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आवास ऋण मानक के अलग-अलग नख

प्रिया नायर |  Jul 02, 2017 07:26 PM IST

अगर आप आवास ऋण लेने जा रहे हैं तो आपको ब्याज दर और प्रोसेसिंग शुल्क तो देखना ही चाहिए। इसके अलावा एक और पैमाना जिस पर आपको गौर करने की जरूरत है, वह है मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्ïस बेस्ड लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) यानी कोष की सीमांत लागत के आधार पर ऋण दर। एमसीएलआर से आपके ऋण का संबंध होता है, क्योंकि इसी से आपको पता चलेगा कि कितनी जल्दी-जल्दी आपके होम लोन की ब्याज दर बदलेगी। एमसीएलआर जितना कम होगा, आपके ऋण की दर भी उतनी ही तेजी से बदलेगी। 

 
करीब एक साल से ऋण को आधार दर के बजाय एमसीएलआर से जोड़ दिया गया है। गणना में प्रमुख अंतर यह है कि एमसीएलआर में कोष की सीमांत लागत को ध्यान में रखा जाता है। 'मार्जिनल कोस्ट ऑफ फंड्ïस' यानी कोष की सीमांत लागत में उधारी की लागत को शामिल किया जाता है जो रीपो दर पर निर्भर करती है। इसके अलावा जमाओं पर दी जा रही ब्याज दर और नेटवर्थ पर रिटर्न को भी इसमें शामिल किया जाता है। इसके विपरीत आधार दर में धन की लागत को ही शुमार किया जाता रहा है। आमतौर पर यह लागत जमाओं पर दिए जा रहे ब्याज की लागत ही होती है। इस लिहाज से एमसीएलआर बेहतर है और रीपो दर में बदलाव भी इसमें झलकते हैं।  बैंकबाजार डॉटकॉम में मुख्य बिजनेस डेवलपमेंट अधिकारी नवीन चंदानी ने कहा, 'ब्याज दर के लिए एमसीएलआर में रीसेट अवधि होती है। 
 
ब्याज दरों में  उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्याज रीसेट अवधि के अंत में ही फिर से बदलेगा। विभिन्न बैंक अलग अलग रीसेट अवधि की पेशकश करते हैं। लंबी अवधि के लिए उधारी से जुड़े जोखिम को समायोजित करने के लिए टेनर प्रीमियम भी है और इसी टेनर के हिसाब से ब्याज की दर अलग अलग होती है।' टेनर प्रीमियम का मतलब यह है कि आपके बचे ऋण को बची अवधि के हिसाब से तय करना। 12 महीने की रीसेट अवधि वाले आवास ऋण मे मान लीजिए कि कोई व्यक्ति जून 2017 में 8.5 फीसदी की दर से आवास ऋण लेता है। अब आरबीआई अगस्त 2017 में रीपो दर में कटौती कर देता है। परिणामस्वरूप बैंक उसी महीने में अपनी एमसीएलआर को घटाकर 8.35 फीसदी कर देता है। 
 
लेकिन कर्जदार के लिए यह बदलाव जून 2018 में ही लागू होगा यानी उसे 12 महीने बाद ही इसका फायदा मिलेगा। इसलिए कर्जदार 12 महीने तक 8.50 फीसदी की दर पर भुगतान करता रहेगा। इसके बाद ही उसे लागू ब्याज दर का लाभ मिलेगा। हालांकि एमसीएलआर की हर महीने समीक्षा होती है, लेकिन बैंक के साथ आपका करार किस तरह का है, उसी आधार पर आपकी रीसेट अवधि के अंत में आपका होम लोन अपने आप रीसेट कर दिया जाएगा। 
 
भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और पंजाब नैशनल बैंक एक वर्षीय एमसीएलआर के आधार पर आवास ऋण की पेशकश करते हैं, जबकि ऐक्सिस बैंक 6 महीने के एमसीएलआर के हिसाब से देता है। आईसीआईसीआई बैंक 6 महीने या एक वर्षीय एमसीएलआर के बीच किसी एक विकल्प की पेशकश करता है। किसी ग्राहक ने 6-महीने की एमसीएलआर पर होम लोन ले रखा है तो वह अवधि के बीच ही  इसे 12 महीने के विकल्प में बदल सकता है या वह 12 महीने के एमसीएलआर विकल्प को छह माह करा सकता है। लेकिन उसे बैंक द्वारा निर्धारित सर्विस/कन्वर्जन चार्ज देना होगा। यह सर्विस/कन्वर्जन चार्ज विभिन्न बैंकों का अलग अलग है। उदाहरण के लिए आईसीआईसीआई बैंक इसकी अनुमति देता है। 
 
हालांकि एमसीएलआर की अवधि बगैर किसी अतिरिक्त शुल्क के 6 महीने के अंत में बदलकर 12 महीने की जा सकती है, बशर्ते कि बैंक इस तरह का विकल्प मुहैया कराता हो। चंदानी ने कहा, 'अगर आपको रीसेट अवधि चयन करने का विकल्प मिला है तो आपको यह देखना चाहिए कि ब्याज दरें बढ़ रही हैं या गिर रही हैं। अगर  ब्याज दरें गिर रही हैं तो छोटी रीसेट अवधि का विकल्प लें जिससे कि आपको घटी हुई दरों का लाभ जल्द मिले। अगर ब्याज दरें बढ़ रही हों तो लंबी रीसेट अवधि का विकल्प अपनाएं जिससे कि आपके कर्ज का बोझ लंबी अवधि में ज्यादा न बढ़े।' माईलोनकेयर डॉट इन के मुख्य कार्याधिकारी गौरव गुप्ता कहते हैं कि यह इस पर भी निर्भर करता है कि कर्जदार बार बार रीसेट करवाने में कितना सहज महसूस करता है। 
 
वह कहते हैं, 'यदि ऋण एक वर्षीय एमसीएलआर से जुड़ा हुआ है तो ब्याज दर एक वर्ष के अंतराल पर बदलेगी। यदि ग्राहक ब्याज दर को लेकर सहज महसूस करता है तो वह इसे अगले एक वर्ष की अवधि में लॉक करा सकता है, भले ही ब्याज दरें ऊपर या नीचे जाएं। यदि ग्राहक बाजार दर की स्थिति के आधार पर ब्याज दर में तुरंत बदलाव चाहता है तो उसे संक्षिप्त अवधि की एमसीएलआर पर विचार करना चाहिए।' छोटे और मझोले वर्ग के कई ग्राहक ब्याज दर में उतार-चढ़ाव की स्थिति से सहज भी नहीं हो सकते। ऐसे ग्राहकों के लिए लंबी अवधि बेहतर है। गुप्ता कहते हैं जो कर्जदार ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव को सहन कर सकते हैं, उन्हें कम समय की एमसीएलआर का विकल्प अपनाना चाहिए। 
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