'ब्रांड मोदी' के रथ पर सवार भाजपा

आदिति फडणीस |  May 25, 2018 11:40 AM IST

प्रधानमंत्री मोदी का जलवा इतना बढ़ चुका है कि भाजपा उनके विकल्प के बारे में सोच नहीं सकती


वह नवंबर 2016 की एक सर्द सुबह थी। तब तक नोटबंदी का फैसला लागू हुए कुछ दिन बीत चुके थे। सुबह के छह ही बजे थे लेकिन बिस्तर से उठकर कुछ अलसाये हुए लोगों की भीड़ पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) की एक शाखा के बाहर जमा हो चुकी थी। दरअसल उस बैंक के बाहर एक नोटिस चिपका था कि अपने मूल्यवान ग्राहकों को नोट बदलने का मौका देने के लिए सुबह आठ बजे ही शाखा खोल दी जाएगी। कुछ लोग तो तड़के चार बजे से ही बैंक के बाहर लाइन में लगे हुए थे। कुछ पैसे कमाने की संभावना देख एक चायवाले ने भी बैंक के बाहर सुबह-सुबह अपना ठेला लगा लिया।

कुछ मिनटों में ही चाय के साथ राजनीतिक हालात पर चर्चा शुरू हो गई। बातचीत के दौरान एक नाराज नजर आ रहा एक शख्स बोला, 'जरा, हम लोगों की तरफ देखो। अपना ही पैसा लेने के लिए हमलोग यहां पर इंतजार कर रहे हैं।' इतना सुनते ही दूसरा व्यक्ति बोल पड़ा, 'सभी लोग नहीं। हममें से कुछ लोग दूसरे लोगों का पैसा निकालने के लिए भी लाइन में लगे हैं।' तभी वहां खड़ा एक और आदमी कहता है, 'यह बैंक दुनिया का सबसे खराब बैंक होगा। ये लोग कभी भी वक्त पर बैंक नहीं खोलते हैं। देखते जाइए, बैंक खुलते ही बैंक का प्रबंधक बाहर आएगा और नकदी खत्म हो जाने की बात कहेगा। फिर अपने पास मौजूद सभी नए नोटों को अपने साले को दे देगा।'

भीड़ में ही खड़ा एक और व्यक्ति कहता है, 'अकेले बैंक प्रबंधक को ही क्यों दोषी ठहरा रहे हैं? वह तो केवल अपना काम कर रहा है। हमें देश के प्रधान सेवक को सारी गड़बड़ी के लिए दोषी ठहराना चाहिए।' इतना सुनते ही वहां पर मानो सन्नाटा छा गया। शायद वे लोग इस बात पर अपनी-अपनी राय तय कर रहे थे। कुछ देर की चुप्पी के बाद बहस दोबारा शुरू हो गई। आखिर में एक शख्स ने बहस का समापन करने की नीयत से कहा, 'मैं तुम्हारे बारे में नहीं जानता लेकिन कल रात मैंने टीवी देखा था। प्रधानमंत्री की मां खुद एक ऑटो में बैठकर अपने नोट बदलने के लिए बैंक गई थीं। वह तो भारत के प्रधानमंत्री हैं। चाहते तो मां के घर के दरवाजे पर बैंक खुलवा देते लेकिन उनकी बूढ़ी मां हमारी तरह लाइन में खड़ी रहीं।

प्रधानमंत्री देश से काला धन खत्म करने की बात कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमें उनका साथ देना चाहिए, भले ही थोड़ी बहुत असुविधा ही क्यों न हो?' इस बात को सुनने के बाद भीड़ में शामिल अधिकतर लोगों ने हामी भरी। इस वाकये के कुछ महीने बाद ही उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जबरदस्त जीत हासिल की। भाजपा को यह कामयाबी समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच गठजोड़ के बावजूद मिली थी। नोटबंदी के दौरान लाखों लोगों को रोजगार गंवाना पड़ा था और उनके परिवार के पास आजीविका के नाममात्र के ही साधन थे। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के चुनाव में इनमें से अधिकतर लोगों ने भाजपा को वोट दिया।

नरेंद्र मोदी की छवि वर्ष 2013 और 2014 के दिनों की तुलना में काफी हद तक बदल चुकी है। अब तो उनके भाषणों में 'गरीब' शब्द अक्सर सुनाई देता है। जनधन खातों के जरिये वित्तीय समावेशन और कर्ज वितरण योजना 'मुद्रा' राजनीतिक आकर्षण के बड़े साधन साबित हुए हैं। हालांकि इन योजनाओं के व्यावहारिक असर को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है। चुनावी सभाओं में भाषण देते वक्त प्रधानमंत्री मोदी वंचित समाज की बात करते हैं और लोगों के सामने नई सुबह का सपना पेश करते हैं। सभाओं में मौजूद लोगों की भावनाएं समझने में भी कोई देर नहीं होती है। हाल ही में कर्नाटक की एक सभा में जब श्रोताओं ने कन्नड़ में किए जा रहे अनुवाद को लेकर एतराज जताया तो प्रधानमंत्री ने अनुवादक को चुप रहने का इशारा किया और हिंदी में बोलना शुरू कर दिया।

वहां मौजूद हजारों लोगों ने इसका स्वागत अपनी तालियों के साथ किया। यही है 'ब्रांड मोदी'। गिवअप अभियान के दौरान प्रधानमंत्री ने लोगों से यह अपील की थी कि वे अपने पास रखे दूसरे गैस सिलिंडर को वापस कर दें ताकि गरीबों एवं वंचितों को उसे दिया जा सके। आंकड़े बताते हैं कि गैस सब्सिडी छोडऩे की इस अपील से सरकार को करीब 4200 करोड़ रुपये की बचत हुई। अगर इसे नकदी के तौर पर देखें तो ब्रांड मोदी के मूल्य का यह एक हिस्सा भर है।

राजनीति के मैदान में मोदी ने खुद को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि भाजपा में कोई भी उनकी जगह नहीं ले सकता है। भले ही यह पार्टी देश के बड़े हिस्से पर अपने दम या सहयोगी दलों के साथ मिलकर शासन कर रही है, लेकिन दिल्ली या बिहार या गोरखपुर एवं फूलपुर में उनकी कम मौजूदगी का नतीजा भाजपा को हार के रूप में चुकाना पड़ा है। वैसे मोदी 27 मई को बागपत में एक सभा को संबोधित करने वाले हैं। कैराना में 28 मई को होने वाले लोकसभा उपचुनाव को देखते हुए यह सभा काफी मायने रखती है। भाजपा ने मोदी की सभा कैराना के बजाय पड़ोसी जिले बागपत में रखी है। इसके पीछे यही वजह हो सकती है कि प्रधानमंत्री अमूमन उपचुनावों में सभाएं नहीं करते हैं।

 सवाल यह है कि जब भाजपा के पास चुनावों में जीत दिलाने वाला ऐसा अश्वमेध घोड़ा मौजूद है तो फिर उसे किस बात की चिंता सता रही है? एक वजह तो सामाजिक असंतुष्टि हो सकती है। दलित अब भी भाजपा के साथ सहज नहीं हो पाए हैं। भले ही मोदी अंबेडकर की बातें करें लेकिन गौरक्षकों और दूसरे संगठनों की तरफ से दलितों पर हमले की घटनाएं रुकी नहीं हैं। शिया मुसलमानों के बीच पैठ बनाने की भाजपा की कोशिशों के बावजूद अल्पसंख्यक समुदाय अब भी उसके असली एजेंडे को लेकर संदेह का भाव रखता है। मोदी भले ही सबका साथ सबका विकास की बात करें लेकिन मुसलमानों पर हमले और मारपीट की घटनाएं जारी हैं। दरारें दिखनी शुरू हो गई हैं।

कांग्रेस नेता भी मानते हैं कि मुखौटा कंपनियों पर तगड़ी चोट पहुंचाई गई है और अब बैंकों को दिल्ली से निर्देश नहीं दिए जाते हैं। लेकिन राज्यों के स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ा हुआ है, खासकर सरकारी विभागों में आप पैसे देकर कोई भी काम करा सकते हैं। राजस्थान और हरियाणा में भाजपा की सरकारों को अब सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता है। लोगों को लगता है कि मोदी की कथनी और भाजपा मुख्यमंत्रियों की करनी में फर्क है। लोगों के बीच इस सोच को मजबूती मिलते ही भाजपा का बुलडोजर थम जाएगा। लेकिन तब तक नरेंद्र मोदी का शासन चलता रहेगा।

 

कीवर्ड demonetisation, note, narendra modi, प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा, विकल्प,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक