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मध्यस्थता के लिए मजबूर नहीं कर सकता बिल्डर : आयोग

तिनेश भसीन |  Jul 23, 2017 07:46 PM IST

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने घर खरीदने वाले लोगों को बड़ी राहत दी है। यह राहत उन लोगों को मिली है जो संबंधित कानून में टकराव की वजह से डेवलपरों के खिलाफ अपने मामले आगे नहीं बढ़ा सकते। वकीलों के मुताबिक विभिन्न उपभोक्ता मंचों पर इस तरह के कई मामले लटके हुए हैं। इसकी वजह यह है कि डेवलपरों ने घर खरीद के करार में एक ऐसी शर्त जोड़ दी है कि दोनों पक्षों के बीच विवाद की सूरत में उसका निपटान एक निजी समाधान व्यवस्था के जरिये किया जाएगा जिसे मध्यस्थता भी कहा जाता है।

 
किसी भी व्यक्ति के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक अतिरिक्त उपाय है और आमतौर पर यह किसी दूसरे कानून से प्रभावित नहीं होता है। लेकिन 2015 में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम में बदलाव किया गया। नए बदलाव में कहा गया कि किसी भी न्यायिक प्राधिकार को उन मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजना होगा जिनके समझौते में मध्यस्थता का प्रावधान शामिल किया गया है। 
 
करीब 40 खरीदारों की तरफ से पैरवी करने वाले वकील सुशील कौशिक का कहना है, 'जिन मामलों में बिल्डरों ने मध्यस्थता की शर्त रखी थी, उन्होंने उपभोक्ता फोरम से केस न स्वीकारने की अपील की और अनुरोध किया कि कानून में बदलाव के आधार पर  इन मामलों को मध्यस्थता में भेजा जाए।' कौशिक कहते हैं, 'लेकिन आयोग ने फैसला सुनाया कि रियल एस्टेट कंपनियां खरीदारों को उपभोक्ता फोरम में जाने से नहीं रोक सकतीं औन न ही उनको अपने विवाद मध्यस्थता के जरिए सुलझाने को बाध्य कर सकती हैं।' 
 
इस फैसले से उन खरीदारों को काफी राहत मिली है जो उपभोक्ता अदालतों में न्याय की गुहार लगा रहे हैं। वकीलों का कहना है कि कई मामले लटके हुए थे क्योंकि कानून में स्पष्टता नहीं थी। इस बारे में तय करने का अधिकार मामलों की सुनवाई करने वाले संबंधित न्यायधीशों के विवेक पर छोड़ दिया गया था। हाल के आदेश से अब स्पष्टता आ गई है। पीठ ने आदेश दिया, 'हम बिना किसी हिचक के बिल्डर की ओर से पेश दलीलों को खारिज करते हैं। हमारा फैसला है कि शिकायतकर्ता और बिल्डरों के बीच होने वाले इस तरह के समझौतों (बिल्डर-खरीदार के बीच समझौता) में मध्यस्थता की शर्त उपभोक्ता फोरम के न्यायिक क्षेत्र का उल्लंघन है और मध्यस्थता अधिनियम में किए  गए संशोधन इस पर नहीं लागू होते। '  
 
अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता अधिकार संरक्षण परिषद के संस्थापक और अध्यक्ष अरुण सक्सेना बताते हैं, 'उपभोक्ता संरक्षण कानून (सीपीए) की धारा 3 के मुताबिक यह अधिनियम इस समय मौजूद किसी भी कानून के साथ है, न कि किसी कानून प्रावधानों के खिलाफ। ऐसे में उपभोक्ता अदालतों को खरीदार ग्राहकों की शिकायतें सुनने का पूरा अधिकार है, भले ही बिल्डर के साथ किए गए समझौते में मध्यस्थता की शर्त हो।' उपभोक्ता कार्यकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि डेवलपर ग्राहकों को मध्यस्थता के लिए बाध्य करते हैं क्योंकि मध्यस्थ कार्यवाही को प्रभावित किया जा सकता है और ऐसे मामले में पैसे की ताकत भी बड़ी भूमिका निभा सकती है। मध्यस्थता में बिल्डर और ग्राहक अपना वकील नियुक्त करते हैं और मामले को सुलटाने की कोशिश करते हैं। 
 
कौशिक कहते हैं, 'ऐसे वकीलों की फीस भी ज्यादा होती है और ज्यादातर ग्राहक इतनी फीस का बोझ नहीं उठा सकते हैं।' बिल्डर आमतौर पर बिल्डर-खरीदार समझौता करते हैं जो उनके पक्ष में होता है। उपभोक्ता इसकी तकनीकी बारीकियां तब तक नहीं समझते जब तक कि उनका बिल्डर से विवाद नहीं हो जाता और मामला मुदमेबाजी में नहीं फंस जाता। अदालतों ने ऐसे एकतरफा समझौतों का संज्ञान लिया है और ग्राहकों को राहत दी है। सक्सेना कहते हैं, 'कई दफा तो डेवलपर खरीदारों को समझौते की एक प्रति भी नहीं देते।' हालांकि हाल के समय में अदालतों ने ऐसे गड़बड़ी करने वाले बिल्डरों के खिलाफ सख्त कदम उठाना शुरू कर दिया है। खरे लीगल चैंबर्स के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर अभिषेक खरे का कहना है, 'हाल के वर्षों में बिल्डरों-डेवलपरों के खिलाफ मामलों की तादाद बढ़ी है। अदालत का मानना है कि जब बिल्डर चीजों को अपने पक्ष में करने के लिए कानून का इस्तेमाल करते हैं तो उपभोक्ताओं के पास उचित न्याय पाने के कम ही विकल्प होते हैं।
कीवर्ड real estate, property, रियल एस्टेट (नियमन एवं विकास) अधिनियम,

  
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