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अमल पर निर्भर हैं इंडिगो के वैश्विक अरमान

राम प्रसाद साहू |  Jul 09, 2017 09:52 PM IST

इंडिगो नाम के तहत भारत की सबसे बड़ी विमानन सेवा चलाने वाली इंटरग्लोब एविएशन का शेयर तब एक फीसदी चढ़ गया जब कंपनी के प्रवर्तकों ने यह दिलचस्पी दिखाई कि अगर एयर इंडिया बिकती है तो उसके अंतरराष्ट्रीय परिचालन के जरिए वे वैश्विक बाजारों में संभावना तलाशेंगे। इंडिगो के संस्थापक प्रवर्तकों-राहुल भाटिया और राकेश गंगवाल- ने एक कॉन्फ्रेंस कॉल में कहा कि वे तभी एयर इंडिया के अंतरराष्ट्रीय परिचालन को खरीदने की बोली के लिए आगे बढ़ेंगे जब उन्हें यह पक्का यकीन होगा कि वे सरकार के स्वामित्व वाली इस एयरलाइन के नेटवर्क का  कायाकल्प कर सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि उन्हें अभी इंतजार करना होगा क्योंकि अभी यह स्पष्टï नहीं है कि एयर इंडिया के अंतरराष्ट्रीय परिचालन को एक अलग इकाई में तब्दील किया जाएगा या फिर सरकार इसे अलग किए बगैर ही बेचेगी।

 
इंटरग्लोब की घरेलू विमानन बाजार में 40 फीसदी की भागीदारी है, लेकिन देश के 70,000-90,000 करोड़ रुपये के अंतरराष्ट्रीय विमानन सफर में उसका सिर्फ 3 फीसदी हिस्सा है। मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एयर इंडिया की क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करने से उसके पास एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कंपनी बनने का अवसर होगा। प्रबंधन के अनुसार इसके प्रमुख लाभ बड़े अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर एयर इंडिया के मुख्य स्लॉट और बड़ी तादाद में देश से बाहर के शहरों में उड़ानों के अधिकार हैं। इसके अलावा इंडिगो अंतरराष्ट्रीय परिचालन के यात्री कारोबार के लिए अपने बड़े घरेलू विमानन आधार का इस्तेमाल करने में भी सक्षम होगी। 
 
ब्रोकरेज फर्म और निवेशक शुरू में इंडिगो द्वारा एयर इंङ्क्षडया के अधिग्रहण की योजना को लेकर आशंकित थे। दलील यह थी कि इससेे इंडिगो पर 52,000 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2016 के अंत तक) का कुल कर्ज भी लद जाएगा। आईआईएफएल के जोसफ जॉर्ज का कहना है कि अगर इस सौदे में बैलेंस शीट पर दबाव का ध्यान रखा भी जाता है तो भी परिचालन 
दक्षता का दम दिखा पाना कठिन साबित हो सकता है। 
 
हालांकि इंडिगो के प्रवर्तकों को पक्का यकीन है कि वे एयर इंडिया को एक सस्ती और लंबी दूरी की विमान सेवा में तब्दील करने में सक्षम होंगे। साथ ही, समय के साथ कार्यशील पूंजी कर्ज को चुकाने में भी सक्षम होंगे जो कुल कर्ज का लगभग 60 फीसदी है। इंडिगो ने संकेत दिया है कि वह बाजार भागीदारी बढ़ाने के लिए कम कीमत का दांव खेल सकती है और ग्राहकों का यात्रा समय कम करके उनको अपने नेटवर्क से जोड़े रख सकती है।
 
इंडिगो की तुलना में एयर इंडिया के परिचालन के मुनाफे में भारी अंतर को देखते हुए कोटक इंस्टीट्ïयूशनल इक्विटीज के मोहन लाल इस मुद्दे पर सतर्कता के साथ बात करते हैं। यह स्थिति मुख्य रूप से एयर इंडिया के जटिल परिचालन, महंगे लीज समझौतों और कम उत्पादकता की वजह से है। उनका मानना है कि इंडिगो के लिए इस जटिल अधिग्रहण का प्रबंधन करना बड़ा जोखिम लेना है। हालांकि प्रवर्तकों का मानना है कि उचित छानबीन की प्रक्रिया उन्हें इस जोखिम से बचाने के लिए पर्याप्त समझ मुहैया कराएगी। 
 
कई विश्लेषकों का मानना है कि अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि एयर इंडिया की बिक्री का सौदा पूरा करने में समय लगेगा। फिर भी ज्यादातर विश्लेषक मजबूत मांग, कच्चे तेल की घटती कीमतों की वजह से कम लागत और प्राप्तियों में स्थिरता की उम्मीद को देखते हुए कंपनी के भारतीय परिदृश्य को लेकर उत्साहित हैं। इस सब से कंपनी को अगले तीन वर्षों के दौरान सालाना आधार पर अपनी आय 30 प्रतिशत तक बढ़ाने में मदद मिलनी चाहिए। अगर इंडिगो सरकारी विमानन कंपनी का सिर्फ अंतरराष्ट्रीय परिचालन हासिल कर लेती है और उसका कायापलट कर देती है तो वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकती है।
 
हालांकि विभिन्न विमान, अधिक रखरखाव और स्टाफ खर्च को देखते हुए अगर वह इस सौदे को अच्छी तरह से पूरा नहीं कर पाती है तो एयर इंडिया उसके लिए बड़ा सरदर्द बन सकती है, ठीक वैसे ही जैसे  जेट एयरवेज (एयर सहारा) और किंगफिशर (एयर डेक्कन) मामले में हुआ। एयर इंडिया के अंतरराष्ट्रीय परिचालन का अधिग्रहण एक लंबी प्रक्रिया होगी, लेकिन इंडिगो ने वैश्विक बाजारों में अपने विस्तार का संकेत पहले ही दे दिया है। इसमें समय लग सकता है, लेकिन अमल करने के इसके पुराने इतिहास को देखते हुए उसके लिए यह आकर्षक सौदा हो सकता है। तथ्य यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय विमान यात्रा बाजार भारत के  घरेलू बाजार की तुलना में दोगुना है।
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