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जायदाद के सौदे में इस्तेमाल करें विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी

तिनेश भसीन |  Jun 18, 2017 08:06 PM IST

सर्वोच्च न्यायालय ने पावर ऑफ अटॉर्नी का दुरुपयोग करने वालों पर तल्ख रुख अपनाया है और यह भी स्पष्टï किया है कि इसके मायने क्या हैं, उसके बावजूद पावर ऑफ अटॉर्नी का गलत इस्तेमाल जस का तस जारी है। जब ध्रुव रावत अपने लिए मकान तलाश रहे थे तो किसी एजेंट ने उन्हें एक फ्लैट दिखाया। वह फ्लैट सरकार ने तीन साल पहले लॉटरी के जरिये बेचा था। फ्लैट सस्ता तो था, लेकिन उसमें एक बड़ी दिक्कत थी। उसका मालिक अगले दो साल तक फ्लैट बेच नहीं सकता था। मुश्किल हल करने का रास्ता भी एजेंट के पास था, जो उसने चुटकियों में सुझा दिया। उसने कहा कि मकान मालिक रावत को पावर ऑफ अटॉर्नी दे सकता है, जिसे वापस नहीं लिया जा सकता यानी खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन जब रावत इस बारे में मशविरा करने अपने वकील के पास पहुंचे तो उसने यह काम बिल्कुल भी नहीं करने की सलाह दी।

 
जे सागर एसोसिएट्स में पार्टनर होरमुज मेहता कहते हैं, 'चूंकि पावर ऑफ अटॉर्नी का गलत इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा था, इसीलिए उच्चतम न्यायालय स्पष्टï कर चुका है कि पावर ऑफ अटॉर्नी होने से किसी को मकान या जमीन या किसी भी संपतित का मालिकाना हक नहीं मिल जाता।' इसका मतलब है कि सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी यानी जीपीए जिसके नाम है, वह असली मालिक (जिसने पावर ऑफ अटॉर्नी दी है) की ओर से जमीन या संपत्ति बेच नहीं सकता।
 
धारणा ही गलत
 
बहुत लोग संपत्ति के सौदे में जीपीए का इस्तेमाल इसीलिए करते आए हैं ताकि उन्हें स्टांप शुल्क और निबंधन यानी रजिस्ट्री का शुल्क नहीं चुकाना पड़े। अरसे से यह धारणा रही है कि जीपीए होने भर से उन्हें किसी भी संपत्ति पर मालिकाना हक मिल जाता है, जो बिल्कुल गलत है। वकीलों के मुताबिक यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर संपत्ति पर किसी तरह का विवाद शुरू हो जाता है तो जिस शख्स के पास जीपीए है, उसे उच्चतम न्यायालय के फैसले के हिसाब से संपत्ति पर अपना अधिकार गंवाना भी पड़ सकता है।
 
वास्तव में जीपीए का मतलब यह होता है कि जिसके हाथ में पावर ऑफ अटॉर्नी है, वह संपत्ति के असली मालिक का एजेंट है। शार्दूल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर राधिका दुधाट परेरा समझाती हैं, 'जीपीए में जो भी लिखा है, उसके मुताबिक धारक अदालत में, बैंक में अथवा किसी अन्य संस्था में उस व्यक्ति का प्रतिनिधि बनकर पहुंच सकता है, जिसने वह पावर ऑफ अटॉर्नी दी है। वह विभिन्न प्राधिकरणों में अनुमतियों के लिए आवेदन भी कर सकता है। यह अधिकार पत्र की ही तरह होता है, जिसमें जीपीए देने वाले की ओर से उसे रखने वाला कुछ खास काम कर सकता है। लेकिन इसे रखने वाला मनचाहे काम नहीं कर सकता है और न ही वह किसी तरह का फायदा उठा सकता है। उसके लिए उसे विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी की जरूरत होगी।'
 
जीपीए का इस्तेमाल आम तौर पर प्रवासी भारतीय करते हैं। वे भारत में तमाम तरह के मामले सुलटाने का अधिकार किसी खास व्यक्ति को देने के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी बना देते हैं। जिसके पास यह जीपीए होती है, वह असली मालिक की ओर से सोसाइटी की बैठकों में शामिल हो सकता है, बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों से भी बातचीत कर सकता है। लेकिन जीपीए को विधिमान्य कानूनी दस्तावेज तभी माना जाता है, जब उस पर स्टांप लगा हो और नोटरी के हस्ताक्षर भी हों। जे सागर एसोसिएट्स के मेहता कहते हैं, 'इस बात पर अभी तक मामला साफ नहीं हुआ है कि जिस व्यक्ति ने पावर ऑफ अटॉर्नी दी है, उसकी मौत होने पर भी उसे कानूनी दस्तावेज माना जाएगा या उसकी कानूनी मान्यता खत्म हो जाएगी। इस विषय पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों ने अलग-अलग विचार दिए हैं।'
 
अचल संपत्ति के लिए
 
रियल एस्टेट से जुड़े मामलों में पावर ऑफ अटॉर्नी को कानूनी मान्यता तभी मिलेगी, जब वह विशिष्टï या विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी (एसपीए) हो और उसकी रजिस्ट्री भी करा दी गई हो। एसपीए पर स्टांप शुल्क अलग-अलग होता है और वह इस बात पर निर्भर करता है कि एसपीए किसी रिश्तेदार को दी गई है या किसी तीसरे व्यक्ति को थमाई गई है। अद्वय लीगल में पार्टनर मीनाक्षी अय्यर कहती हैं, 'महाराष्टï्र स्टांप अधिनियम की धारा 48 के अनुसार जिस पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिये किसी अचल जायदाद की बिक्री या हस्तांतरण का अधिकार किसी करीबी रिश्तेदार जैसे माता-पिता, भाई-बहन, संतानों आदि को दिया जाता है, उस पर 500 रुपये का स्टांप शुल्क लगता है।' वकील बताते हैं कि अन्य राज्यों में भी इसी तरह का प्रावधान है।
 
अगर पावर ऑफ अटॉर्नी करीबी रिश्तेदार के बजाय किसी अन्य व्यक्ति को सौंपी जाती है और उसमें उसे अचल संपत्ति के हस्तांतरण या बिक्री का अधिकार दे दिया जाता है तो उस पर उतना ही स्टांप शुल्क वसूल लिया जाता है, जितना संपत्ति की बिक्री पर लगता है। अगर किसी व्यक्ति को पावर ऑफ अटॉर्नी कोई अचल संपत्ति बेचने के लिए दी गई है तो उस दस्तावेज को संबंधित उप-निबंधक के दफ्तर में रजिस्टर कराना ही होगा। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल संपत्ति बेचने के लिए नहीं किया जा सकता।
 
स्टांप शुल्क विशेष पावर ऑफ अटॉर्नी को रजिस्टर कराते वक्त ही वसूल लिया जाता है ताकि उन खामियों की गुंजाइश न रहे, जिनका दुरुपयोग पहले लोग कर लेते थे। असल में पहले ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें किसी संपत्ति के मालिक ने कई लोगों को उसकी पावर ऑफ अटॉर्नी थमा दी और उन सभी से उसकी कीमत वसूल ली यानी उसने एक ही संपत्ति कई लोगों को बेच डाली। जब कोई व्यक्ति निबंधक के दफ्तर में किसी संपत्ति के मालिक का पता लगाता है तो केवल उन्हीं संपत्तियों के मालिकों के बारे में पता चल पाता है, जिन का स्टांप शुल्क और रजिस्ट्री अदा कर दी गई है। जिन मालिकों ने पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिये सौदे कर लिए, उन्हें बाद में पता चला कि उसी संपत्ति का मालिक होने का दावा कई और लोग भी कर रहे हैं, जिसकी वजह से उन्हें अदालत के चक्कर काटने पड़े।
 
रहें खबरदार
 
रावत जैसे मामले में अगर एसपीए का विकल्प चुना जाता है तो खरीदार यानी रावत को आगे जाकर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सरकार ने समय-सीमा से जुड़ी पाबंदी पहले ही लगा रखी है यानी तय मियाद के बाद ही मकान या संपत्ति की बिक्री हो सकेगी। वकीलों का कहना है कि यह जानने के बाद भी कोई खरीदार एसपीए के जरिये मकान मालिक के साथ सौदा करता है और बाद में किसी तरह का विवाद खड़ा होता है तो इस बात की पूरी संभावना है कि खरीदार मुकदमा हार जाएगा। अदालत उस सौदे को 'निरस्त' करार देगी। कानून के जानकारों का कहना है कि खरीदार को वे घर नहीं खरीदने चाहिए, जिनकी बिक्री पर सरकार ने पाबंदी लगा रखी है। इनमें राज्य सरकार की आवासीय परियोजनाएं और झुग्गी पुनर्विकास योजनाएं शामिल हैं। कई लोग केवल पावर ऑफ अटॉर्नी के बल पर कृषि योग्य भूमि खरीदते हैं। ऐसा करना भी गलत है। यह तब तक नहीं करना चाहिए, जब तक असली मालिक उस जमीन का दर्जा बदलवा न दे और उसे 'गैर कृषि योग्य भूमि' घोषित करा न ले। जायदाद के मामले में पावर ऑफ अटॉर्नी देने या लेने से पहले हमेशा वकील से मशविरा कर लेना चाहिए।
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