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आम बजट में अमीरों पर पड़ी दोहरी चपत

संजय कुमार सिंह और तिनेश भसीन |  Feb 12, 2017 08:11 PM IST

वित्त वर्ष 2013-14 के आम बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुंह से पहली बार हम सबने 'सुपर रिच' शब्द सुना था और उसकी परिभाषा भी समझी थी। सुपर रिच वे लोग होते हैं, जिनकी सालाना आमदनी 1 करोड़ रुपये से अधिक है। चिदंबरम ने ऐसे लोगों पर 10 फीसदी अधिभार लगाया था। चार साल बाद अब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी एक नया शब्द दिया है। इसी 1 तारीख को 2017-18 का बजट पेश करते हुए उन्होंने एक नया वर्ग 'रिच' बनाया है। इसमें उन लोगों को शामिल किया गया है, जिनकी आमदनी 50 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये के बीच है। जेटली ने उन पर 10 फीसदी अधिभार लगाया है। 

 
एक करोड़ रुपये से अधिक आमदनी वाले करदाता इस समय 15 फीसदी अधिभार चुका रहे हैं। इतना ही नहीं, ऊंची कीमत वाली जमीन-जायदाद पर निशाना साधते हुए कई अन्य कदम उठाए गए हैं। इन कदमों का निशाना यही वर्ग हो सकता है क्योंकि या तो वह जमीन-जायदाद में निवेश करने की गुंजाइश बाजार में तलाशता रहता है या उसके पास एक से अधिक जमीन-जायदाद हैं। इसमें एक बात साफ नजर आती है। व्यक्तिगत कर और बचत के मामले में वित्त मंत्री का सिद्घांत एकदम सीधा रहा है - अमीरों से ले लो और उन्हें दे दो, जिनकी दशा बहुत अच्छी नहीं है। इसलिए 50 लाख रुपये से अधिक और 1 करोड़ रुपये तक की सालाना आमदनी वालों को इस कदम से तकलीफ होगी और कम आय वालों को राहत मिलेगी।
 
कैसे निपटें नए अधिभार से
 
10 फीसदी अधिभार से इस आय वर्ग में आने वाले लोगों की कर देनदारी बढ़ेगी। अगर किसी व्यक्ति की आमदनी 60 लाख रुपये है तो अगले साल उसकी कर देनदारी 1.53 लाख रुपये और बढ़ेगी। वहीं 1 करोड़ रुपये तक की आमदनी वाले लोगों की कर देनदारी में 2.77 लाख रुपये का इजाफा होगा। जिन लोगों की आमदनी 50 लाख रुपये से मामूली अधिक है, वे अपनी कर देनदारी घटाने के लिए कुछ कदम उठा सकते हैं और अधिभार चुकाने से बच सकते हैं। वे अपने नियोक्ता से अपने वेतन के ढांचे में बदलाव करा सकते हैं और 10 फीसदी वेतन राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) में लगा सकते हैं। इस सीमा तक नियोक्ता के योगदान पर कर छूट हासिल की जा सकती है। वे धारा 80सी, 80डी, धारा 80सीसीडी, धारा 24 और धारा 80जी के तहत मिलने वाली विभिन्न प्रकार की कर छूटों का पूरा इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्हें ब्याज से होने वाली आय घटाने की कोशिश भी करनी चाहिए क्योंकि उस पर कर वसूला जाता है। उन्हें ऐसी योजनाओं में ज्यादा निवेश करना चाहिए, जिनमें प्रतिफल पर कोई कर नहीं है। इनमें सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ), कर्मचारी भविष्य निधि, इक्विटी और कर मुक्त बॉन्ड शामिल हैं।
 
आवास ऋण में लाभ की सीमा 
 
अगर आप अपने ही घर में रह रहे हैं तो आपको आयकर अधिनियम की धारा 23 के मुताबिक किसी तरह का कर नहीं चुकाना पड़ता है। ऐसी संपत्ति पर इसी अधिनियम की धारा 24 के तहत ब्याज में सालाना 2 लाख रुपये तक की छूट हासिल की जा सकती है। अगर संपत्ति को किराये पर दिया गया है या यह किराये पर देने के लिए है तो पूरे किराये या अनुमानित किराये पर धारा 23 के तहत कर लगता है। इस पर चुकाए जाने वाले पूरे ब्याज पर कर राशि में कटौती हासिल की जा सकती है। अगर आय के लिहाज से नुकसान हो रहा है यानी मकान से मिलने वाला किराया उसके कर्ज पर दिए जाने वाले ब्याज से कम है तो उस घाटे के बराबर रकम की छूट करदाता किसी अन्य आय में प्राप्त कर सकता है। लेकिन वित्त विधेयक 2017 में प्रस्ताव रखा गया है कि आवासीय संपत्ति में नुकसान की भरपाई की अधिकतम सीमा हर साल केवल 2 लाख रुपये होगी। उसके बाद भी कोई नुकसान बचता है तो उसे अगले 8 सालों में घर से होने वाली आय में समायोजित किया जाएगा।
 
भारत में केपीएमजी के पार्टनर और वैश्विक मोबिलिटी सेवाओं की प्रमुख परीजाद सिरवाला कहती हैं, '2 लाख रुपये से ज्यादा नुकसान वाले व्यक्तिगत करदाताओं को अब ज्यादा कर चुकाना होगा।' सैंक्टम वेल्थ मैनेजमेंट के उत्पाद एवं समाधान प्रमुख प्रतीक कांत बताते हैं, 'हर किसी को प्राप्त बुनियादी छूट और कटौतियों के बाद उच्च कर वर्ग में आने वालों के लिए यह कर संबंधी बड़ा लाभ था। इसके खत्म होने से उन्हें जबरदस्त चपत लगी है।'
 
इसे एक उदाहरण के जरिये समझते हैं। मान लीजिए, आपके पास एक मकान है, जिसमें आप खुद नहीं रहते हैं। आपने उसे किराये पर चढ़ाया है और हर लाख आपको किराये से 3 लाख रुपये की आमदनी होती है। आपने उस मकान के लिए जो कर्ज लिया है, उस पर आप सालाना 8 लाख रुपये का ब्याज भी चुकाते हैं। जब आप किराये में से ब्याज को घटा देते हैं तो आपको कुल 5 लाख रुपये का घाटा होता है। आप इसी घाटे के बदले किसी अन्य आमदनी में कर छूट का फायदा अभी तक ले सकते थे। लेकिन अगले साल से आप हर साल केवल 2 लाख रुपये के घाटे की ही भरपाई अन्य आमदनी से कर पाएंगे। बाकी 3 लाख रुपये की भरपाई आप अगले 8 साल में कर पाएंगे।
 
अरविंद राव ऐंड एसोसिएट्स के वित्तीय योजनाकार और संस्थापक अरविंद राव कहते हैं, 'इसमें दो मसले हैं। जिस घाटे की भरपाई की जा सकती है, उसकी अधिकतम सीमा 2 लाख रुपये तक कर दी गई है। इसके अलावा जिस नुकसान को आगे के सालों के लिए ले जाया जाएगा यानी कैरी फॉरवर्ड किया जाएगा, उसके बदले किराये से हुई आमदनी पर ही कर छूट ली जा सकेगी, किसी अन्य प्रकार की आमदनी पर नहीं।' विशेषज्ञों का कहना है कि जिन लोगों पर कर का बोझ अधिक है, वे घाटे को आगे ले जाने के बाद भी पूरी राशि पर छूट का लाभ नहीं उठा सकेंगे। इसीलिए आगे चलकर दूसरे घर में अपनी ही रकम से निवेश करना बेहतर होगा, कर्ज लेकर नहीं। उन्होंने कहा, 'अब कर्ज लेकर खरीदारी करने की तुक नहीं रह जाएगी क्योंकि कर का लाभ खत्म हो गया है।' 
 
किराये पर कटेगा टीडीएस
 
बजट में उन लोगों पर अतिरिक्त अनुपालन का बोझ डाला गया है, जो हर महीने 50,000 रुपये से अधिक का किराया चुकाते हैं। उन्हें सालाना किराये का 5 फीसदी टीडीएस काटना होगा और इसे जमा कराना होगा। अगर किरायेदार टीडीएस का भुगतान नहीं करेगा तो उसे दंडित किया जा सकता है। राव कहते हैं, 'वेतनभागी कर्मचारी अगर किराया कम दिखाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें उससे फायदा नहीं मिलेगा क्योंकि आवास किराया भत्ते (एचआरए) में उन्हें चोट पड़ जाएगी।'
 
लाभांश पर दीजिए कर
 
अधिक आमदनी वाले जो लोग शेयरों में निवेश करते हैं, उन्हें लाभांश से अगर 10 लाख रुपये या उससे अधिक की आय होती है तो उनसे 10 फीसदी कर पहले से ही वसूला जाता है। पिछले साल यह प्रावधन आने के बाद कई लोगों ने अपने शेयरों को पारिवारिक ट्रस्ट में भेजना ही मुनासिब समझा था क्योंकि उस पर किसी तरह का कर नहीं लगता। वित्त मंत्री ने इस साल उन ट्रस्टों पर भी कर लगाने का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा है कि अगर ट्रस्ट धर्मार्थ या सहायतार्थ नहीं है तो उससे कर वसूला जाएगा। कर विशेषज्ञों का कहना है कि आगे भी लोग शेयरों के लिहाज से ट्रस्टों को ही तरजीह देते रहेंगे, लेकिन भविष्य में उनसे इतना कर नहीं बच पाएगा। इस कदम से वेतनभोगियों के मुकाबले प्रवर्तक ज्यादा प्रभावित होंगे।
 
बहरहाल बीडीओ इंडिया में पार्टनर (प्रत्यक्ष कर) जिगर सैया को लगता है कि इससे प्रवर्तकों से भी ज्यादा चोट वेतनभोगियों को पड़ेगी। वह कहते हैं, 'प्रïवर्तक पहले ही अपनी कंपनी की आमदनी पर करीब 30 फीसदी निगमित कर चुका देता है। इसके अलावा उसे करीब 20 फीसदी लाभांश वितरण कर भी चुकाना पड़ता है। अब प्राप्त लाभांश पर 10 फीसदी अतिरिक्त कर और लगा दिया गया है।' व्यक्तिगत या हिंदू अविभाजित परिवार के जरिये या निजी ट्रस्टों के रूप में शेयर रखने वाले प्रवर्तकों पर कर की प्रभावी दर अब 36 फीसदी से भी अधिक हो जाएगी।
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