चार साल में बदला है हाल

बीएस संवाददाता |  May 24, 2018 10:56 AM IST

बीएस बातचीत

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि दिल्ली के प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सभी पक्षों को सामूहिक प्रयास करना होगा। बिज़नेस स्टैंडर्ड के पत्रकारों के साथ दो घंटे तक चली बातचीत में उन्होंने अपनी उपलब्धियों और योजनाओं के बारे में खुलकर बात की। संपादित अंश:

दिल्ली में जल और वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए आपकी क्या योजना है?

हमने ट्रैफिक जाम वाले स्थानों की पहचान और उसके कारणों पर एक शोध रिपोर्ट पूरी कर ली है। हमने 40,000 करोड़ रुपये की एक योजना बनाई है और इस पर काम कर रहे हैं। रिंग रोड से प्रदूषण में 27 फीसदी और ट्रैफिक जाम में 40 फीसदी कमी आएगी। इस योजना में दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे भी शामिल है। साथ ही हम 70 अरब रुपये की द्वारका एक्सप्रेसवे परियोजना पर भी काम कर रहे हैं। जहां तक वायु प्रदूषण का सवाल है तो हमें जैव ईंधन और इलेक्ट्रिक पर जोर देना चाहिए। डीजल बस की लागत 110 रुपये प्रति किमी है जबकि मेरे शहर नागपुर में एथेनॉल से बस चलाने पर प्रति किमी 79 रुपये का खर्च है।

इसी तरह इलेक्ट्रिक बस पर 50 रुपये प्रति किमी की लागत आती है। हमें लंदन का मॉडल अपनाने की जरूरत है। इसमें चालक ऑपरेटर कंपनी का होगा और सहचालक निगम का होगा। मैं सभी शहरों में यह मॉडल अपनाने का प्रयास कर रहा हूं। यह ग्रामीण परिवहन में भी उपयोगी हो सकता है। दिल्ली में प्रदूषण की समस्या के पीछे फसल अवशेष जलाना भी एक वजह है। मंत्रिमंडल ने जैव ईंधन नीति को मंजूरी दी है जिसमें फसल अवशेष से एथेनॉल बनाने पर जोर दिया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय भी इससे सहमत है। उसने दूसरी पीढ़ी का एथेनॉल बनाने की परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है और पूर्वोत्तर में बांस से एथेनॉल बनाने की परियोजना पर काम हो रहा है। धान की एक टन पराली से 288 लीटर एथेनॉल बनाया जा सकता है जिसे पेट्रोल के साथ मिलाकर या फिर अकेले इस्तेमाल किया जा सकता है। ऑटो रिक्शा और स्कूटर को एथेनॉल से चलाया जा सकता है।

अमेरिका और ब्राजील में फ्लैक्सी इंजन हैं जो एथेनॉल और पेट्रोल पर चल सकते हैं। उपभोक्ता कीमत देखकर फैसला करते हैं। दिल्ली में जल प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए 12 परियोजनाएं चल रही हैं। दिल्ली सरकार उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर रही है लेकिन मेरी सभी पक्षों से बात चल रही है। अलबत्ता यमुना के मामले में राष्ट्रीय हरित पंचाट के कारण समस्या हो रही है। मेरी योजना 35 किमी रिवर फ्रंट बनाने की थी। हम इसे सिंगापुर के रिक्लेमेशन गार्डन की तर्ज पर विकसित कर सकते हैं। सरकार इसमें कुछ वित्तीय मदद दे सकती है। यह दिल्ली के लिए ग्रीनहाउस की तरह होगा। मेरा सुझाव है कि दिल्ली को दो से तीन साल में प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय, उप राज्यपाल और दिल्ली सरकार को एक योजना बनानी चाहिए।

ऐसी धारणा है कि आप कई सारी परियोजनाओं की घोषणा तो करते हैं लेकिन वे जमीन पर नहीं उतरती हैं। इस पर आप क्या कहेंगे।
मेरा झूठे वादे करने का रिकॉर्ड नहीं है। मैं कुछ ऐसे कार्यक्रमों पर काम कर रहा हूं जिनका बजट एक लाख करोड़ रुपये से अधिक है। मेरी पार्टी के सहयोगियों को भी इस पर भरोसा नहीं होता है। मैंने जो कुछ कहा है उसे पूरा किया है। लेकिन अगर एनजीटी और अदालतें अडंगा लगाती हैं तो फिर मैं कुछ नहीं कर सकता। समस्या यह है कि लोग नेताओं द्वारा किए गए वादों को पूरा होते देखने के आदी नहीं हैं। दिल्ली-मुंबई राजमार्ग पर भूमि अधिग्रहण में हमने अरबों रुपये की बचत की है। इस पर 15 दिन में काम शुरू हो जाएगा। दस जलमार्गों पर पहले ही काम शुरू हो चुका है। पहली प्राथमिकता जलमार्ग, दूसरी रेलवे और तीसरी सड़क मार्ग है। 

तीन साल पहले आपने कहा था कि भूमि अधिग्रहण कोई समस्या नहीं है। क्या अब भी आपका यही मानना है? 

सौ फीसदी। मेरा ट्रैक रिकॉर्ड इसे साबित भी करता है। हमने 70,000 करोड़ रुपये मूल्य का अधिग्रहण एवं मुआवजा देने का काम पूरा किया है। हमने 500 दिनों में रिंगरोड परियोजना पूरी की है। हमने मुआवजे के तौर पर करीब 6,000 करोड़ रुपये दिए हैं। भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत हम मुआवजे के तौर पर जमीन के बाजार मूल्य का डेढ़ गुना दे रहे हैं।

बुलेट ट्रेन परियोजना को क्या जमीन अधिग्रहण की मुश्किलों को सामना करना पड़ रहा है?

ऐसा व्यवस्था के कारण हो रहा है। बुलेट ट्रेन परियोजना के मुंबई-वडोदरा खंड के लिए करीब 80 फीसदी जमीन का अधिग्रहण किया जा चुका है।

सरकार बड़े राजमार्गों, लॉजिस्टिक पार्क और एक्सप्रेसवे के निर्माण की परियोजनाओं को एनएचएआई के नेतृत्व-विहीन रहते हुए भला कैसे पूरा कर पाएगी?

एनएचएआई मौजूदा वित्त वर्ष में 12,000 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने जा रहा है। इसके चेयरमैन को नियुक्त करना तो मेरे हाथ में नहीं है। ऐसी स्थिति में उपलब्ध लोगों से ही अधिकतम काम लेने की कोशिश कर रहा हूं।

बीते वर्ष प्रति दिन सड़क निर्माण के लिए फॉर्मूला बदलने की क्या आवश्यकता थी?
हमने दोनों फॉर्मूला रखे। अब हम अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन कर रहे हैं। 

'राज' और 'नीति' के संबंध में आप क्या अंतर समझते हैं?

राज हमेशा नीति पर ही चलता है। 

आरएसएस के दृष्टिकोण से देखें तो, क्या होता है कि जब नीतियां काम नहीं करतीं, लेकिन तब भी सरकार को समर्थन मिलता है?

आरएसएस हमेशा नीति का समर्थन करता है, न कि राज का। अगर उन्हें लगा होता कि राज ने देश हित के विरोध में निर्णय लिया है, तो वे इस ओर ध्यान दिला देते।

क्या आप इस बात से चिंतित हैं कि अन्य राजनीतिक दल एकजुट हो रहे हैं?

चिंता शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं है। मैंने अपनी औकात और हैसियत के मुकाबले काफी ज्यादा पाया है और मैं अपने हिसाब से जिंदगी जीना चाहता हूं। मैं हमेशा सबसे अच्छे के बारे में सोचता हूं और सबसे बुरे के लिए तैयार रहता हूं।

मोदी सरकार के पांचवें साल में प्रवेश करने पर क्या योजना है?

प्रधानमंत्री ने राजग सरकार के चार साल पूरा होने पर एक समिति बनाई है जिसका प्रमुख मुझे नियुक्त किया गया है। मैंने सलाही दी थी कि हम कोई नई घोषणा न करें और पिछले चार वर्षों में शुरू की गई जनहित वाली योजनाओं को ही पूरा करने पर ही ध्यान दें। इस सरकार के 48 महीने के कामकाज को गांधी परिवार के शासन वाले 48 वर्षों के मुकाबले में देखा जाना चाहिए। हालांकि मैं यह नहीं कहता कि हमने सारी समस्याएं हल कर दी हैं। कृषि संकट अब भी कायम है, कृषि जिंसों के भाव गिरावट पर हैं और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने में भी हमें अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। चीनी से संबंधित मसले हैं और बैंकों के पास भी कर्ज देने के लिए अधिक फंड नहीं है।

आप तो चीनी पर गठित अनौपचारिक पैनल में भी शामिल हैं।
अपने इरादों के बारे में खुलकर बता पाना थोड़ा कठिन है लेकिन हमने एथेनॉल की अगली पीढ़ी का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। एथेनॉल पर 18 फीसदी जीएसटी को घटाकर 12 फीसदी करने की मांग की है। हम बफर स्टॉक रखने की भी योजना बना रहे हैं। इसके अलावा चीन और बांग्लादेश को चीनी निर्यात करने की भी सोच रहे हैं।

आपने कहा था कि जीएसटी अच्छा था। अब एक साल होने जा रहा है तो आपका विचार क्या है? हम चीनी उपकर की बात कर रहे हैं तो क्या जीएसटी विसंगतिपूर्ण है? 

मैं अर्थव्यवस्था का जानकार नहीं हूं। अपने सीमित ज्ञान के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि यह आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा सुधार है। काला धन कम हुआ है, कंपनियों का पंजीयन हो रहा है और मोटे तौर पर लोग खुश हैं। इससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी। 

पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी को लेकर आपका क्या विचार है?

जब जीएसटी की अवधारणा तैयार की जा रही थी तब राज्य सरकारों ने अपनी मंजूरी देते वक्त कहा था कि पेट्रोलियम और अल्कोहल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जाए। मैंने खासतौर पर हसमुख अढिया से कहा था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी लगाने से सरकार को काफी अच्छा राजस्व मिलेगा। इसे लागू नहीं किया गया लेकिन मुझे अभी भी लगता है कि पेट्रोलियम पर जीएसटी लगाने से राज्य सरकारों का राजस्व बढ़ेगा। 

राज्य इसे स्वीकार क्यों नहीं कर रहे हैं? 

अधिकांश राज्य सरकारें राजस्व की कमी से जूझ रही हैं। वे ऐसा करेंगी तो उनके लिए बेहतर होगा।

अर्थव्यवस्था में बुनियादी क्षेत्र पर आपका क्या कहना है?

स्टील क्षेत्र में पहले काफी गड़बड़ी व्याप्त थी अब यह बेहतर स्थिति में है। कच्चे तेल ने भी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है।

सरकार ने वर्ष 2030 तक 100 प्रतिशत इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए योजना बना चुकी है और फिर बाद में इससे पल्ला झाड़ लिया। घरेलू क्षेत्र का विकास कैसे होगा?

किसी अच्छे आइडिया और टेक्नोलॉजी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जल्द ही कार्य तेज किया जाएगा।

फ्लिपकार्ट-वॉलमार्ट सौदे के संदर्भ में छोटे व्यापारी चिंतित हैं। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

हम वैश्विक अर्थव्यवस्था में हैं। हमें वैश्विक सोचना चाहिए और दिल से भारतीय बनना होगा। छोटे व्यापारी अपनी स्वयं की विपणन रणनीति बनाएंगे। 

मल्टी-ब्रांड को अनुमति क्यों नहीं मिली?
हम राजनीतिज्ञ हैं, धर्मात्मा नहीं। जो कार्य राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदायक है, हम उसे नहीं होने देंगे। मैं अपने वादे पर शत प्रतिशत कायम हूं और मुझे इस पर गर्व है। 

हाल में आरएसएस ने ध्यान दिलाया है कि एयर इंडिया में विनिवेश कारगर नहीं रहेगा?

मुझे नहीं पता। मैं आरएसएस का प्रवक्ता नहीं हूं। लेकिन मैंने उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा से बात की है। उन्होंने अपनी फिक्र के बारे में मुझे बताया और जो मुझे लगा वह मैंने जता दिया। मैंने उनसे कहा कि सभी विषयों पर ध्यान देते हुए उन्हें वह सही निर्णय लेना चाहिए जो देश के लिए अच्छा हो।

महाराष्ट्र को विशेष पैकेज देने पर विचार चल रहा है? 

यह कोई विशेष पैकेज नहीं है। बल्कि यह निराश किसानों के लिए है जो सूखे के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। समस्या यह है कि पिछली कांग्रेस-राकांपा सरकार ने ऐसी 108 परियोजनाएं शुरू की थीं जिनके लिए करीब 50,000 करोड़ रुपये की राशि की आवश्यकता है। 

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