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रहें तैयार ताकि नौकरी जाए तो न मचे हाहाकार

प्रिया नायर |  Mar 05, 2017 09:36 PM IST

लीमन संकट ने 2008 में पूरी दुनिया को हिला दिया था और छंटनी की तलवार जमकर चली थी। उसके करीब एक दशक बाद एक बार फिर छंटनी सुर्खियां में है। एचडीएफसी बैंक हो या स्नैपडील जैसी ई-कॉमर्स कंपनी, बहुत सी कंपनियां लागत घटाने और पैसा बचाने के लिए कर्मचारी कम कर रही हैं। एचडीएफसी बैंक ने तीसरी तिमाही में 4,500 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) जैसे तमाम क्षेत्रों को भी अनिश्चितता भरे वैश्विक माहौल और कंपनियों के एकीकरण के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। 

 
भारत में निजी क्षेत्र में छंटनी से निपटना और मुश्किल है क्योंकि नौकरी से निकालते समय दी जाने वाली रकम (सेवरंस पैकेज) को लेकर नियम या तो हैं ही नहीं या बहुत नरम हैं। नियोक्ता कंपनी माइकल पेज इंडिया के निदेशक अंकित अग्रवाल कहते हैं, 'वरिष्ठ प्रबंधन पेशेवरों को 3 या 6 महीने और कहीं-कहीं 12 महीने का वेतन बतौर सेवरंस पैकेज मिल सकता है। लेकिन इसको लेकर एकसमान नियम नहीं हैं और अलग-अलग संगठन में अलग-अलग पैकेज होते हैं।'
 
बहरहाल सवाल यह खड़ा होता है कि ऐसी सूरत में किया क्या जाए। जाहिर है कि नौकरी जाने के हालात से निपटने की तैयारी पहले से होनी चाहिए। लेकिन इसकी तैयारी कैसे की जाए? अगर आपकी नौकरी चली जाती है तो आपको अपनी वित्तीय स्थिति का कैसे प्रबंधन करना चाहिए? विशेषज्ञों का कहना है कि जब ऐसी स्थिति आए तो अपने निवेश और ऋण में जोखिम से बचना चाहिए।
 
आपात कोष बेहद जरूरी
 
आपात कोष बनाना हर परिवार के लिए जरूरी है। आमतौर पर यह सुझाव दिया जाता है कि उतनी राशि अपने पास रखनी चाहिए, जो 3 से 6 महीने के जरूरी खर्चों, बीमा प्रीमियम और ऋण की किस्तों के लिए पर्याप्त हो। लेकिन अगर आप ऐसे क्षेत्र में काम करते हैं, जिसकी हालत ज्यादा पतली है तो एक साल तक के खर्च के लिए पर्याप्त राशि का कोष बनाना उचित होगा। इस धनराशि का अल्पावधि डेट फंडों, लिक्विड फंडों या बैंक सावधि जमाओं में निवेश किया जाना चाहिए। 
 
सेबी में पंजीकृत एक वित्तीय सलाहकार अमित कुकरेजा कहते हैं, 'आपात कोष का आकार कर्मचारी के वरिष्ठता स्तर और उद्योग पर आधारित होना चाहिए।' कनिष्ठ स्तर के कर्मचारी को कुछ महीनों में नई नौकरी मिल सकती है। मध्यम स्तर के कर्मचारी को नौकरी मिलने में 3 से 4 महीने का समय लग सकता है, जबकि उपाध्यक्ष या प्रबंध निदेशक स्तर के वरिष्ठ कर्मचारी को उपयुक्त नौकरी हासिल करने में एक साल या अधिक समय लग सकता है। इसी तरह विमानन क्षेत्र के कर्मचारी को दूसरी नौकरी हासिल करने में ज्यादा समय लग सकता है, जबकि स्वास्थ्य या दवा उद्योग के कर्मचारी को जल्दी नौकरी मिलने के आसार होते हैं। इस धन (आपात कोष) को उसी स्थिति में निकालना चाहिए, जब नौकरी चली जाए। कुकरेजा कहते हैं, 'भले ही आप अपने संगठन में खुद को कितना ही सुरक्षित और स्थायी महसूस करें, लेकिन अपने घर के कर्ज को वक्त से पहले चुकाने या दोस्तों-रिश्तेदारों को उधार देने के लिए इस रकम का इस्तेमाल भूलकर भी न करें।'
 
प्रीमियम का हो पूरा इंतजाम
 
आपात कोष में बीमा- टर्म लाइफ इंश्योरेंस, स्वास्थ्य बीमा और व्यक्तिगत दुर्घटना तथा अपंगता कवर के लिए सालाना प्रीमियम शामिल किया जाना चाहिए। अगर आपके पास कार और घर है तो कोष में इन संपत्तियों का बीमा शामिल करना चाहिए। आपको इनका प्रीमियम नौकरी चले जाने के बाद भी चुकाते रहना चाहिए ताकि कवर बना रहे। सेबी में पंजीकृत वित्तीय योजनाकार तथा गुड मॉर्निंग फाइनैंशियल सॉल्यूशंस के संस्थापक मणिकांत सिंघल कहते हैं, 'अगर आपकी नौकरी चली जाती है और किसी कारणवश आपको या आपके परिवार से किसी को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है तो इलाज का खर्च निकालने के लिए आपात कोष का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं करें। इसके लिए आपको स्वास्थ्य बीमा लेना चाहिए, जो आपकी वहन करने की क्षमता के मुताबिक हो। महानगरों में चार लोगों के परिवार के लिए 20 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा पर्याप्त होगा।'
 
नौकरी बीमा से बचें
 
आजकल ऐसी बीमा पॉलिसी मौजूद हैं, जिनमें अगर आपकी नौकरी चली जाती है तो वे तीन महीने तक का खर्च कवर करती हैं। ये आम तौर पर तीन महीने का वेतन देती हैं और सबसे अहम बात यह है कि तीन मासिक किस्तें (ईएमआई) भी आपकी ओर से चुकाती हैं। लेकिन इनमें भी कुछ नियम एवं शर्तें जुड़ी हुई होती हैं। सृजन फाइनैंशियल एडवाइजर्स एलएलपी की संस्थापक दीपाली सेन कहती हैं, 'इस बीमा का लाभ लेने के लिए यह जरूरी है कि व्यक्ति की नौकरी प्रदर्शन ठीक नहीं कर पाने या धोखाधड़ी की वजह से नहीं गई हो और उसे 90 दिनों के भीतर दूसरी नौकरी नहीं मिली हो। इसका इस्तेमाल एक बार ही किया जा सकता है। अगर आपकी नौकरी दोबारा छूट जाती है तो आपको बीमा का लाभ नहीं मिलेगा। इसलिए यह विकल्प महंगा पड़ता है और इससे बचा जाना चाहिए।'
 
रोक दीजिए निवेश
 
निवेश ऐसा करें, जिसमें जोखिम कम से कम हो और जरूरत पड़े तो सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) भी रोक दें। सिंघल कहते हैं, 'अगर आपने यूलिप जैसी योजना में रकम लगाई है तो उससे बाहर आने का यह बिल्कुल सही मौका होगा। उसे भुना लें और रकम निकाल लें।' अगर आप निवेश जारी रखते हैं तो इक्विटी में निवेश घटा दें और डेट में आवंटन बढ़ा दें। जब आपको दूसरी नौकरी मिल जाए तो  शेयरों में अपना निवेश बढ़ा सकते हैं। बहुत से लोग यह गलती करते हैं कि वे तुरंत पैसा कमाने के लिए विकल्प तलाशते हैं। उदाहरण के लिए वे ऐसे शेयरों में निवेश कर सकते हैं, जिनमें अल्पावधि में अच्छा प्रतिफल मिलने और ज्यादा लाभांश मिलने की उम्मीद नजर आ रही हो। सिंघल कहते हैं कि जितना संभव हो सके, ऐसे निवेश से बचा जाना चाहिए।
 
कर्ज पर डालिए नजर
 
आपको अपने ऋणों की ईएमआई का भुगतान करते रहना चाहिए। कुकरेजा कहते हैं, 'नौकरी चली जाने के बाद ऋणों के पूर्व भुगतान के बारे में विचार भी नहीं करें। अगर आप सभी ईएमआई भरने की स्थिति में नहीं हैं तो ऋणों की अवधि के आधार पर उनकी समीक्षा करें। अगर आपको कर्ज लौटाने में दिक्कत आ रही है तो ईएमआई की अवधि आगे बढ़ा दें।' क्रेडिट कार्ड लोन और पर्सनल लोन ऐसे ऋण होते हैं, जिन्हें जल्द चुकाया जाना चाहिए क्योंकि वे बहुत ज्यादा महंगे होते हैं। क्रेडिट कार्ड लोन लौटाने में देरी पर जुर्माना अधिक है। आप अपने आवास ऋण पर कुछ समय की मोहलत के लिए बैंक से बात कर सकते हैं। सेन कहते हैं कि हालांकि ऐसे मामलों में बैंक ऋण लेने वाले की स्थिति के आधार पर फैसला लेते हैं। हालांकि पर्सनल लोन लेकर अन्य ऋणों के भुगतान करने जैसे पचड़ों में न पड़ें। सिंघल अपने एक दोस्त का उदाहरण देते हैं, जिन्हें ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा। लेकिन जब उनके दोस्त ने गुणा-भाग लगाया तो उन्होंने पाया कि नए ऋण की ईएमआई वर्तमान ऋणों से अधिक थी। इसके अलावा वर्तमान ऋणों की अवधि दो साल है, जबकि नए ऋण को चुकाने में छह साल लगेंगे। 
 
फिजूलखर्ची घटाएं
 
ईएमआई, बीमा प्रीमियम, घर का खर्च, बच्चों की फीस जैसे जरूरी खर्च करने चाहिए, लेकिन बाहर छुट्टियां मनाने जाने या अपने घर की आंतरिक साज-सज्जा जैसे खर्चों को घटाया जाना चाहिए। जीवनशैली से जुड़े खर्च घटाना मुश्किल तो होता है, लेकिन अगर नौकरी चली जाए तो ऐसा करना बहुत जरूरी हो जाता है। 
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