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इस साल की आय तय करेगी शेयरों की चाल

हंसिनी कार्तिक |  Jul 16, 2017 09:25 PM IST

पिछले सप्ताह से तिमाही नतीजे शुरू होने के साथ ही भारतीय उद्योग जगत के लिए सबसे व्यस्त समय की शुरुआत हो गई है। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत का उद्योग जगत निवेशकों की अपेक्षाओं को पूरा कर पाएगा? 1 जुलाई को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद जून तिमाही को लेकर निवेशकों की उम्मीदें जरूर हलकी हुई हैं। एडलवाइस के विश्लेषकों का मानना है कि 225 कंपनियों के राजस्व में वृद्धि दर 12 प्रतिशत रह सकती है, जबकि परिचालन मार्जिन में 262 आधार अंक की कमी से शुद्ध मुनाफा 2 प्रतिशत तक गिर सकता है। हालांकि दुनिया के इक्विटी बाजारों, खासकर उभरते बाजारों में भारत की स्थिति को देखते हुए कंपनियों के लिए कम लक्ष्य भी हासिल करना जरूरी होगा। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यूबीएस, सीएलएसए और क्रेडिट सुइस जैसे विदेशी निवेशकों के सवाल हैं कि क्या भारतीय शेयरों का ऊंचा मूल्यांकन तर्कसंगत है? पिछले चार लगातार साल से आय वृद्धि दर उम्मीदों के अनुसार नहीं रही है।
उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 2014 में निफ्टी कंपनियां 441 रुपये की प्रति शेयर आय (ईपीएस) के लिए तैयार लग रही थीं, लेकिन वास्तविक आंकड़ा 386 रुपये रहा। वित्त वर्ष 2015, 2016 और 2017 के लिए भी ऐसे ही अनुमान लगाए गए थे। इन वर्षों में भी आय वृद्धि दर अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई, जिसके बाद वित्त वर्ष 2018 के लिए अनुमान पहले ही कम कर दिए गए हैं। ब्लूमबर्ग के सर्वेक्षण के अनुसार 31 मार्च 2017 के 539 रुपये के ईपीएस के मुकाबले वित्त वर्ष 2018 के लिए अनुमान 523 रुपये रखा गया है। इससे संकेत मिलता है कि शायद विश्लेषकों ने जीएसटी के असर को ध्यान में
रखते हुए पहले ही अपनी उम्मीदें घटा दी हैं।
फिर भी मौजूदा स्तरों पर ईपीएस अनुमान काफी कम है। वित्त वर्ष 2015 के शुरू में 740 रुपये के अनुमान पर ज्यादातर सहमत थे। बाजार आम तौर पर दो साल के अग्रिम आधार पर अपने अनुमान की गणना करता है। आय के अनुमानों में लगातार कमी के कारण विदेशी ब्रोकरेज कंपनियों को भारतीय शेयरों पर पीछे हटने पर  विवश होना पड़ा है। क्रेडिट सुइस ने हाल में अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 'चार महंगे शेयर बाजारों' का हिस्सा है लेकिन अभी तक उसका प्रदर्शन कमजोर ही रहा है। लिहाजा ब्रोकरेज कंपनियों ने भारत को कम वजनदार बताना जारी रखा है और कहा है कि कैलेंडर वर्ष 2017 के ईपीएस अनुमान में भी लगातार कमी हो सकती है। सबसे पहले स्विटजरलैंड की यूबीएस ने महंगे बाजार मूल्यांकन का हवाला देते हुए भारत पर अपना रुख 'ओवरवेट' से घटाकर 'तटस्थ' कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया है, 'हमारे पैमाने पर भारत अब उतना आकर्षक नहीं लगता है, हालांकि इसकी बड़ी वजह नोटबंदी रही है, जिससे कैलेंडर वर्ष 2018 में आय पर असर पड़ा है। दुर्भाग्य से भारत में मूल्यांकन में इजाफे से यह हमारे बुनियादी पैमाने पर उतना आकर्षक नहीं रह गया है। हमने रेटिंग घटाकर फिलहाल 'न्यूट्रल' कर दी है, लेकिन यह जरूर मानते हैं कि कुछ समय बाद भारत की संरचनात्मक खूबी फिर निवेशकों को आकर्षित करेगी।'
सीएलएसए के महेश नंंदुरकर ने भी अपनी टिप्पणी में ऐसी ही बातें कही हैं। वह कहते हैं, 'निफ्टी मूल्यांकन के लिहाज से इस समय ऊंचे यानी 20 फीसदी महंगे स्तर पर कारोबार कर रहा है। हमारे शुरुआती प्राइस-टू-अर्निंग्स के मुकाबले 12 महीने के फॉरवर्ड रिटर्न के विश्लेषण का नतीजा बताता है कि अगले 12 महीने में प्रतिफल एक अंक में रहेगा जबकि नकारात्मक प्रतिफल की आशंका बनी रहेगी। आय में वृद्धि का रुझान भी आकर्षक नहीं लगता है क्योंकि आय के अनुमानों में लगातार कमी हो रही है। ऐेसे में मूल्यांकन निवेशकों के लिए चिंता का मुख्य कारण बन रहा है।'
फिलहाल पहली तिमाही से जुड़ी अपेक्षाएं ठंडी पड़ गई हैं, खासकर उपभोक्ता केंद्रित क्षेत्रों के लिए। इसकी वजह जीएसटी लागू होने से पहले इन कंपनियों का अपना माल निकालना है। सितंबर तिमाही के परिणाम भी उतार-चढ़ाव भरे हो सकते हैं क्योंकि उद्योगों को नई कर प्रणाली के साथ तालमेल बैठाने में थोड़ा समय लगेगा। यूटीआई म्युचुअल फंड के समूह अध्यक्ष वेत्री सुब्रमण्यन का कहना है कि जीएसटी प्रणाली काफी जटिल है, ऐसे में आय पर इसका असर भांप पाना फिलहाल संभव नहीं है। लिहाजा बाजार आय अर्जित करने की राह में बाधा को पूरी तवज्जो नहीं दे रहा है, लेकिन अनुमान से कम ईपीएस शेयरों के लिए नुकसान दायक होंगे। यह कारण है कि निवेशक, खासकर विदेशी, भारतीय शेयरों के मूल्यांकन पर सवाल उठा रहे हैं, ऐसे में भारतीय उद्योग जगत के लिए वित्त वर्ष 2018 का लक्ष्य हासिल करना खास महत्त्वपूर्ण हो गया है। इस बार भी अगर लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो बाजार के लिए यह अच्छी बात नहीं होगी।

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