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बच्चे न दें सहारा, कैसे हो गुजारा!

तिनेश भसीन |  Jul 09, 2017 09:58 PM IST

केंद्र सरकार परिवार के बुजुर्गों और माता-पिता को उनके  परिवार के सदस्यों या उत्तराधिकारियों द्वारा दी जाने वाली गुजारा भत्ता राशि बढ़ाने पर गौर कर रही है। यह राशि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक गुजारा भत्ता और कल्याण अधिनियम (मेंटेनेंस ऐंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्ïस ऐंड सीनियर सिटीजंस ऐक्ट) के तहत बढ़ाई जाएगी। इस समय यह सीमा 10,000 रुपये है जिसे तीन गुना कर 30,000 रुपये महीने किया जा सकता है। अधिनियम में प्रावधान है कि परिवार के उन वरिष्ठ नागरिकों को उनके बच्चे या रिश्तेदार वित्तीय सहायता मुहैया कराएं जिनकी अनदेखी की जा रही हो या जिनको अकेला छोड़ दिया गया हो।

 
हालांकि इस रकम में बढ़ोतरी करना अरसे से लंबित है क्योंकि एक दशक पुराना यह कानून महंगाई के साथ तालमेल नहीं रख पाया है। विश्लेषकों का कहना है कि सरकार को ट्रिब्यूनलों के अधिकार भी बढ़ाने चाहिए और बुजुर्गों को उनके जीवन के अंतिम वर्षों में जरूरी वित्तीय सहायता मुहैया कराने पर जोर देना चाहिए। वॉक्सलॉ में पार्टनर पल्लवी शर्मा कहती हैं, 'बुजुर्गों और उनके परिजनों  के लिहाज से यह अच्छा होगा कि सरकार कोई राशि निश्चित करने के बजाय उनके बच्चों या रिश्तेदारों की आय का एक हिस्सा गुजारा भत्ता के लिए तय कर दे। उदाहरण के लिए कभी ऐसा भी हो सकता है कि चिकित्सा उपचार किसी बुजुर्ग की जेब पर भारी पड़ जाए।' बुजुर्ग भोजन, कपड़ों, आवास और चिकित्सा सहायक और उपचार के लिए रकम का दावा कर सकते हैं।
 
कुछ राज्यों ने अभी तक भी इस कानून को अधिसूचित नहीं किया है। इस कारण उन राज्यों के वरिष्ठ नागरिक इसका लाभ नहीं उठा सकते। डिग्निटी फाउंडेशन के संस्थापक शीलू श्रीनिवासन ने कहा, 'जब केंद्र ने यह कानून बनाया तो हरेक जिले में एक ट्रिब्यूनल भी बनाया जाना था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।' श्रीनिवासन का कहना है कि सरकार को वरिष्ठ नागरिकों के साथ होने वाले अभद्र व्यवहार और उपेक्षा से निपटने के लिए ट्रिब्यूनलों के अधिकार भी बढ़ाने चाहिए। हाल के समय में उच्च न्यायालयों ने जरूरत पडऩे पर बच्चों को माता-पिता की संपत्ति से बेदखल करने का भी निर्देश दिया है। लेकिन चूंकि ट्रिब्यूनलों के पास पर्याप्त अधिकारों का अभाव है, इस कारण ज्यादातर मामलों को उच्च न्यायालय ले जाना पड़ता है।  
विश्लेषकों का कहना है कि इससे संबंधित कानूनी प्रावधान एक दशक से मौजूद हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों को इनके बारे में पता ही नहीं है। उनको यह भी नहीं मालूम कि गुजारा राशि के लिए दावा किस तरह से किया जाएगा। ये प्रावधान मुख्य रूप से उन बुजुर्गों की मदद करते हैं जो बुढ़ापे में अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं कर पाते। बुजुर्गों में माता-पिता और दादा-दादी शामिल हैं। वे अपने बच्चों, पौत्रों या ऐसे खास रिश्तेदारों से गुजारा राशि पाने का दावा कर सकते हैं जो उनकी (बुजुर्ग की) संपत्ति के वैध मालिक हैं।
 
वॉक्सलॉ की शर्मा कहती हैं, 'हालांकि बच्चों के लिए अपने  बुजुर्गों को वित्तीय सहायता मुहैया कराना अनिवार्य है, लेकिन रिश्तेदारों से तभी इस तरह की मदद मुहैया कराने को कहा जा सकता है जब उनको संबद्घ बुजुर्ग की परिसंपत्ति और जायदाद विरासत में मिली हो या वे पहले से ही उसके पास हों। जो वरिष्ठ नागरिक गुजारा राशि का दावा करने की कोशिश करते हैं, उनके लिए यह प्रावधान कई तरह की समस्याएं भी खड़ी करता है।' मान लीजिए कि माता-पिता ने अपना बेटा खो दिया। ऐसे में पुत्र वधू ही उन्हें वित्तीय सहायता मुहैया कराने वाली एकमात्र व्यक्ति हो सकती है। लेकिन अगर बुजुर्गों के पास कोई संपत्ति न हो तो पुत्र वधू को गुजारा राशि देने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
 
अधिनियम के तहत गुजारा राशि पाने के लिए बुजुर्ग को किसी ट्रिब्यूनल के समक्ष आवेदन करने की जरूरत होती है। पंचाट यह देखता है कि आवेदन जायज है या नहीं और फिर वह वर्तमान 10,000 रुपये तक की रकम का आदेश देता है। पेशे से वकील अंश भार्गव कहते हैं, 'एक बार आदेश पारित हो जाने पर बच्चे या रिश्तेदार इसे मानने के लिए बाध्य होते हैं। अगर वे गुजारा राशि नहीं चुकाते हैं तो उन्हें एक महीने के कारावास की सजा सुनाई जा सकती है।'  इस प्रक्रिया को आसान और झंझट मुक्त बनाने के लिए वरिष्ठ नागरिकों को किसी वकील की सेवा लेने की जरूरत नहीं है। वे या तो खुद ही यह प्रक्रिया आगे बढ़ा सकते हैं या किसी गैर-सरकारी संगठन के जरिये ट्रिब्यूनल से संपर्क कर सकते हैं। 
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