सट्रेक्ट की सहायता से केवल संक्रमित कोशिकाओं को खत्म किया जा सकता है।

भारत में उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों के मुताबिक कैंसर के नए मामलों में फेफड़ों के कैंसर का हिस्सा 6.9 प्रतिशत है, जबकि पुरुष और महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों में इसकी भागीदारी 9.3 प्रतिशत है। इसी तरह, भारतीय महिलाओं में होने वाले कैंसर के मामलों में ब्रेस्ट कैंसर पहले स्थान पर है। शर्मा कहते हैं कि इन किस्मों के प्रभाव को बेहतर तरीके से जानने के लिए उन्होंने 5 प्रमुख शोध संस्थाओं के साथ साझेदारी की है, जिसमें टाटा मेमोरियल इंस्टीट्यूट का एडवांस सेंटर फॉर कैंसर बायोलॉजी, इंडियन इंस्टीट्यूट कैमिकल टेक्नोलॉजी हैदराबाद और नैशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल बेंगलूरु शामिल हैं।

उन्होंने कहा, 'इन प्रमुख शोध संस्थानों के साथ काम करते हुए हम राइस एक्सट्रेक्ट से बॉर्नवीटा जैसे फूड सप्लीमेंट बनाने पर भी काम कर रहे हैं जो आसानी से खाने योग्य होंगे।' हालांकि चिकित्सा क्षेत्र के जुड़े कई लोग इन दावों का खंडन करते हैं।

कैंसर जागरुकता फैलाने वाले एक समूह रेस टू रीन इन कैंसर की संस्थापक और अध्यक्ष रीता बानिक ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'मैं इस तरह के दावों पर यकीन नहीं करती। इससे पहले भी कई ऐसे उत्पाद बाजार में आए जो कैंसर खत्म करने का दावा करते थे, लेकिन वे विफल रहे। कुछ खानपान संबंधी सुझाव कारगर हो सकते हैं, लेकिन उनसे कीमोथेरेपी जैसी प्रक्रिया को प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।' 

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