जन धन योजना का कैसा रहा सफर

ईशान बख्शी |  May 22, 2018 10:54 AM IST

बेहतर नतीजे

इस साल 2 मई तक 31.5 करोड़ खाते खोले गए, जिनमें 59 फीसदी ग्रामीण इलाकों में खुले
बैंक खातों को मोबाइल और आधार के साथ जोड़े जाने से सरकारी योजनाओं में चोरी हुई कम
सबसे गरीब 40 फीसदी परिवारों की महिलाओं और वयस्कों के बैंक खातों में 30 फीसदी बढ़ोतरी
विश्व बैंक के मुताबिक 2014 में महिलाओं की तुलना में पुरुषों के पास 20 फीसदी अधिक बैंक खाते थे
लेकिन 2017 में यह अंतर घटकर महज 6 फीसदी पर सिमट गया

ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की महत्त्वाकांक्षी जन धन योजना को भारी सफलता मिली है, जिसका मकसद समाज के वंचित तबकों को संगठित वित्तीय व्यवस्था के दायरे में लाना है। दो मई, 2018 तक के आंकड़े दर्शाते हैं कि इस योजना के तहत 31.5 करोड़ खाते खोले गए हैं। इनमें करीब 59 फीसदी यानी 18.58 करोड़ खाते ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की बैंक शाखाओं में खुले हैं। इन खातों में कुल जमाएं 813 अरब रुपये पर पहुंच गई हैं।  

शुरुआत में इस बात पर संशय था कि कितने गरीब परिवार योजना से जुड़ेंगे। लेकिन विश्व बैंक की हाल की ग्लोबल फिनडेक्स रिपोर्ट, 2017 दर्शाती है कि सबसे गरीब 40 फीसदी परिवारों की महिलाओं और वयस्कों के बैंक खातों में 30 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। यह इस बात का संकेत है कि अमीरों और गरीबों के बीच खातों के स्वामित्व के लिहाज से खाई कम हो रही है। 

इन खातों में से आधे से कुछ अधिक महिलाओं ने खुलाए हैं। इसका मतलब है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान बैंक खाते के मालिकाना हक में पुरुष और महिला का अंतर बहुत कम हो गया है।  विश्व बैंक के आंकड़े दर्शाते हैं कि वर्ष 2014 में पुरुषों के पास महिलाओं की तुलना में 20 फीसदी ज्यादा खाते थे, लेकिन वर्ष 2017 तक यह अंतर घटकर महज 6 फीसदी हो गया है।

बैंक खातों में बढ़ोतरी और इन्हें आधार एवं मोबाइल से जोड़े जाने, जिसे मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने 'जैम तिकड़ी' कहा है, से सरकारी व्यवस्था में लीकेज कम हुआ है। इन पहलों से असल बचत कितनी हुई है, इसे लेकर बहस जारी है। लेकिन विश्व बैंक की रिपोर्ट मे कहा गया है कि नकद के बजाय बायोमेट्रिक स्मार्ट कार्ड के जरिये पेंशन भुगतान शुरू होने के बाद धन की चोरी 47 फीसदी कम हुई है। 

हालांकि अब भी कई चुनौतियां बरकरार हैं। पहली, करीब 19 करोड़ भारतीयों के पास अभी कोई बैंक खाता नहीं है। दूसरी, इन खातों को इस्तेमाल करने का स्तर लगातार कम बना हुआ है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन खातों में से 48 फीसदी निष्क्रिय हैं, जो वैश्विक औसत 25 फीसदी का दोगुना है। तीसरा, अध्ययन में पाया गया है कि भारत में केवल 7 फीसदी वयस्क लोग अपने खाते का इस्तेमाल बचत के लिए कर रहे हैं।

 भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलूरु के प्रोफेसर एम एस श्रीराम ने कहा, 'ये खाते प्रेषण का जरिया हैं। सरकार इन खातों में सब्सिडी हस्तांतरित करती है, जिसके बाद उसे प्राप्तकर्ता निकाल लेता है। इसका सिस्टम से कोई जुड़ाव नहीं है।' इसमें लोगों से संपर्क करना भी एक चुनौती है। माइक्रोसेव के एक अध्ययन में पाया गया कि जन-धन योजना से वित्तीय समावेशन में सुधार हुआ है, लेकिन बैंकिंग करेस्पोंडेंट के लिए अपर्याप्त आय और अंतिम छोर पर सेवाएं देने वाले इन एजेंटों के लिए प्रशिक्षण, निगरानी और बुनियादी ढांचे के अभाव से सरकार की अहम योजना के दायरे पर असर पड़ा है।

प्रोफेसर श्रीराम ने कहा, 'लोगों से संपर्क साधना एक बड़ी समस्या है।' उन्होंने कहा, 'बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट को पर्याप्त मेहनताना मिले, इसके लिए बड़ी तादाद में लेनदेन होने जरूरी हैं।' गरीबों के बैंक खाते खोलना सरकार की वित्तीय समावेशन की नीति को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा था। सरकारी व्यवस्था के साथ बेहतर जुड़ाव सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कई वित्तीय योजनाएं मुहैया कराई हैं, जिनका मकसद सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराना है।

आंकड़े दर्शाते हैं कि इन पहलों को अहम सफलता मिली है।  उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई) प्रत्येक ग्राहक को महज 12 रुपये के सालाना प्रीमियम पर एक साल का दुर्घटना मृत्यु एवं अपगंता बीमा कवर मुहैया कराती है। इसका हर साल नवीनीकरण कराया जा सकता है। आंकड़े दर्शाते हैं कि अब तक इस योजना के तहत 13.5 करोड़ लोग नामांकन करा चुके हैं। अब तक योजना के तहत 22,294 दावे किए गए हैं, जिनमें से 16,644 (75 फीसदी) को राशि मुहैया करा दी गई है।

 इसी तरह प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के तहत प्रत्येक ग्राहक को 330 रुपये के सालाना प्रीमियम पर 2 लाख रुपये का एक साल का टर्म लाइफ कवर मुहैया कराया गया है, जिसका हर साल नवीनीकरण कराया जा सकता है। इस योजना के तहत अब तक 5.3 करोड़ लोगों ने नामांकन कराया है। अब तक इस योजना के तहत 5.3 करोड़ लोग नामांकन करा चुके हैं।

अब तक योजना के तहत 1,00,881 दावे किए गए हैं, जिनमें से 92,089 दावों (91 फीसदी) का निपटान किया जा चुका है। इसी तरह प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत 2017-18 में कुल 2.46 लाख करोड़ रुपये वितरित किए गए, जो 2016-17 में 1.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक हैं। इस योजना के तहत लघु एवं मझोले उद्योगों को 10 लाख रुपये तक का ऋण मुहैया कराया जाता है।  

हाल में सरकार ने एक अन्य महत्त्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है, जिसका मकसद 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराना है। हालांकि इस योजना की रूपरेखा पर काम किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञ ऐसी योजना के लिए जरूरी भौतिक बुनियादी ढांचे की कमी को लेकर चिंतित हैं। प्रोफेसर श्रीराम ने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि ऐसी नीतियों को लागू करने के लिए भौतिक बुनियादी ढांचा मौजूद है। सबसे पहले अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं खड़ी करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।'

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