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एचआरए के दावे के लिए किराये की रसीद नाकाफी

तिनेश भसीन |  Apr 30, 2017 09:34 PM IST

अब आवास किराया भत्ते (एचआरए) की प्राप्ति रसीद भरते समय आपको इसकी पुष्टिï के लिए अलग से भी कागजात की जरूरत पड़ सकती है। हाल में ही इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आईटीएटी) मुंबई ने अपने एक आदेश में इस संबंध में आदेश दिए हैं। एक करदाता ने यह कहते हुए 2.52 लाख रुपये के एचआरए का दावा किया कि वह अपनी माता को किराया देती है। जब उनसे इससे जुड़े संबंधित कागजात की मांग की गई वह कोइ प्रमाण नहीं दे पाईं, जिससे वह मुकदमा हार गईं। 

 
आरएसएम एस्ट्यूट कंसल्टिंग ग्रुप के संस्थापक सुरेश सुराणा कहते हैं, 'एचआरए का दावा करते समय किसी व्यक्ति को दो शर्तें पूरी करनी चाहिए। पहली बात तो यह कि वास्तव में उसका जायदाद पर नियंत्रण है और दूसरी बात यह कि मकान मालिक वास्तव में किराया प्राप्त करता है। इसके लिए सुनिश्चित करें कि आपके पास नोटरी में बना लीव-ऐंड-लाइसेंस एग्रीमेंट है। इस बारे में सोसाइटी को सूचित किया जा सकता है। इसके अलावा रकम के स्थानांतरण का रिकॉर्ड भी होना चाहिए, इसलिए जायदाद मालिक को रकम के भुगतान के लिए बैंकिंग माध्यम का इस्तेमाल करें। अगर आप नकद में भुगतान करते हैं तो एटीएम निकासी में यह दिखना चाहिए।
 
ऊपर जिस मामले का जिक्र किया गया है उसमें आय कर विभाग ने इस बात की भी जांच की कि बिजली और पानी बिल का भुगतान कौन करता है। टैक्समैन डॉट कॉम के नवीन वाधवा कहते हैं, 'समीक्षा अधिकारी अमूमन ऐसी सूचनाओं की मांग नहीं करता है, लेकिन इस मामले में करदाता अपने दावे की पुष्टिï करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए उससे विस्तृत जानकारी मांगी गई। समझौते और रकम के अंतरण के रिकॉर्ड के अलावा अगर प्राप्तिकर्ता कर रिटर्न दाखिल करता है और दावा करता है कि उसे किराया मिला है तो इससे आपका मामला और मजबूत हो सकता है।' 
 
अगर आप अपने माता-पिता, जिनकी आय कर योग्य नहीं है, को किराये का भुगतान करते हैं तो उनके द्वारा कर दाखिल करना और किराये के तौर पर प्राप्त रकम का उल्लेख करना फायदेमंद होगा। जायदाद के रख-रखाव के तौर पर उन्हें 30 प्रतिशत रियायत मिलती है। किराया अधिक दिखाना समस्याएं खड़ी कर सकता है। सुराणा कहते हैं कि किराया किसी क्षेत्र में किराये के मौजूदा रुझान को दिखाता हुआ होना चाहिए। कर विभाग ने पिछले साल 12बीबी फॉर्म की शुरुआत की है, इसलिए नियोक्ताओं को भी गलत जानकारी देने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आईटीएटी मुंबई मामले में जो हुआ वह आपके साथ भी हो सकता है। हरेक साल कर विभाग दाखिल होने वाले आयकर रिटर्न में 3 प्रतिशत की जांच विभिन्न बातों जैसे एक निश्चित सीमा से अधिक आय, दाखिल में दिखाया गया बड़ा लेन-देन आदि के लिए करता है। यह जांच आयकर विभाग की धारा 143 (3) के तहत की जाती है, जहां करदाता को संबंधित प्रमाण देकर आय, व्यय, कटौती, नुकसान, रियायत आदि का ब्योरा देने के लिए कहा जाता है। 
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