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... तो सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड में निवेश करना ज्यादा तर्कसंगत

राजेश भयानी |  Jul 11, 2017 10:30 PM IST

आपका निवेश

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सोमवार को सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड (एसजीबी) की नौवीं किस्त जारी कर दी। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हो गया है, इसलिए इस कागजी सोने में निवेश करने वाले निवेशक इस कशमकश में होंगे कि क्या इसमें निवेश करना अब भी भौतिक सोने की तुलना में बेहतर है। इसका जवाब हां है। भौतिक सोने पर 1 जुलाई से 3 फीसदी जीएसटी लगेगा। इसके अलावा गढ़ाई के खर्च भी हैं। अगर आप कम वजन का सिक्का खरीदते हैं तो मेकिंग चार्ज उसकी कीमत का 6 से 10 फीसदी हो सकता है। हालांकि बार (सिल्ली) का मेकिंग चार्ज कम है। 

बॉन्ड पर न जीएसटी है, न मेकिंग चार्ज और न ही इन्हें भुनाने की कोई लागत या कर है। भौतिक सोने पर पूंजी लाभ कर लगेगा। वहीं सॉवरिन बॉन्ड में आपको शुरुआती राशि पर 2.5 फीसदी ब्याज मिलेगा। भौतिक सोने पर जीएसटी, मेकिंग चार्ज और भंडारण लागत और बॉन्ड पर ब्याज भुगतान और अभौतिक रूप में रखने की सुविधा के लिहाज से विचार करते हैं तो स्पष्ट रूप से सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड ज्यादा आकर्षक हैं। 

क्या आपको सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड में निवेश करना चाहिए या अन्य विकल्प अपनाने चाहिए? इसका विकल्प गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) हैं। लेकिन उनमें दिक्कत यह है कि ईटीएफ को उतनी ही मात्रा में भौतिक सोना खरीदना होगा और उसे सिक्योरिटी के रूप में रखना होगा। इस तरह ईटीएफ में भौतिक सोने की खरीद पर 3 फीसदी कर लगेगा। गोल्ड बॉन्ड की 9वीं किस्त की कीमत 2,780 रुपये प्रति ग्राम तय की गई है और इन बॉन्डों की अवधि 8 साल है। गोल्ड बॉन्ड में निवेश करने में बहुत से फायदे हैं। बॉन्ड मुंबई में इंडियन बुलियन ऐंड ज्वैलर्स एसोसिएशन द्वारा घोषित 999 शुद्धता के सोने की पिछले एक सप्ताह की औसत कीमत से 50 रुपये प्रति ग्राम या करीब 1.5 फीसदी कम पर बिक रहे हैं। 

अब तक कीमतों में बढ़ोतरी के लिहाज से सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड के निवेशकों का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है। वर्तमान बॉन्ड निर्गम जारी करने की कीमत के लिहाज से तीसरा सबसे सस्ता निर्गम है और 2016 से अब तक का सबसे सस्ता है। यह इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि सोने में निवेश पिछले कुछ वर्षों के दौरान फायदेमंद नहीं रहा है। यहां तक कि बॉन्डों का कारोबार निर्गम कीमत से कम पर हो रहा है और सभी पिछले निर्गमों की कीमत बॉन्डों की निर्गम कीमत से कम बोली जा रही है। इसका मतलब है कि बॉन्ड एक्सचेंज प्लेटफॉर्मों पर छूट पर उपलब्ध हैं। हालांकि सूचीबद्ध बॉन्डों में कारोबार की मात्रा बहुत कम है। कई बार तो एक दिन में कारोबार 100 ग्राम का भी नहीं होता है। इसका मतलब है कि कीमत निर्धारण भी ठीक नहीं है। 

इसलिए इस बात की संभावना है कि अगर एक्सचेंजों में खरीदार का ऑर्डर दो अंकों में है तो कीमत में अहम बदलाव हो सकता है। इसी वजह से क्वांटम म्युचुअल फंड के फंड प्रबंधक (वैकल्पिक निवेश) चिराग मेहता जैसे लोगों का मानना है कि ईटीएफ कई तरह से बेहतर हैं क्योंकि उनमें निवेश महज एक कंप्यूटर पर क्लिक से किया जा सकता है। उन्हें कभी भी बेचा जा सकता है और ईटीएफ में खरीद राशि की कीमत का भौतिक सोना सिक्योरिटी के रूप में रखा जाता है। इसी वजह से गोल्ड ईटीएफ में कीमतें सोने की कीमतों के अनुसार चलती हैं। वहीं सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड में ऐसा नहीं है, जिसमें अगर विक्रेता ज्यादा हैं तो कीमत काफी कम बोली जा सकती है। 

हालांकि विशेषज्ञ अब भी सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड के फायदों को लेकर बंटे हुए हैं। आरबीआई के पूर्व गवर्नर वाई वी रेड्डी ने विश्व स्वर्ण परिषद के 'गोल्ड इन्वेस्टर' के जून निर्गम में तर्क दिया है, 'सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड सरकार जारी करती है, इसलिए इसकी प्रभावी क्षमता का अभी तक परीक्षण नहीं हुआ है और मेरा मानना है कि सरकार और बॉन्ड खरीदारों को होने वाले फायदे स्पष्ट नहीं हैं।'
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